नेहरू की आलोचना के बावजूद दिनकर को मिला था राष्ट्रकवि का ख़िताब

राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर

अपने ओजस्वी रचनाओं से देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना का नव संचार करने वाले हिंदी साहित्य के दैदीप्यमान नक्षत्र, हिंदी कविता के उज्जवल हस्ताक्षर, भारतीय साहित्य के रत्नपुत्र, पद्मभूषण से अलंकृत हिंदी के राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की जयंती पर उन्हें नमन है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म आज ही के दिन यानी कि 23 सितंबर 1960 में हुआ था। इनका जन्म स्थान बिहार के सिमरिया ज़िला है। दिनकर ने देशभक्ति से ओत – प्रोत होकर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई कविताएं लिखी और लोगों को प्रेरणा दी। रामधारी सिंह दिनकर राज्यसभा के तीन बार सदस्य भी रह चुके थे। 1974 में ये ओजस्वी राष्ट्रकवि हम सभी से विदा लेकर परलोक सिधार गए।


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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर को श्रद्धांजलि अर्पित की

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिंदी जगत के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती पर बुधवार को उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि उनकी कालजयी कविताएं देशवासियों को प्रेरित करती रहेंगी। मोदी ने ट्वीट किया,‘राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी कालजयी कविताएं साहित्यप्रेमियों को ही नहीं, बल्कि समस्त देशवासियों को निरंतर प्रेरित करती रहेंगी|’

पंडित नेहरू ने दिनकर राष्ट्रकवि की संज्ञा दी

पंडित नेहरू ने ही दिनकर जी को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पंडित नेहरू के इस काम से दिनकर की क़लम ने सरकार के ख़िलाफ़ लिखना बंद कर दिया।

राज्यसभा में कई बार ऐसे मौके आए जब दिनकर ने सरकार और पंडित नेहरू को अपनी कविताओं के माध्यम से घेरा है। भारत चीन युद्ध के बाद तो दिनकर नेहरू के पूरी तरह से ख़िलाफ़ हो गए थे। लेकिन वैचारिक मतभेदो के बावजूद दोनों के संबंधों में शालीनता रही।

दिनकर ने  रेणुका और हुंकार जैसी रचनाओं के जरिये अंग्रेजों का जमकर किया विरोध

 पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने बी. ए. ऑनर्स की डिग्री हासिल करने के बाद दिनकर स्कूल में प्रिंसिपल बन गए। 1934 में बिहार सरकार ने इन्हें सब-रजिस्ट्रार का पोस्ट ऑफर किया, जिसे इन्होंने स्वीकार कर लिया। दिनकर जी नौ साल तक इस पद पर बने रहे। अंग्रेजी हुकूमत के दिए पद के बावजूद दिनकर ने अपने क़लम से अंग्रेजों को नहीं बख़्शा।

रेणुका और हुंकार जैसी रचनाओं के जरिये अंग्रेजों की दिनकर जी ने जमकर विरोध किया। जल्दी ही ब्रिटिश हुकूमत को अंदाजा लग गया कि, उन्होंने गलत आदमी पर भरोसा कर लिया, इसके बाद तो नौकरी में उन्हें परेशान करने का सिलसिला ही चल पड़ा, जिसके बाद दिनकर जी का चार वर्ष में 22 बार तबादला किया गया।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को अपने देश से अटूट प्रेम था। राष्ट्रकवि की रचनाओं में यह साफ झलकता था। बिहार विधान परिषद के सदस्य और पटना विश्वविद्यालय में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. प्रो. रामवचन राय बताते हैं कि देश पर चीनी आक्रमण से आहत होकर दिनकर ने सन् 1962 में ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ लिखी थी। राष्ट्रकवि ने पटना विवि के सीनेट हॉल में ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ का काव्य पाठ किया। वीर रस की कविता को सुनकर छात्रों और शिक्षकों ने खूब तालियां बजाई थीं। तब यह किताब छपकर नहीं आई थी।

दिनकर गांधी जी के विचारों से हुए थे प्रभावित

बताया जाता है कि दिनकर अपनी युवा अवस्था में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहते थे लेकिन बाद में वह गांधी जी के विचारों से प्रभावित हुए थे। हालांकि वह ख़ुद को एक ‘खराब गांधीवादी’ बुलाते थे। दिनकर ने अपनी कविताओं के जरिए देश की युवा पीढ़ी में जोश एवं वीरता की भावना भरते रहे। उनका काव्य संग्रह ‘कुरुक्षेत्र’ युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। कवि के रूप में अपनी पहचान रखने वाले दिनकर की निकटता राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रहण नारायण सिन्हा, श्री कृष्ण सिन्हा, रामबृक्ष बेनीपुरी के साथ रही। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ भी दिनकर की अच्छी घनिष्ठता रही।

रामधारी सिंह दिनकर का नाम आते ही सभी को उनकी ओज और ज़ोश से भर देने वाली कविताएं याद आने लगती हैं। दिनकर हिंदी कविता के अग्रणी कवियों में रहे हैं। उनकी कविताएं लोगों खासकर युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत रही हैं। भारत की आजादी के बाद उन्हें एक राष्ट्रवादी एवं विद्रोही कवि के रूप में जाना गया। दिनकर की वीर रस से भरी कविताएं आज भी लोगों की जुबान पर हैं। दिनकर को देश के राष्ट्रकवि का दर्जा भी मिला।

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sneha singh

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