जीएसटी और कृषि बिल में कांग्रेस का विरोध, हालांकि इसकी नींव मनमोहन सिंह ने रखी गयी थी

जीएसटी और कृषि बिल में कांग्रेस का विरोध

बीजेपी सरकार द्वारा लाए जा रहे हर कानून के विरोध में कांग्रेस मैदान पर उतर चुकी है। भाजपा द्वारा लाए गए जीएसटी, निजीकरण, आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी कांग्रेस ने सत्ता का पुरजोर विरोध किया है।

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हालांकि, विरोध के बाद भी कांग्रेस की स्थिति में विरोधाभास नजर आ रहा है। दरअसल, कांग्रेस ने अपने कार्यकाल के दौरान किसानों को मंडी मुक्त करवाने तथा कृषि क्षेत्र में निजीकरण के दरवाज़े खोलने की कवायद लगाई हुई थी।

 


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रिपोर्ट  के अनुसार 

उस समय की रिपोर्टों पर नजर डालें तो उस दौर में बिचौलियों को खत्म करने जैसे मुद्दे समय-समय पर उठते रहे हैं। हालांकि अपने कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह सरकार गठबंधन होने की वजह से तमाम दलों के विरोध के फलस्वरूप क़ानूनों को पारित नहीं कर पाई।

कांग्रेस को अपना रुख साफ करने की जरूरत

बीजेपी सरकार द्वारा लाए जा रहे इन क़ानूनों को लेकर कांग्रेस को अपना रुख साफ करने की जरूरत है। देखा जाए तो इन क़ानूनों का बीज कांग्रेस की सरकार में ही बोया गया था। लेकिन वहीं दूसरी तरफ कृषि विधेयक जो कि अब कानून बन चुका है, इसके विरोध में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अनुच्छेद 254 (2) के तहत बिल पास कराने के लिए पार्टी शासित राज्य को कहा है, जो केंद्रीय कानून को निष्क्रिय करता हो।

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लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि कृषि कानून का सबसे कड़ा विरोध कांग्रेस शासित राज्यों में हो रहा है, जिनमें से पंजाब एक है। इसके अलावा उत्तर भारत के उन राज्यों में भी उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं, जहां कांग्रेस प्रभावी है। लेकिन वहीं दूसरी और कांग्रेस भी कानून का विरोध करने वाले स्वतंत्र किसान संगठनों का समर्थन कर रही है।

मनमोहन सरकार में बोये गए क़ानूनों के बीज

एक तरफ कांग्रेस निजीकरण का विरोध करती है तथा पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी ट्वीट करते हुए प्रधानमंत्री को उद्योगपतियों का प्रवक्ता बताते हैं। वही 1991 में मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री रहते हुए निजीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी तथा यह प्रक्रिया यूपीए-1 और यूपीए-2 तक जारी रही।

दूसरी तरफ वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी में भी कांग्रेस का रुख धूमिल नजर आता है क्योंकि पार्टी के कार्यकाल के दौरान ही एक कर लगाए जाने को लेकर अभियान चलाए गए थे। हालांकि आम सहमति की कमी के कारण जीएसटी लागू नहीं हो सका। लेकिन भाजपा ने अपने कार्यकाल में अरुण जेटली के वित्त मंत्री रहते इसे लागू कर दिया।

अब जब जीएसटी लागू हो गया तो कांग्रेस इसकी कमियां निकालने में जुट गई। कांग्रेस का कहना है कि यह जीएसटी वैसा नहीं है जैसा वह चाहती थी। अब कांग्रेस की जीएसटी भाजपा की जीएसटी से कैसे अलग है, यह कांग्रेस से बेहतर कोई नहीं जान सकता।

आरक्षण और कांग्रेस सरकार का रवैया 

अब बात करें आरक्षण के मसले की तो इसमें भी कांग्रेस की स्थिति ख़राब रही है। दरअसल, जब वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू करने के लिए विधेयक पेश किया था तब लोकसभा में कांग्रेस नेता राजीव गांधी ने इसके खिलाफ जोरदार भाषण दिए थे। लेकिन वहीं दूसरी तरफ मंडल कमीशन की रिपोर्ट तैयार करने में इंदिरा गांधी की भूमिका अहम रही थी।

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पीवी नरसिम्हा राव के शासनकाल में भी न्यायालय के फैसले के बाद ओबीसी आरक्षण को लागू कराया गया था तथा मनमोहन सिंह सरकार ने केंद्रीय संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू किया था। इन सब के मद्देनजर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चाहे कृषि विधेयक हो या निजीकरण या जीएसटी तथा वंचितों को हक देने का मुद्दा हो सब में कांग्रेस की स्थिति दिशाहीन है।

कांग्रेसी यदि अपने रुख को साफ करती है, तो इससे मतदाताओं को भरोसा हो सकेगा कि भाजपा सरकार के सत्ता से हटने के बाद इन जन विरोधी कहे जाने वाले क़ानूनों को तत्काल खत्म कर दिया जाएगा।

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