महिला सशक्तीकरण का संदेश देनेवाले गांधी के समाज की कल्पना अलग थी

महिला सशक्तीकरण पर गांधी 

प्राचीन से लेकर आधुनिक काल तक महिला की स्थिति सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रुप में सामान नहीं रही है। वहीं गांधी की बात करें तो महिलाओं के सम्मान के लिए उन्होंने काफी कुछ किया है। 

साधारण शब्दों में महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करें तो इसका मतलब है कि महिलाओं को अपनी जिंदगी का फैसला करने की स्वतंत्रता देना या उसमें ऐसी क्षमता का होना है।ताकि वह समाज में अपना सही स्थान स्थापित कर सकें।

भारत में पैदा हुई बच्ची से लेकर 100 साल की बूढ़ी औरत भी सुरक्षित नहीं है। क्या ऐसे ही भारत की कल्पना करें थी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने? क्या ऐसा ही आजाद भारत चाहते थे वह, जहां लड़कियां अपने आप को दिन के उजाले में ना रात के अंधेरे में सुरक्षित महसूस कर सकें। जहां लड़के तो मन मर्जी चाहे जैसे घूमे लेकिन लड़कियां अब शाम सही अपने घर में कैद हो जाए।


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उत्तर प्रदेश के हाथरस की बेटी के साथ जो कुछ भी हुआ, ऐसे भारत की कल्पना कभी नहीं की होगी हमारे राष्ट्रपिता ने क्यूंकि आज से तकरीबन 100 साल पहले महिला सशक्तीकरण का संदेश देनेवाले महात्मा आज शायद ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाते। गांधीजी हमेशा से नारियों को बराबरी का दर्जा देने का प्रयास करते रहते थे।

गांधी को नहीं पसंद थी पुरुषों की दासता 

महात्मा गांधी महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे। महात्मा गांधी ने यह स्वीकार किया था कि उन्हें अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर चलने की प्रेरणा अपनी मां और पत्नी से मिली।

पत्नी कस्तूरबा उस काल की परंपरागत पत्नियों से अलग थीं, पुरुषों की दासता उन्हें भी पसंद नहीं थी। उनका यह भी मानना था कि दांडी मार्च और सत्याग्रह महिला कार्यकर्ताओं की वजह से ही सफल हो पाया।

गांधी की सोच इस दौर के लोगों के लिए एक मिसाल 

महात्मा गांधी की महिलाओं के बारे में जो सोच है, उसे उनकी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ के साथ जोड़ कर देखा जाता है लेकिन उस दौर में भी उनकी सोच महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर जितनी सुदृढ़ थी वह इस दौर के लोगों के लिए एक मिसाल है।

 

आज बापू के विचारों पर फिर से गौर करने का समय है। लेकिन आज के समय मे समाज महिलाओ के सम्मान करना तो क्या उनको उनके नैतिक अधिकार तक नही देता।

 

 

 

 

 

 

 

 

ऐसे समय में जब महिलाओं पर अत्याचार के मामले आए दिन सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं, बापू का 99 साल पहले 15 सितंबर 1921 को यंग इंडिया में लिखा वक्तव्य आज भी सही प्रतीत होता है, 

आदमी जितनी बुराइयों के लिए जिम्मेदार है, उनमें सबसे घटिया नारी जाति का दुरुपयोग है।

सच्चाई यही है कि पुरुषों की मानसिकता में आज भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। पुरुषवादी मानसिकता ने महिलाओं को भोग की वस्तु और अपना गुलाम ही समझा है। गाँधीजी ने साफ-साफ कहा था कि वे अगर महिला होते तो पुरूषों द्वारा किए गए अत्याचार को कतई बर्दाश्त नहीं करते।

सीता और द्रौपदी को नारियों में आदर्श माना 

बापू ने सीता और द्रौपदी को नारियों में आदर्श माना था, इसलिए नहीं कि ये धार्मिक पात्र हैं, बल्कि इसलिए कि ये दोनों साहसी थीं और दोनों प्रतिरोध करना जानती थीं। 

कभी किसी के आगे झुकी नहीं। धर्म और परंपराओं में आस्था रखने वाले महात्मा ने इसे कभी बेड़ी की तरह नहीं देखा और कुरीतियों का विरोध किया। उनका मानना था कि परंपराओं की नदी में तैरना अच्छी बात है लेकिन उसमें डूब जाना आत्महत्या के समान है। अंततः बस यही कहा जा सकता है कि महिलाओ को अपने लिए आवाज़ खुद उठानी पड़ेगी अब कोई उन्हें बचाने नहीं आएगा।

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sneha singh

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