उत्तर प्रदेश में दलितों के खिलाफ लगातार बढ़ते हुए अपराध का ज़मीनी हालत ख़राब

उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म का अपराध 

देश के दो सबसे बड़े राज्य एक भौगोलिक क्षेत्र तो दूसरा आबादी के हिसाब से सबसे बड़ा राज्य है। इन दोनों राज्य कि हालत अपराध के कारण सबसे ख़राब है।नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज्यादा बलात्कार के मामले राजस्थान और उत्तर प्रदेश से दर्ज हुए। 

पूरा देश कोरोना महामारी के वजह से एक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा है।परन्तु हमारा देश इस महामारी से भी भयानक "दुष्कर्म की  महामारी"  से सदियों से पीड़ित है और यह दिन प्रति दिन हालात  बिगड़े ही जा रहें है। 

2019 में राजस्थान में करीब 6,000 और उत्तर प्रदेश में 3,065 बलात्कार के मामले सामने आए। उत्तर प्रदेश में बलात्कार के जितने केस दर्ज हुए, उनमें से 18 फीसदी पीड़ित दलित महिलाएं हैं। ये संख्या राजस्थान में दर्ज मामलों से करीब दोगुनी है।

देश में महिलाओं के खिलाफ पूरे अपराध में  14.7%  सिर्फ उत्तर प्रदेश से 

हाथरस में एक दलित लड़की से सामूहिक दुष्कर्म व उसकी बेरहमी से हत्या के बाद पूरे देश में गुस्सा है । पूरे देश में अलग अलग संगठन व राजनीतिक पार्टियाँ भी पीड़ित को न्याय दिल वाने के लिए सड़क पर उतर आई है। 

लेकिन आपको यह जानकर बहुत दुख होगा कि हाथरस केस के लिए जिस तरह सब न्याय की मांग कर रहे है, उस  तरह का सौभाग्य सभी लोगों को नहीं मिल पाता। 

हाथरस की घटना तो सिर्फ एक उदहारण है। इस तरह की बर्बरता उत्तरप्रदेश में नई नहीं है। और इस तरह के मामलों के बढ़ने का एक बहुत बड़ा कारण भी यही है दुष्कर्मियों को सजा नहीं मिलने से ही और लोगो में ऐसा दुस्साहस करने की हिम्मत आती है। 


आगे पढ़ें:हाथरस गैंगरेप में विधायक का विवादित बयान- बेटियों को संस्कारित करें, तभी रुकेंगे बलात्कार


भारत में 2019 में हर दिन रेप के 88 अपराध दर्ज़ 

अगर हम नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट को  देखे तो भारत में 2019 में हर दिन रेप के 88 मामले दर्ज़ किए गए। 

पूरा देश कोरोना महामारी के वजह से एक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा है।परन्तु हमारा देश इस महामारी से भी भयानक "दुष्कर्म की  महामारी"  से सदियों से पीड़ित है और यह दिन प्रति दिन हालात  बिगड़े ही जा रहें है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

साल 2019 में देश में रेप के कुल 32,033 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 11 फीसदी पीड़ित दलित समुदाय से हैं। उत्तर प्रदेश के  हाथरस में जिस तरह से एक 19 वर्षीय दलित लड़की के साथ कथित तौर पर सवर्ण समुदाय के चार लोगों द्वारा  सामूहिक बलात्कार और फिर  शारीरिक रूप से बुरी तरह प्रताड़ित करना।

यह पिछले दो महीने में उत्तर प्रदेश में यह पांचवीं घटना है जिसमें किसी लड़की के साथ बलात्कार के बाद क्रूरता पूर्ण ढंग से हत्या की गई  और इन पांचों मामले में से तीन मामले दलित समुदाय की लड़कियाँ से जुड़ी हैं।

उत्तर प्रदेश के योगी सरकार की न्यूनतम अपराध के वादे फेल साबित 

भदोही में 11 साल की दलित नाबालिक का सिर ईंट-पत्थर से कुचल कर हत्या कर दी गई। चकराजाराम तिवारीपुर गांव में दोपहर के वक्त दलित नाबालिक शौच के लिए गई थी। काफी देर तक नहीं लौटी तो परिजनों ने खेत की तरफ जाकर देखा। वहां खून से सनी बेटी की लाश पड़ी थी। चेहरे और उसके दूसरे अंगों पर चाकू से हमला करने के निशान थे।

14 सितंबर 2020 : हाथरस में 19 साल की एक दलित की बेटी कहते-कहते मर गई कि उसके साथ रेप हुआ है, लेकिन पुलिस ने उसकी एक न सुनी, बल्कि मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहती रही कि रेप नहीं हुआ था। इतना ही नहीं, पुलिस ने नाबालिक  के घरवालों से बेटी के अंतिम संस्कार का हक भी छीन लिया।रात के अंधेरे में नाबालिक के शव को उसी के गांव में ले जाकर जला दिया।परिजनों ने पुलिस के खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश की तो आरोप है कि डीएम साहब डराने के लिए उनके घर पहुंच गए, नाबालिक  के भाई ने कहा कि पुलिस घरवालों को डरा रही है।यहां तक की गांव में मीडिया की एंट्री पर भी रोक लगा दी गई। जब हंगामा बढ़ा तो आनन-फानन में योगी सरकार ने एक्शन लिया।

3 अक्टूबर 2020: कानपुर देहात में 3 अक्टूबर को एक नाबालिक लड़की का क्षत विक्षत शव मिला, हालत ऐसी की मानो कंकाल ही हो गई हो। उसके कपड़े और पास पड़े कुछ सामान से पता चला कि ये वही नाबालिग दलित लड़की है, जो पिछले एक हफ्ते से गायब थी। मां-पिता ने बेटी के गायब होने की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी। परिजनों के मुताबिक, मामला कानपुर देहात के रूरा गहोलिया गांव का है। 26 सितंबर को बच्ची शौच के लिए निकली थी। काफी देर तक नहीं लौटी तो खोजबीन के बाद पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई. लेकिन एक हफ्ते तक पुलिस लड़की तक नहीं पहुंच सकी। नतीजा उसकी मौत हो गई।

पूरा देश कोरोना महामारी के वजह से एक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा है।परन्तु हमारा देश इस महामारी से भी भयानक "दुष्कर्म की  महामारी"  से सदियों से पीड़ित है और यह दिन प्रति दिन हालात  बिगड़े ही जा रहें है। 

29 सितंबर 2020: जब देश हाथरस में कथित गैंगरेप की घटना पर दुख जता रहा था, उसी दौरान बलरामपुर में 22 साल की एक और दलित लड़की को नशे का इंजेक्शन देकर गैंगरेप किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 29 सितंबर को छात्रा बी.कॉम में एडमिशन लेकर लौट रही थी, तभी 6-7 आरोपियों ने छात्रा का अपहरण कर लिया फिर एक दुकान में ले जाकर गैंगरेप किया। फिर रिक्शे पर बैठाकर घर भेज दिया. इलाज के दौरान छात्रा ने दम तोड़ दिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में गैंगरेप की पुष्टि हुई है, चोट के कारण नाबालिक की आंत फट गई थी।

3 सितंबर 2020: लखीमपुर खीरी में 3 साल की बच्ची का शव मिला, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्ची का शव घर से आधा किलोमीटर की दूरी पर मिला। शरीर पर चोट के कई निशान थे,पुलिस का कहना है कि बच्ची का बलात्कार कर उसकी गला दबाकर हत्या कर दी गई थी।

दलितों के खिलाफ एक चौथाई अपराध सिर्फ उत्तर प्रदेश में

 उत्तर प्रदेश में सरकार बदली, लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ते गए। अगर में एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 में जब अखिलेश यादव की सरकार थी, तब महिलाओं के खिलाफ अपराध के 49,262 मामले दर्ज किए गए थे। साल 2017 में योगी की सरकार आई, लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कोई लगाम नहीं लगी। साल 2017 में 56,011 केस दर्ज किए गए। वहीं 2018 में ये आंकड़े बढ़कर 59,445 तक पहुंच गए. फिर साल 2019 में महिलाओं के खिलाफ कम नहीं हुए और 59,853 केस दर्ज हुए।

उत्तर प्रदेश में अपराधियों के  एनकाउंटर बढ़े, लेकिन अपराध कम नहीं हुए। लोकसभा में गृह मंत्रालय के जवाब के मुताबिक, योगी सरकार में साल 2017-18 में 37, साल 2018-19 में 55 और साल 2019-20 में 20 एनकाउंटर हुए। लेकिन इतने एनकाउंटर के बाद भी योगी सरकार अपराधियों में भय पैदा नहीं कर पाई और प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने में लगातार फेल होती रही है।

उत्तर प्रदेश में साल 2019 में दलितों के खिलाफ क्राइम रेट 28.6 

पूरा देश कोरोना महामारी के वजह से एक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा है।परन्तु हमारा देश इस महामारी से भी भयानक "दुष्कर्म की  महामारी"  से सदियों से पीड़ित है और यह दिन प्रति दिन हालात  बिगड़े ही जा रहें है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

NCRB के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 10 वर्षों में महिलाओं के बलात्कार का खतरा 44 फीसदी तक बढ़ गया है। इनमें भी दलित समुदाय की महिलाएं ज्यादा असुरक्षित हैं अपनी  जाति की वजह से है। एक तरफ वह सामाजिक दबाव के वजह से बलात्कार के मामले ​में रिपोर्ट दर्ज कराने से झिझकती हैं।  अगर वे एफ़आईआर दर्ज कराने की हिम्मत करें भी तो ज्यादातर पुलिस थाने में कोई उनकी बात नहीं सुनता। पुलिस की उनके प्रति ये उदासीनता ज्यादातर इसलिए होती है क्योंकि वे निचली जाति से हैं। और इसका सबसे ताजा उदाहरण हाथरस प्रकरण है। लेकिन अब अब वक्त आ गया है कि हमे बराबरी के अधिकार के लिए आवाज उठाया जाए। क्योंकि बिना आवाज उठाएं पुलिस और सरकार का उदासीन रवैया नहीं  बदलेगा।

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