बिहार चुनाव में अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री बनाने के लिए भाजपा का ‘घोषित’ और ‘अघोषित’ गठबंधन का सच

लोजपा का एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने का फ़ैसला

कोविड 19 महमारी के बीच बिहार  में होने वाली चुनाव  में  रोज एक नया रंग देखने को मिल रहा है। टिकटों का बटवारा शुरु होते ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बीच अपनी ताकत दिखा कर ज्यादा से ज्यादा सीटो के लिए भी खींचतान शुरू हो चुका हैं।

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इसी कड़ी में मन मुताबिक़  सीटें ना मिलने से नाराज़ होकर लोजपा  ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया है। कल लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने अपने कार्यकर्ताओं के नाम भावुक पत्र लिख कर पार्टी कार्यकर्ताओं से मदद मांगी और साथ ही उनका यह कहना कि  बिहार में आने वाली दिनों में भाजपा लोजपा की सरकार बनेगी।

उनके इस बात से यह अंदाजा लगता है कि भाजपा एलजेपी और जेडीयू दोनों से घोषित या अघोषित गठबंधन करना चाहती है। वो बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने का कोई मौका खोना नहीं चाहती। 

एलजेपी ने 143 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करने के दिए संकेत

एनडीए में रहते हुए लोक जनशक्ति पार्टी का अलग से चुनाव लड़ना भाजपा की चाल लगती है। इस बात का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया का सकता है कि लोक जनशक्ति पार्टी अपने ज्यादातर उम्मीदवार उन्हीं सीटों पर उतारेगी जिन पर जेडीयू के उम्मीदवार होंगे और जिन सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार होंगे, उन पर एलजेपी अपने प्रत्याशी नहीं उतारेगी और भाजपा का समर्थन करेगी।  

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भाजपा ने भले  ही आधिकारिक रूप से  नीतीश कुमार को ही अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार मान लिया हो। परन्तु भाजपा के कई  स्थानीय नेताओं ने कई बार  बयान दिया  है कि बिहार में मुख्यमंत्री अब भाजपा का होना चाहिए।

खासतौर पर भूमिहार नेता गिरिराज सिंह कभी खुलकर तो कभी दबे सुर में मुख्यमंत्री बनने की इच्छा भी जताते रहे हैं।  और  हर कोई ये जानता ही है कि छोटे नेता जो भी कुछ भी कहते रहे हैं, उसमें बड़े नेताओं की सहमति रही है। 


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चुनाव में भाजपा के जाल में घिरे और आरजेडी का भरोसा खो चुके जेडीयू के लिए मुश्किल 

हम  इस पूरे राजनीतिक गणित को इस तरह समझ सकते है । भाजपा की रणनीति यह है कि जदयू की सीट आरजेडी से तो  ज्यादा आए लेकिन भाजपा से कम , ताकि चुनाव के बाद बड़ी पार्टी होने का हवाला देकर वह मुख्यमंत्री पद का दावा कर सके इस स्थिति में लोजपा का साथ भी भाजपा को मिल जाएगा।

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लेकिन जदयू अकेली पड़ जाएगी क्योंकि, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से भी अगर वह गठबंधन करना चाहेंगे तो वह राजी नहीं होंगे, और अगर हो भी जाए हो मुख्यमंत्री सहित अन्य महत्वपूर्ण पद वह जदयू को नहीं देना चाहेंगे।

  जदयू के लिए मुश्किल यह भी है कि कुशवाहा समाज के प्रभावी नेता उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी बनाकर जेडीयू से पहले ही अलग होकर लड़ रहे हैं, और  इसमें अगर पासवान की एलजेपी भी सेंध लगा दे तो निश्चित ही भाजपा उम्मीद पूरी हो सकती है और नीतीश मुश्किल में पड़ सकते है।

अब देखना यह है कि चुनावी नतीजों के बाद आखिर कौन मुख्यमंत्री कि कुर्सी हासिल कर पाता है, किसका गणित पास और फेल होता हैं।

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Sabeeh Akhter

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