जानिए आख़िर मौजूदा भारतीय राजनीति में कांशीराम की राजनीतिक रणनीति कितनी प्रासंगिकता है

कांशीराम की राजनीतिक रणनीति

भारतीय संविधान के तहत सभी नागरिकों को अधिकार मिले हैं, लेकिन फिर भी समाज में दलित और वंचित वर्ग इन अधिकारों से कई दूर है। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में पिछड़े वर्ग के बीच उनके अधिकारों को लेकर चेतना जागृत करने का श्रेय कांशीराम को जाता है।जिनकी बदौलत दलितों और वंचित समूहों में आत्मसम्मान और स्वाभिमान तथा मानवीय गरिमा की भावना का संचार हुआ।
इन 10 बातों ने कांशीराम को दलित राजनीति का चेहरा बनाया - BBC News हिंदी

भारत विविधताओं से भरा हुआ है जहां कई वर्ण, भाषा, जाति के लोग रहते है। वही इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि भारतीय समाज में घोर सामाजिक-आर्थिक विषमता भी शामिल है।

कांशीराम और वंचित वर्गों के उत्थान में उनकी भूमिका

कांशीराम बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक थे। उन्होंने भारतीय राजनीति में दलितों का प्रतिनिधित्व किया। उनका मानना था कि लोगों को अपने हक के लिए गिड़गिड़ाना नहीं, बल्कि लड़ना चाहिये।

कांशीराम आज होते तो दलित राजनीति का चेहरा भी कुछ ज्यादा सयाना हो सकता था

कांशीराम को दुनिया अलविदा लिए 14 वर्ष हो गए हैं और बीते कुछ वर्षों में देखा जाए तो महिलाओं, अल्पसंख्यकों व दलितों में होने वाले अत्याचारों में वृद्धि हुई है। मौजूदा समय में लोगों के बीच अन्याय और अत्याचार का मुंह तोड़ जवाब देने के लिए कांशीराम आज भी प्रासंगिक है।


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वंचितों को अपने समाचार सेवाओं की स्थापना करनी चाहिए

वे कहते थे कि दलितों और पिछड़े वर्गों को अपने समाचार सेवाओं की स्थापना करनी चाहिए क्योंकि मुख्यधारा की मीडिया दलित, महिलाओं व वंचितों पर होने वाले अत्याचार को जगह नहीं देती।

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मीडिया सरकार के झूठे वादे, अपराधों को उजागर नहीं करती। मौजूदा समय में भी कांशीराम की यह बातें पूरी तरह से प्रासंगिक है। वे कहते थे कि वंचित वर्गो को अपनी बात शेष जनता तक पहुंचाने के लिए अपने समाचार सेवा स्थापित करने चाहिए।

वंचितों को अपने संगठन बनाने चाहिए

उनके अनुसार वंचित वर्गों को खुद अपने प्रतिनिधित्व के लिए अपना स्वतंत्र संगठन बनाना चाहिए। संगठन वंचितों के मुद्दों को मुख्यधारा से जोड़ने का काम करता है। अपने कार्यकाल में उन्होंने बामसेफ, डीएसफोर और बीएसपी का गठन किया था।

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वे कहते थे कि जनता की समस्याओं के लिए जन सांसदों का निर्माण करना चाहिए। उनका तर्क था कि वंचित वर्गो, महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों का प्रतिनिधित्व सांसदों में कम है। जन संसद लोगों की आवाज़ मुख्यधारा तक पहुँचाने में भूमिका निभाती है।

कांशीराम ने अन्याय मुक्त क्षेत्र की संकल्पना रखी

उन्होंने अन्याय मुक्त क्षेत्र की संकल्पना रखी, जो उन जिलों के लिए खास रणनीति बनाएं जहां पर दलितों, महिलाओं पर अत्याचार अत्यधिक किया जाता है।

यदि कांशीराम न होते ? | hastakshep | हस्तक्षेप

आज के समय में भी कई ऐसे क्षेत्र मौजूद है जहां दलितों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार कई अधिक है। ऐसे क्षेत्रों में इस रणनीति की काफी जरूरत है।

जन्मजात श्रेष्ठता की भावना को नष्ट करना 

कांशीराम मानते थे कि लोगों के बीच मौजूद जन्मजात श्रेष्ठता की भावना को नष्ट किया जाना चाहिए। वह असमानता का सबसे बड़ा कारण ब्राह्मणवाद को मानते थे।

जिसमें लोग खुद को जन्म से ही श्रेष्ठ मानकर अन्य वर्गों के साथ असमानता का व्यवहार करते है। आज के समय में भी देखा जाए तो इस जन्मजात श्रेष्ठता की वजह से कई लोग भेदभाव और अत्याचार का शिकार होते है।

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