बिहार चुनाव: लोजपा और भाजपा पार्टी की सांठगांठ की रणनीति आखिर कितनी कारगर होगी

लोजपा और भाजपा सरकार की सांठगांठ की रणनीति 

बिहार चुनाव का डंका बज चुका है, 28 अक्टूबर से तीन चरणों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। इसी बीच लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) बिहार चुनाव में एनडीए से अलग होकर अपना भाग्य आजमाने जा रही है।

लोजपा ने फैसला कर लिया, है कि वह बिहार चुनाव में एनडीए के गठबंधन से अलग होगी। हालांकि लोजपा के अकेले चलने की रणनीति के बावजूद वह बीजेपी के अलगाव नहीं करेगी।

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लेकिन अब परिस्थितियों में कुछ बदलाव है क्योंकि गुरुवार शाम लोजपा संरक्षक और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का निधन हो गया। ऐसे में चिराग द्वारा पहले से सोची गई रणनीति में बदलाव आ गया है।

वही, लोजपा ने जदयू उम्मीदवारों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि वह भाजपा के उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ेगी।


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एनडीए की पार्टी  बैठक में चिराग पासवान को झटका

गठबंधन को लेकर एनडीए की बैठक की गई थी जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी, बिहार भाजपा चुनाव प्रभारी देवेंद्र फडणवीस, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल और बिहार भाजपा प्रभारी भूपेंद्र यादव बैठक में शामिल हुए थे।

पार्टी

इसी बैठक में भाजपा द्वारा लोजपा नेता चिराग पासवान को झटका दिया गया जिसमें भाजपा ने यह स्पष्ट किया है कि नीतीश कुमार बिहार में राजद नेता है तथा गठबंधन उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगा।

इसके अलावा उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि, “नीतीश कुमार उनके मुख्यमंत्री होंगे तथा किसी भी पार्टी को चुनाव में कितनी भी सीटें मिले, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।“

बिहार में लोजपा पार्टी ने लगाया पोस्टर

बताया जा रहा है कि बिहार में लोजपा ने कुछ पोस्टर लगाए गए हैं। इन पोस्टरों में लिखा हुआ है “मोदी से कोई बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं” इन पोस्टरों को देखकर फरवरी 2005 में हुए चुनाव का आभास होता है जिसमें लोजपा केंद्र में कांग्रेस यूपीए के गठबंधन का हिस्सा थी तथा बिहार में यूपीए के प्रमुख घटक दल राजद के खिलाफ चुनाव में खड़ी हुई थी।

चुनावों को लेकर राजनीतिक पार्टी  विश्लेषकों के अलग-अलग नज़रिए

चुनाव में लोजपा की रणनीति को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के नजरियों में भिन्नता दिखाई दे रही है।राजनीतिक जानकार नवल किशोर चौधरी के अनुसार, “रामविलास पासवान के निधन से सहानुभूति का माहौल बनेगा, जिससे चिराग को फायदा होगा।

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“ पासवान और दलित जातियों के वोट से कुछ हद तक उन्हें अन्य तबके के वोट भी मिलने की संभावना बन सकती है।“ हालांकि, उनका कहना है कि यह फायदा इतना बड़ा नहीं होगा कि उसे चुनाव परिणामों में बहुत बड़ा असर पड़े।“

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का मानना है कि, “लोजपा को कोई फायदा नहीं होगा। हालांकि, चिराग के फैसले से भाजपा को फायदा हो सकता है।“

वही कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चिराग ने यह फैसला अपने विकल्पों को खुला रखने के लिए लिया है। वहीं कुछ का मानना है कि वह भाजपा की रणनीति है कि वे नीतीश कुमार को किनारे लगाना चाहती है।

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