बिहार: कोसी नदी का सितम झेल रहा है पिपराही गांव, प्रशासन की अनदेखी लोगों के लिए बनी आफत

पिपराही गांव में कोसी नदी का कहर

बिहार के सुपौल जिले के निर्मली विधानसभा क्षेत्र में पिपराही गांव है, जो कि सिकरहट्टा-मंझारी तट बंध पर दिघीया चौक से करीब ढाई किलोमीटर की दूरी पर है। इस गांव में प्रवेश करने के लिए नदी की एक धारा को नाव से पार करना पड़ता है।लेकिन इसे पार करना आम जनता के लिए बहुत ही जोखिम भरा काम है।

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दरअसल, पिछले तीन-चार महीनों से यह धारा नदी की मुख्य धारा के रूप में परिवर्तित हो गई है। इसी साल मई से सितंबर के बीच इस स्थान पर करीब 5 बार बाढ़ भी आ चुकी है। इसके जलस्तर में बढ़ोतरी की वजह से इसे बिना नाव के पार करना संभव नहीं है।

अन्न-पानी की तरह लोगों के लिए नाव बेहद जरूरी

पिपराही गांव में नाव से आते-जाते लोग (सभी फोटो: मनोज सिंह)

कोसी नदी के करीब में रहने वाले लोगों के लिए नाव बेहद जरूरी है। गांव के बाहर आवाजाही, फसलों की ढुलाई, महिलाओं, बच्चों तथा बीमार लोगों को अस्पताल तक जाने के लिए नाव ही एकमात्र सहारा है।लोगों को हादसों से बचाने के लिए तथा खेती के लिए यहां नाव की सख्त जरूरत है। लेकिन सरकार द्वारा कोसी प्रोजेक्ट में किए गए दावों के उलट यहां आज तक कोई व्यवस्था नहीं की गई।


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जाने, पिपराही गांव के पश्चिमी और पूर्वी तट बंध का इतिहास

पिपराही गांव पश्चिमी और पूर्वी तट बंध के बीच स्थित है। यह दोनों तटबंध कोसी नदी के हैं तथा इन्हें 1954 में कोसी प्रोजेक्ट के तहत बनाना शुरू किया गया था। 1962 तक यह बनकर तैयार हो गया था।

घर बनवाने के लिए पैसे जुटाए थे लेकिन गांव का हाल देखकर नाव बनवा ली'
वहीं पश्चिमी तट बंध के अंदर करीब 14 साल बाद सिकरहट्टा-मंझारी तटबंध बनाया गया। इससे सिकरहट्टा- मंझारी लो तटबंध (एसएमएलई) कहा जाता है। इस तटबंध की लंबाई 18 किलोमीटर है। लेकिन इसकी हालत काफी खस्ता है।

सेना के जवान गुणानंद ने बनवाई नाव, ‘फ़ौजी की नाव’ के नाम से प्रसिद्ध

गांव के पूर्व सरपंच रामजी के भतीजे गुणानंद, जो कि सेना के जवान हैं, ने 3 लाख खर्च कर 8 महीने में एक नाव बनवाई।
उनके अनुसार नाव को बनवाने में 26 क्विंटल लोहा लगा तथा प्रति क्विंटल के हिसाब से 3,500 मजदूरी दी गई। वे कहते हैं कि, “इस नाव ने हमें भरोसा दिया कि बाढ़ के समय हम सरकार प्रशासन के भरोसे नहीं रहेंगे।

घर बनवाने के लिए पैसे जुटाए थे लेकिन गांव का हाल देखकर नाव बनवा ली'

“वे आगे कहते हैं कि हम गांव में सरकार को दो-तीन नाव हमेशा के लिए देनी , जो उनके काम आए गांव के लोग 3 लाख लगाकर नाव नहीं बनवा पाएंगे, मैं नौकरी में था तो किसी तरह इंतजाम कर पाया।“रामजी ने बताया की उन्होंने सुपौल के सांसद से नाव की व्यवस्था करवाने के लिए कहा था जिसके जवाब में सांसद ने कहा कि उन्होंने 50 गांव की व्यवस्था की है, लेकिन लोगों को कोई नाव नहीं मिली।

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