सियासी विरासत नहीं बल्कि अब चुनावी  मैदान में उतरा मनरेगा मज़दूर संजय

चुनावी  मैदान में उतरा मनरेगा मज़दूर संजय

मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले से करीब 15 किलोमीटर दूर  रत्नौली गांव के रहने वाले 33 वर्षीय संजय साहनी कुढ़नी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार हैं। संजय सातवीं तक पढ़े हुए हैं और  लंबे समय तक प्रवासी कामगार के बतौर दिल्ली में रहे हैं। संजय महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी (मनरेगा) योजना को लेकर गरीब लोगों को जागरूक करने के लिए जाने जाते हैं।इस उम्मीदवार के पास न धनबल है और न बाहुबल पर आज वें विधानसभा चुनाव में अलग कारणों से चर्चा में है।

अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रचार करते संजय साहनी. (सभी फोटो: उमेश कुमार राय)

प्रवासी कामगार से कार्यकर्ता तक

ये सफर तय करना आसान नहीं था उनके लिए ,लंबे समय तक संजय ने दिल्ली में काम किया और उसके बाद वह गांव लौट गए और महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी (मनरेगा) योजना को लेकर लोगों को जागरूक करने लगे। जानकारी से  पता चला कि 25 अक्टूबर की शाम संजय प्रिंटिंग प्रेस की एक दुकान में अपना पर्चा छपवाने में व्यस्त थे। संजय को अलमारी चुनाव चिह्न मिला है। 25 अक्टूबर का पूरा दिन उनका इस कार्य में बीता।

संजय ने बताया, ‘अगर खुद बैठकर पर्चा नहीं बनवाऊंगा तो बहुत देर हो जाएगी इसलिए खुद लगना पड़ा। संजय ने यह भी बताया कि वह दिल्ली एक मज़दूर बनकर गए थे। उन्होंने बिजली मिस्त्री का काम सीखा था और वहीं जनकपुरी में एक छोटा-सा स्टॉल लगा कर अपना मोबाइल नंबर डाल दिया, ताकि जिसे इलेक्ट्रिशियन की जरूरत हो, वो कॉल कर बुला सके।


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मनरेगा आख़िर है क्या?

साल 2012 में संजय अपने गांव रत्नौली लौटे, तो गांव के आसपास के लोगों से उन्होंने मनरेगा की चर्चा सुनी। लोगों की चर्चा से पता चला कि मनरेगा का नाम लेकर अधिकारी लोग आते हैं और मनरेगा कार्ड,  बैंक एकाउंट और अंगूठे का निशान लेकर चले जाते हैं।

बिहार चुनावः लाखों लोगों तक मनरेगा को पहुँचाने वाले एक मज़दूर भी हैं मैदान में - BBC News हिंदी

गांव के लोगों  को पता ही नहीं था कि उनके साथ क्या हो रहा है। संजय ने जब ये सुना, तो उन्हें बहुत अजीब सा लगा। वह सोचने लगे कि ये मनरेगा आख़िर है क्या?जब वह दिल्ली लौटे, तो एक दिन अपनी दुकान पर बैठे हुए थे।कोई फोन कॉल नहीं आ रहा था, तो वह सामने के एक साइबर कैफ़े में चले गए और इंटरनेट पर बिहार मनरेगा सर्च किया।वह कहते हैं, ‘इंटरनेट पर मुझे एक सूची मिल गई, जिसमें मेरे गांव के लोगों के पास मनरेगा के तहत कितने रुपये मिले, इसका ज़िक्र था।संजय ने प्रिंट आउट निकलवा लिया और दो दिन बाद ही अपने गांव लौट आए।प्रिंट आउट में जिन लोगों का नाम था उनसे पूछा कि क्या उन्हें उतने रुपये मिले हैं, जिसका जिक्र प्रिंट आउट में है, तो उन्होंने पूरी तरह अनभिज्ञता जाहिर की।

बिहार चुनावः लाखों लोगों तक मनरेगा को पहुँचाने वाले एक मज़दूर भी हैं मैदान में.... - Chana Murra

संजय ने कहा, ‘उल्टे लोग ये कहने लगे कि मैं उन लोगों को बेवकूफ बना रहा हूं।उन्हें लग रहा था कि मैं फर्जी कागज लेकर उनके साथ जालसाज़ी करना चाहता हूं।लोगों ने मुझे झूठा कहकर वहां से भगा दिया।संजय वापस दिल्ली लौट आए, और उन्होंने दोबारा इंटरनेट टटोला,इस बार उन्होंने गूगल पर मनरेगा कॉन्टैक्ट लिखा, तो आरटीआई कार्यकर्ता निखिल डे, मनरेगा पर काम कर रहे बेल्जियम मूल के अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज आदि का मोबाइल नंबर मिला।

इन नंबरों पर कॉल कर उन्होंने गांव में मनरेगा में हो रही धांधली की बात बताई, तो वे मदद को तैयार हो गए।वह फिर गांव लौट आए और दोबारा लोगों को जागरूक करना शुरू किया।उन्होंने कहा, ‘लोगों को जागरूक करना आसान नहीं था। मुझे लगता था कि मैं इलेक्ट्रिशियन हूं, मनरेगा के बारे मे मैं कुछ नहीं जानता। मेरी बातों को लोग तवज्जो नहीं देते थे। लेकिन मैं ब्लॉक दफ्तर से लेकर मुखिया-सरपंच के पास जाता रहा और लोगों को भी जागरूक करता रहा।

संजय की कोशिश और फल

अभिनेता आमिर खान अपने शो ‘सत्यमेव जयते’ में संजय साहनी पर एक कार्यक्रम कर चुके हैं।साहनी की कोशिशों का असर जमीन पर दिखता भी है।उनके बनाए संगठन समाज प्रगति शक्ति संगठन अभी कुढ़नी विधानसभा की 39 पंचायतों के अलावा वैशाली में सक्रिय है।ये संगठन मनरेगा मजदूरों के लिए रोज़गार सुनिश्चित कराता है और समय पर मज़दूरी के भुगतान के लिए संघर्ष करता है।रत्नौली पंचायत के महंत मनियारी गांव की 55 साल की मंदेश्वरी देवी लिखना-पढ़ना नहीं जानती हैं, लेकिन उन्हें पता है कि मनरेगा का काम किस अधिकारी के पास होता है और इसके लिए आवेदन की प्रक्रिया क्या है।वे ये भी जानती हैं कि मनरेगा का काम ख़त्म होने के बाद अधिकतम 15 दिनों के भीतर पैसा आ जाना चाहिए।

बिहार चुनावः लाखों लोगों तक मनरेगा को पहुँचाने वाले एक मज़दूर भी हैं मैदान में - BBC News हिंदी

इसी गांव के रामलाल साहनी कहते हैं कि संजय के प्रयास से ही उन्हें 100 दिनों का रोज़गार मिल पा रहा है और वह चाहते हैं कि संजय चुनाव जीतें।संजय अभी खुद भी मनरेगा मज़दूर हैं और जब मनरेगा का काम नहीं मिलता है, तो वह इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं। घर में पैसे की कमी रहती है।उनके दो बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई का खर्च उनका एक दोस्त उठा रहा है।

संजय क्राउंड फंडिंग से चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले एक हफ़्ते से ज्यां द्रेज रत्नौली में रह रहे हैं।वह कभी मोटरसाइकिल, तो कभी साइकिल और कभी टैम्पू से संजय साहनी के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। उनके अलावा युवाओं की एक टीम भी है, जो एक झोपड़ी में बैठकर सोशल मीडिया पर उनके लिए प्रचार और पंचायत स्तर पर प्रचार अभियान को को-ऑर्डिनेट कर रही है।

मनरेगा के मज़दूर  ने अचानक  क्यों सोचा चुनाव लड़ने को?

बिहार चुनावः लाखों लोगों तक मनरेगा को पहुँचाने वाले एक मज़दूर भी हैं मैदान में - BBC News हिंदी

उत्तर में संजय कहते हैं कि , ‘मनरेगा को लेकर हम लोग संघर्ष कर रहे थे, लेकिन हमारी राह में रुकावटें पैदा की जा रही थीं। सरकार हमें संघर्ष भी करने नहीं दे रही थी, तो हम मज़दूरों ने मिलकर सोचा कि जब किसी को वोट देना ही है, तो क्यों न अपने बीच के किसी व्यक्ति को वोट दिया जाए। इस तरह हमारे मज़दूर भाइयों की इच्छा से मैं चुनाव मैदान में आ गया।

संजय मतदाताओं को सब्जबाग नहीं दिखा रहे हैं, बस उन्हें भरोसा दिलवा रहे हैं कि अगर वह जीतते हैं तो मनरेगा मज़दूरों को काम के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाना होगा।वे मनरेगा के तहत ज़्यादा से ज़्यादा काम दिलवाएंगे।इसके अलावा वह अच्छी शिक्षा दिलाने का भी आश्वासन दे रहे हैं।उन्होंने कहा, ‘अगर मैं जीतकर विधायक बना, तो ब्लॉक दफ्तर में ही अपना कार्यालय खोलूंगा, ताकि मनरेगा के तहत काम मांगने गए किसी मज़दूर को खाली हाथ नहीं लौटना पड़े।

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