बिहार के मजदूर ने कहा “लॉकडाउन में जानवरों जैसा सलूक हुआ”, अब चाहते हैं बदलाव

राज्य से बाहर बसे मजदूर ने कहा 

मदन पासवान नाम से एक मजदूर जिनकी उम्र 37 वर्ष है उन्होंने अपना बिहार से लेकर देहरादून तक का सफर हमसे साझा किया। बिहार वासियों को कोरोना वैक्सीन मुफ्त मिलने पर उनका कहना है कि कुछ भी मुक्त नहीं मिलता अगर मिलेगा भी तो पूरे देश को मिलेगा केवल बिहार को नहीं। मदन देहरादून के फुटपाथ पर चाय का ठेला लगा कर अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरी करते हैं। उनका जीवन काफी संघर्षों से बिता है। मदन नीतीश सरकार से काफी खफा थे उनका कहना है कि 15 साल में नीतीश सरकार ने गरीब मजदूरों के लिए कुछ नहीं किया उल्टा लॉकडाउन में मजदूरों को दोहरी मार झेलनी पड़ी एक तरफ तो नीतीश सरकार ने मजदूरों के घर वापसी का कोई प्रबंध नहीं किया दूसरी तरफ जो लोग आ रहे थे उन्हें सैनिटाइजर की जगह केमिकल से नहला दिया गया।

 

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20 साल पहले काम की तलाश में देहरादून आए थे

मदन पासवान अपनी जिंदगी के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि वह 20 साल पहले ही देहरादून आ गए थे और यही रहने लगे थे।देहरादून में उन्होंने चाय का ठेला लगाने का काम शुरू किया और उनका कहना है कि उनके जैसे लाखों बिहारी ऐसे ही दूसरे राज्य में जाकर छोटा मोटा काम करते हैं क्योंकि बिहार में तो दो पैसे कमाना आज के जमाने में बहुत मुश्किल हो गया है। उनकी बातों से साफ नजर आ रहा था कि वह बिहार सरकार से काफी खफा और नाराज थे।

मधुबनी में रह रहे बेटों से कहा नौकरी जो देगी वोट उसे दें

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मदन पासवान आगे बातचीत के दौरान बताते हैं कि मधुबनी में उनका पूरा परिवार रहता है और उनके दो जवान बेटे इस बार पहली बार वोट डालेंगे। उन्होंने अपने बेटों से कह दिया है कि “इस बार उसी पार्टी को वोट देना जिन्होंने नौकरी देने का वादा किया है नहीं तो तुम्हारी जिंदगी भी तुम्हारे पिता के जैसे चाय का ठेला लगाने में बीत जाएगी”। पासवान बताते हैं कि 2018 में उन्होंने एक किराए का दुकान मुद्रा योजना लोन के तहत लिया था लेकिन उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया जिसकी वजह से उन्हें दुकान खाली करनी पड़ी। दुकान का लोन देने में ₹24000 भी लग गए और इसके बाद ही उन्होंने चाय का ठेला शुरू किया।


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क्या है दूसरे मजदूर लोगों का कहना?

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देहरादून के ही इंदिरा कॉलोनी में रह रहे दूसरे बिहारी मजदूर भी नीतीश सरकार से नाराज नजर आ रहे हैं। उनमें से एक हैं रामेश्वर यादव। सिवान के मूल निवासी रामेश्वर यादव ने लॉकडाउन में उनके जीवन में आया बदलाव साझा किया। उनका कहना था कि 4 से 5 महीने उन्हें एक छोटे से कमरे में रखा गया। बिहार सरकार की तरफ से जारी की गई मजदूरों के लिए स्कीम जिसमें ₹1000 का कैश मिलता है वह भी अभी तक रामेश्वर यादव को नहीं मिल पाया है।

उनके साथ रह रहे 10 अन्य लोगों का भी यही हाल है उसमें से एक हरेंद्र नाम से व्यक्ति बताते हैं कि किसी तरह घर वालों से संपर्क हो पाया और उन्होंने कुछ पैसे भेजे जिसके तहत वह गुजारा कर सके।हरेंद्र का कहना है कि चिराग पासवान ने एनडीए का दामन छोड़कर बिल्कुल सही काम किया। हमें उनसे आशा है कि वह बिहार में बदलाव अवश्य लाएंगे लेकिन यह बदलाव तभी आएगा जब ईवीएम मशीन सही तरीके से काम कर पाए वह हंसते हुए बताते हैं।

इन्हीं सब में से एक दूसरे मजदूर का कहना है कि उन्होंने राजद का शासन काल भी देख लिया और नीतीश सरकार का शासन काल भी चुनाव अभियान में एक धंधा बन गया है।चुनाव करीब आते ही सारे नेता बड़े बड़े वादे करने जनता के पास पहुंच जाते हैं और वोट मिल जाने के बाद अपना शक्ल तक दिखाने 5 साल नहीं जाते हैं।यह अभी से नहीं बल्कि कई वर्षों से चली आ रही एक दुर्भाग्यपूर्ण  प्रथा बन गई है।

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Aparna Vatsh

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