धूमिल की कविता में वो ‘तीसरा आदमी’ कौन है जो रोटियों से खेलता है?

अगर जन कवि धूमिल आज़ होते 

एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो ना रोटी बेलता है और ना रोटी खाता है 

वो सिर्फ़ रोटी से खेलता है 

मैं पूछता हूं

‘यह तीसरा आदमी कौन है?’

मेरे देश की संसद मौन है

असल में सवाल तो यह है कि अपने समय में भारत माता  के कष्टों को दूर करने के लिए उनके खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए खुद को समर्पित करने वाले जन कवि धूमिल अगर आज़ जीवित होते तो देशद्रोही करार देकर उन्हें डराया या धमकाया जाता? जहां आज़ आवाज़ उठाने के डर से पहले ही लोग सोचसोच कर नहीं थकते। वहां जनकवि जो आम आदमी पर बढ़ते उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज़ उठाने का प्रयत्न करते रहे हमेशा आज़ उसपर ही देशद्रोह करार लगा दिया जाता।

Revolutionary Hindi Poet Sudama Panday Dhoomil Poems And Contribution To New Stream Of Hindi Poetry - सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' : हिंदी कविता के 'एंग्री यंग मैन' - Amar Ujala Kavya

परन्तु आज़ अगर धूमिल जीवित होते तो देश प्रेम और देशद्रोह की इस बहस का सटीक़ उत्तर दे देते। सबको अच्छी तरह समझा देते  कि देश क्या है और देश प्रेम क्या है। सच तो यह है कि क्या हम मां के सुंदर चेहरे का गुणगान करने के चक्कर में उनके दुख़ और पीड़ा को भूल जा सकते हैं?ऐसे में सच्चे पुत्रों में से थे धूमिल जिन्होंने देश में व्याप्त बुराइयों के लिए आवाज़ उठाकर खुद को सर्वस्व समर्पित किया तो ऐसे में जनकवि धूमिल कैसे अपनी मां के विरोधी  हो सकते हैं। 

धूमिल अपनी कविता में हमेशा एक़ ऐसे आम आदमी के रूप में बात करते हैं जो बहुत संवेदनशील है और वे चाहते थे कि उसके आस-पास सब कुछ खूबसूरत हो और वे तब तक़ खुश नहीं हो सकते थे जब तक़ धूमिल सबके हिस्से कुछ खुशियां नहीं देख़ लेता। यहां तक़ की जनकवि धूमिल ने अपनी कविता ‘पटकथा’ में कहा भी है कि वे इंतजार करते रहे कि देश में जनतंत्र, त्याग और स्वतंत्रता, संस्कृति, शांति और मनुष्यता का राज़ हो।


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धूमिल मिली हुई आजादी के स्वरूप से चिंतित,परेशान और उद्विग्न थे।उनकी कविता में परंपरा, सभ्यता, सुरुचि, शालीनता और भद्रता का विरोध है क्योंकि इन सब की आड़ में जो हृदय पलता है उसे धूमिल पहचानते हैं। कवि धूमिल यह भी जानते हैं कि व्यवस्था अपनी रक्षा के लिये इन सबका उपयोग करती है इसलिये वे इन सबका विरोध करते हैं।

धूमिल

इस विरोध के कारण उनकी कविता में एक़ प्रकार की आक्रामकता मिलती है। किंतु उससे उनकी कविता की प्रभावशीलता बढती है।धूमिल के जन्मदिन पर हमें विचार करना चाहिए कि जिस धूमिल ने देश की व्यवस्था की कमजोरियों और नागरिकों से उसकी दूरी को इतना नंगा किया उस देश में धूमिल जैसे स्वर के लिए कितनी जगह बची हुई है।

जन कवि धूमिल होते तो क्या निर्भय होकर अपनी पंक्तियां लिख़ सकते?

धूमिल की कविताओं में ये साफ़ झलकता है कि वे अपने मुल्क़ से बेइंतहा मोहब्बत करते हैं और इसलिए जिन मूल्यों से यह देश बना था।उन मूल्यों को टूटता देख़ तड़प जाते हैं। धूमिल देश निवासियों को समझाना चाहते हैं कि भुखमरी और बेरोजगारी में फंसी जनता अगर पस्त है तो कवि राष्ट्रवाद में अंधा नहीं हो सकता।

धूमिल

धूमिल अकविता आन्दोलन के प्रमुख़ कवियों में से एक़ हैं। धूमिल अपनी कविता के माध्यम से एक़ ऐसी काव्य भाषा विकसित करते हैं जो नई कविता के दौर की काव्य- भाषा की रुमानियत,अतिशय कल्पनाशीलता और जटिल बिंबधर्मिता से मुक्त है। उनकी भाषा काव्य-सत्य को जीवन सत्य के अधिकाधिक़ निकट लाती है।

धूमिल की नक्सलबाड़ी कविता दिखाती है कि किस तरह हमने इस देश को नफरत की आंधी में झोंक़ दिया है। जो नफरत की फसल हमने तैयार की है वह परिवारों के भीतर पैठ चुकी है। वह संविधान की आत्मा पर खरोंच लगा रहा है और वह देश के समतावादी मूल्यों को चोटिल कर रहा है और हम थोड़ा भी सचेत होने के लिए तैयार नहीं हैं।

हताशा के कवि नहीं ,बल्कि करुणा और यथार्थ के कवि धूमिल

जनकवि धूमिल कहते हैं कि देश और आजादी के मायने क्या हैं अगर परिवेश इतना जहरीला हो चुका है। आसमान अगर धुंए से ढंक़ चुका है। देश प्रेम, आजादी, मनुष्यता, प्रेम की बातें वहां खोखली प्रतीत होती हैं जहां नफरत की फसल दिन-रात बोई जा रही हो। धूमिल की दो कविताएं- भाषा की रात और पटकथा इनका खाका शानदार तरीके से खींचती हैं।

धूमिल

उनकी कविता यह भी बताती है कि धूमिल निराशा हताशा के कवि नहीं हैं बल्कि क्षोभ, करुणा, और यथार्थ के कवि हैं।अपने आस-पास की दुनिया में मजलूमों के साथ हो रहे जुल्मों से परेशान हैं।

हम आपको सच कहें तो अभिव्यक्ति की आजादी दरअसल पहली आजादी होती है क्योंकि वह सिर्फ अपने विचारों को कहने-लिखने से आगे अपनी तरह से रहने-जीने-सोचने, खाने-पीने, प्रेम करने, सपने साकार करने और बड़ी हद तक़ अपने ढंग से मरने की छूट तक़ जाती है। हमारा सोचना-बोलना ही नहीं ,रहना और जीना भी मानवीय अभिव्यक्ति का हिस्सा है और इस सबके बगैर कोई भी आजादी अधूरी होगी। 

 

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