बिहार के किसान को 2020 में नहीं मिला मक्के की फसल का सही दाम

बिहार में भूख हड़ताल और लाख विनती के बावज़ूद नहीं मिली कोई मदद

बिहार में इस वर्ष मक्के की फसल अच्छी हुई है लेकिन इसके बावजूद फसल का सही दाम नहीं मिल पा रहा है।अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के सदस्य ने बताया कि मक्की की फसल की असली कीमत आमतौर पर 1600 रुपए से 1700 रुपए प्रति क्विंटल होती है लेकिन सरकार की तरफ से सिर्फ 1000 से 1100 तक का भाव मिला है जिससे किसान वर्ग काफी परेशान है।

2020 में बिहार के किसानों को नहीं मिला मक्के की फसल का सही दाम | SabrangIndia

उनका कहना है कि भूख हड़ताल और अधिकारियों से लाख विनती के बावजूद कोई मदद नहीं मिली।लॉकडाउन के चलते उन्होंने पहले से ही काफी दिक्कतों का सामना किया है और यह अब नहीं मुश्किल आकर खड़ी हो गई है

बिहार में चुनाव के दौरान किसी राजनीतिक दल ने नहीं उठाया ये मुद्दा

बिहार चुनाव के परिणाम 10 नवंबर को घोषित हो गए।यह चुनाव अपने आप में बहुत खास रहा क्योंकि विपक्ष हो या पक्ष किसी ने भी कोई मौका नहीं छोड़ा एक-दूसरे पर निशाना साधने का और जनता को लुभाने का। लेकिन उनमें से एक अहम मुद्दा जिसे किसी ने भी नहीं छोड़ा वह था बिहार में मक्के की फसल का सही दाम नहीं मिल पाना।

बिहार के मक्का किसानों का दर्द- हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे भी किसानी करें, क्योंकि इसमें किसी तरह का फायदा नहीं है

बिहार के कई जिलों में किसानों ने भूख हड़ताल भी किया लेकिन किसी राजनीतिक दल का इस पर ध्यान नहीं गया और उन्होंने किसान का यह अहम मुद्दा उठाने की कोई कोशिश नहीं की यहां तक कि जारी किए गए अपने घोषणापत्र में भी किसी ने मक्के की सही दाम किसान तक पहुंचेंगे इसका जिक्र तक नहीं किया।


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अररिया के किसान का कहना है कि व्यापारी उठा रहे हैं‌‌ अच्छी फसल का लाभ

अररिया के किसान अमर का कहना है कि अच्छी फसल होने के बावजूद किसान को तो कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन व्यापारी जगत इसका भरपूर लाभ उठा रहा है। अमर बताते हैं कि 2019 में उन्होंने करीब 200 क्विंटल मक्का बेचा जो कि इस वर्ष के हुए मक्का के मुकाबले कम थी लेकिन अच्छी कीमत पिछले साल मिल गई थी जिससे उन्हें अच्छी खासी आमदनी हुई थी।

वहीं 2020 में मक्के की अच्छी फसल होने के बावजूद सही कीमत ना मिलने के कारण उनकी कोई कमाई नहीं हो पाई है। अमर ने बताया कि इस साल उन्होंने 300 क्विंटल मक्का एक हजार प्रति क्विंटल के हिसाब से बेचा जिसके खर्च का अनुमान ₹25000 है। जून में भूख हड़ताल करने वाले किसानों में से अमर भी थे।

बिहार के मक्का किसानों का दर्द- हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे भी किसानी करें, क्योंकि इसमें किसी तरह का फायदा नहीं है

उस वक्त तो उन्हें सरकारी मदद का आश्वासन दे दिया गया था लेकिन कुछ वक्त बीत जाने के बावजूद सरकार के तरफ से कोई पहल नहीं की गई। अमर का यह भी कहना था कि अगर किसान के पास एक उचित स्थान होता जहां पर अन्य के भंडारण को सुरक्षित और पर रखा जाए तो आज स्थिति कुछ और होती।

किसान को डर है अगले सीजन की फसल भी प्रभावित हो सकती है

अमर का कहना है कि उन्हें और तमाम किसानों को यह डर भी सता रहा है कि लॉकडाउन के चलते श्रम प्रवास के कारण नए सीजन की फसल भी प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि मजदूर की अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि किसान समय पर अपना काम पूरा नहीं कर पाएंगे दूसरी ओर उन्हें सरकार से भी कोई मदद नहीं मिल रही है।

बिहारः लॉकडाउन में नहीं बिक रहा मक्का, किसान परेशान, कहा- आगे कैसे होगी खेती? - coronavirus lockdown bihar samastipur makka ki kheti farmers condition - AajTak

अमर का कहना है कि बीज परिवहन सेवाएं एवं भंडारण सुविधाओं के लिए मूल्य सब्सिडी किसान के जीवन में काफी सुधार ला सकती है। पिछले दशक महिला काफी लोकप्रिय फसल बन गई थी। बिहार पूरे देश में मक्का का उत्पादन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा राज्य बन गया था। इन सबके बावजूद अच्छी फसल होने पर भी सरकार से सही दाम नहीं मिल पाई जिसके कारण किसान वर्ग हताश और परेशान है। अमर का कहना है कि उम्मीद करते हैं नहीं सरकार उनकी दुर्दशा पर ध्यान दें और किसान वर्ग की तरक्की के लिए जरूरतमंद कदम उठाएगी।

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Aparna Vatsh

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