बिहार में ओवैसी राजद के लिये सिरदर्द क्यों?

बिहार चुनाव: ओवैसी राजद के लिये सिरदर्द 

बिहार जहांकी भूमि पर भगवान बुद्ध ने ज्ञान लिया, जहां भगवान महावीर ने जन्म लिया वहीं बिहार लोकतंत्र का भी जन्मस्थान है और यहां चुनाव को एक महापर्व के तरह मनाया जाता है। जितना मिश्रण एवं अनेकता यहां की समाज एवं संस्कृति में देखने को मिलती है। उतनी ही मिश्रित एवं अनोखा यहां की राजनीतिक पृष्ठभूमि है। 

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बिहार की राजनीतिक पृष्ठभूमि में बदलाव का साल रहा सन 1995 जब यहां के मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद यादव और उनके साथ एक नयी राजनीति शुरू हुई और आगे चलकर बिहार की राजनीतिक पहचान जातिगत राजनीति बन गयी, लगभग 15 साल तक मुस्लिम एवं यादव के वोटरों ने लालू को सत्ता की चाभी दी। 

जिसके बाद 2005 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। लालू को सत्ता से बाहर किया गया जिसके 15 सालों के बाद 2020  में लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने बिहार चुनाव में खुद को मुख्यमंत्री के तोर पर पेश किया और चुनावी समर में कूद पड़े। पर 10.11.2020.को  उनका यह सपना टूट गया और कांग्रेस राजद एवं वाम दाल का गटबंधन चुनाव में बहुमत के आंकड़ों को हासिल नहीं कर सका। 


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नतीजों के बाद तेजस्वी यादव ने कहा

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नतीजों के बाद तेजस्वी यादव ने कहा  (All India Majlis-e-Ittehadul-Muslimeen) की वजह से हारे है मजलिस ने सीमांचल में वोट कटवा का काम किया है। बता दें सीमांचल से मजलिस ने 5 सीटे पर जीत हासिल की परन्तु यही है की जो काम पप्पू यादव ने किया अलग पार्टी के साथ चुनाव में कूदना लेकिन इसपर उन्हें वोटकटवा नहीं कहा गया।  

बिहार में मजलिस की जीत 

बिहार में मजलिस की जीत इस ओर इशारा कर रही है की बिहार के मुसलमान जो कभी कांग्रेस के कोर वोटर थे बाद में राजद के कोर वोटर हुए और उन्हें एक नया विकल्प मिल गया है ऐसी स्थिति में यहां राजद के लिये भविष्य में काफी परेशानी का सबब होगा क्योंकि राजद को सत्ता की चाभी यादव एवं मुसलमानों के वोट से मिलती रही है।

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ऐसी स्थिति में जहां बिहार के मुसलमानों के पास राजद और मजलिस को चुनने का विकल्प होगा उसमे राजद को सत्ता की चाभी इतनी आसानी से नहीं मिलेगी और इसका उदाहरण आप 2020 के विधानसभा चुनाव को मान सकते। वहीं राजद के एक बड़ा कोर वोटर को विकल्प मिलते देख तेजस्वी यादव मजलिस एवं ओवैसी को वोटकटवा कह रहे है।  

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