सेक्यूलर देश होने के बावजूद क्या भारत हिंदू राष्ट्र की तरफ आगे बढ़ रहा है

वर्ष 1976 में इमरजेंसी के दौरान प्रस्तावना में संशोधन किया गया जिसके बाद ‌‌‌सेक्यूलर शब्द भारतीय संविधान में शामिल हुआ। इस प्रस्तावना के आने के बाद भारत में सभी धर्म, जाति एवं संप्रदाय के लोगों को एक नजरिए से देखा जाने लगा।

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भारत की खूबसूरती रही है यहां की अनेकता में एकता। लेकिन बीते कुछ दिनों से राजनीति के गलियारे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत हिंदू राष्ट्र की तरफ अग्रसर हो रहा है। सेक्यूलर शब्द का अगर सबसे ज्यादा इस्तेमाल कहीं होता है तो वह है भारतीय राजनीति।

सेक्यूलर शब्द को लेकर भारत में पक्ष और विपक्ष में हमेशा ही तर्क वितर्क देखने को मिलता है। आइए हम जानते हैं कि‌ इस बात में कितना दम है कि भारत आने वाले दिनों में हिंदू राष्ट्र बन सकता है।


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कांग्रेस पार्टी ने सबसे पहले उठाया ‌सेक्यूलर पर सवाल

भारत के संसद में विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी ने सबसे पहले मोदी सरकार को ‌‌सेक्यूलर के नाम पर घेरा था। आपको बता दें कि जब राफेल विमान वायु सेना में शामिल किया गया तो उस वक्त राजनाथ सिंह की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई थी जिसमें वह राफेल पर हिंदू विधि विधान के मुताबिक पूजा करते नजर आए थे।

सेक्यूलर

उन्होंने ना सिर्फ उस पर पुष्प मालाएं चढ़ाई थी बल्कि स्वस्तिक का चिन्ह भी बनाया था। टि्वटर पर उस वक्त राफेल पूजा पॉलिटिक्स खूब ट्रेंड किया था। सोशल मीडिया यूजर्स ने मोदी सरकार को निशाना बनाते हुए लिखा था कि नए वाहनों का पूजा करना हिंदू धर्म का पुराना रिती रिवाज रहा है लेकिन मोदी सरकार यह क्यों बोल रही है कि यह विमान वायुसेना का है।

इसे धार्मिक रंग नहीं देना चाहिए। आम आदमी पार्टी छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए अलका लांबा ने भी राफेल पूजा पॉलिटिक्स पर मोदी सरकार पर निशाना साधा था।

आपको बता दें कि उस वक्त राफेल विमान के पहियों के नीचे दो नींबू भी रखे गए थे। हिंदू शास्त्रों के अनुसार नींबू बुरी नजरों से बचाता है। एक सोशल मीडिया यूज़र ने यह‌ तक कह दिया था कि इन नींबू का इस्तेमाल मोदी सरकार अगर देश की आर्थिक हालत बचाने में करें तो शायद कुछ फायदा भी हो सके।

लोगों का यह मानना था कि भारत में हर धर्म के लोग चाहे वह मुस्लिम हो हिंदू हो सिख हो या इसाई यह सभी देश को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को टैक्स देते हैं तो किसी एक धर्म को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।

नई संसद भवन के शिलान्यास के बाद किया गया भूमि पूजन

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां संवैधानिक तरीके से चुनाव लड़े जाते हैं और जनता की आवाज को रखने वाला नेता सांसद पहुंचता है। भारतीय सांसद और राजनीति का इतिहास काफी पुराना रहा है। जैसा कि हम सभी जानते हैं वर्तमान में चला रहा सांसद भवन जल्द ही बंद हो जाएगा।

भारत

इसके जगह पर नई संसद भवन का निर्माण किया जाएगा। 10 दिसंबर को नए सांसद भवन का शिलान्यास हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने नए भवन के लिए भूमि पूजन किया जिसमें कई उद्योगपति से लेकर केंद्रीय मंत्री और अन्य दल के नेता मौजूद रहे। अब सवाल यह उठता है कि सांसद में तो हर धर्म और जाति के लोग बिना किसी भेदभाव के अपने बात को आगे रखते हैं।

भूमि पूजन शास्त्रों के हिसाब से हिंदू रीति-रिवाजों के साथ हुआ तो यह जाहिर सी बात है कि अगर भारत एक सेक्युलर देश है तो बाकी धर्म के विधि विधान को भी उतनी ही मान्यता मिलनी चाहिए। राष्ट्रवादी होना और हिंदूवादी होने में जमीन आसमान का फर्क है और अगर हमारा देश हिंदू राष्ट्रवाद की तरफ आगे बढ़ रहा है तो सबसे पहले संविधान से सेक्यूलर शब्द को हटाना चाहिए।

हम यह नहीं कह रहे कि भूमि पूजन का कार्यक्रम करना गलत था लेकिन दूसरे धर्म को भी उतनी ही मान्यता मिलनी चाहिए जितनी फिलहाल हिंदुओं को दी जा रही है।

भारत में राष्ट्रवाद और हिंदूवाद में कितना है फर्क?

आए दिन हम सोशल मीडिया पर या पढ़ते रहते हैं कि देश में रहना है तो जय श्री राम बोलना होगा। हमें अपने मन में यह जरूर सोचना चाहिए भारत और पाकिस्तान में फिर फर्क क्या रह जाएगा। हमारे देश में कई वर्षों से हर धर्म और जाति का सम्मान होता है।

भारत

अनेकता में एकता ही भारत की परिभाषा है। इससे पहले भी कई सरकारें आई हैं जिन्होंने अपने शासनकाल में भले ही कई ग़लतियाँ की होगी लेकिन फिलहाल मोदी सरकार जो पहले से ही अपने धार्मिक कट्टरता के लिए जानी जाती है‌ उन्हें अपनी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। भारतीय संविधान इन अक्षरों के साथ ही शुरु होता है कि ‘हम भारत के लोग’।

हम उम्मीद करते हैं कि यह “हम” तेरा और मेरा में तब्दील ना हो जाए। समय रहते लोगों को सोचने की जरूरत है राष्ट्रहित सर्वोपरि है लेकिन इसे धार्मिक कट्टरता से दूर रखा जाए।

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Aparna Vatsh

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