यमुना दसवीं तक पढ़ाई पूरी करने वाली नथजोगी घुमंतू समुदाय की पहली लड़की

एक परिणाम जिसने यमुना कि ज़िंदगी और लोगो की सोच बदल दी 

21 वीं सदी के भारत  में भी यह बात सुनना की किसी समुदाय की आज भी एक लड़की है जिसने बहुत कठिन परिश्रम कर के दसवीं तक अपनी पढ़ाई की है। यह बात हैरानी के साथ साथ आत्मनिराक्षण करने को मजबूर जरूर करता है। आज हम ऐसे ही एक लड़की की बात करेंगे और उससे इस सफलता और इसमें आए कठिनाइयों के बारे में जानेंगे। यह आत्मविश्वास उसे मिला है उसके दसवीं के परिणाम से जिसने उसे नठजोगी समुदाय की पहली लड़की बना दिया है जिसने यहां तक पड़ने की हिम्मत दिखाए। हर मुश्किल से लड़कर उसने अपना  सपना पूरी करने की शुरूवात किं। आत्मविश्वास से भरपूर यमुना कहती है वह जो चाहती है वो जरूर बनेगी।

 

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परिणाम के दिन के बारे में यमुना बताती है की मेरे SSC [माध्यमिक स्कूल प्रमाण पत्र] के परिणाम आने वाले थे उस दिन मेरी स्थिति क्रिकेट की गेंद के हिट होने के बाद जैसी थी। आप जानते हैं कि हर कोई उस गेंद को कैसे देखता है? यह चौंका या छक्का होगा? सब देख रहे होंगे। अगर मैं असफल हो गई तो क्या होगा? मेरे पिता  तुरंत मेरी शादी करवा देंगे।

लेकिन जब  परिणाम आया तो मुझे यह देखकर राहत मिली कि मैंने 79.06 प्रतिशत से पास हुई थी और सबसे हैरानी  की बात यह कि मै सिर्फ एक अंक से अपने स्कूल में तीसरे सबसे ज्यादा अंक लाने से चूक गई थी। इसके बावजूद मैं अपनी उपलब्धि से बहुत खुश थी क्योंकी हमारे में  किसी भी लड़की ने कभी कक्षा 10 पास नहीं की थी।


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परिवार में सभी लोग है दिहाड़ी मजदूर

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नवखा महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित यह छोटा सा गांव जहां ज्यादातर लोग नाठजोगी समुदाय से आते है निवास करते है। जानकारी के मुताबिक इस गांव के लोग राज्य के अन्य संपन्न जिले जैसे नागपुर,पुणे और महाराष्ट्र में भीख मांग कर पलायन कर चुके है और बचे हुए लोग यमुना के पिता के जैसे दूसरे लोगो के खेत में काम करते है।

पूरे दिन लगभग 8 घंटे की कड़ी मेहनत करने पर 200 रूप मिल पाता 

यमुना के पिता भौलाल सहेबरो सोलंकी और माता द्रौपदा सोलंकी को महीने में 10-12 दिन ही काम मिल पाता है। पिता पाँचवीं तक पढ़े है। यमुना से बड़ी दो बहने की शादियाँ हो चुकी है और अब वो भी मजदूरी करती है वहीं भाई ने नवी के बाद पढ़ाई करने के बाद मजदूरी शुरू कर दी। 

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यमुना बताती है जब वह दस वर्ष की हो गई तो उसे भी पिता ने काम शुरू करने को कहा लेकिन उसने पढ़ने की जिद जारी रखी और सिर्फ उसके पिता ही नहीं गांव के अन्य बुजुर्ग भी डांट लगाते थे जब बहने स्कूल नहीं गई तो तुम्हें क्या जरूरत है। क्या तुम्हें लगता है तुम्हें नौकरी मिलेगी? वहीं उसके चाचा भी पिता को कहते थे अब शादी कर दे। तब मां को मैं कहती थी बाबा को शादी की बात नहीं करने और इसकी वजह से अक्सर उनमें लड़ाई हो जाती थी। पत्रकारों से  बातचीत करते हुए पिता के आँखो में खुशी के आँसू थे। उन्होंने कहा कि अच्छा हुआ उसने हमारी बात ना मान पढ़ाई जारी रखी।

सात साल में शुरू की स्कूल में पढ़ाई, पहली कक्षा में हुआ दाख़िला

स्कूल शुरू करने की बात बताते हुए यमुना कहती है कि जब वह पाँचवीं कक्षा में पहुंची तो उसे 14 किलोमीटर दूर महात्मा फुले नगर परिषद स्कूल जाना पड़ता था। इसमें उसे 2 किलोमर चलना पड़ता साथ ही एक बार जाने के लिए तीस रुपए भी खर्च करना पड़ता था।

I will become what I want to become'

स्कूल आने जाने में बहुत असुविधा होती थी। और बारिश के मौके पर तो कई बार स्कूल छूट जाती थी और कई बार देर पहुंचने पर सजा मिलती थी। इससे परेशान होने पर उसने बस के लिए आवेदन दिया और बस आने पर वह बहुत खुश भी हुई। लेकिन बस में लड़कों की बदतमीजी और दूसरे गांव के लोगो के समय एडजस्ट नहीं कर पाने की वजह से यह सिर्फ एक दिन ही चल पाया। इसके बावजूद उसने हार नहीं मानी और स्कूल जारी रखा। 

यमुना बताती है जब वह पंद्रह वर्ष की थी तब उसके पिता उनके पूर्वजों के जमीन को अपने नाम करवाना चाहते थे ताकि उनके पक्के मकान का लाभ मिल सके। लेकिन अफसर इसके बदले पांच हजार मांग रहे थे पिता के असमर्थता जताने पर उन्हें लाभ नहीं दिया गया। 

I will become what I want to become'

यमुना सवाल करती है हम अपने जमीन के लिए ही दूसरो की पैसा क्यों दे? वह कहती है वह अफ़सर बनेगी तो ऐसा अन्याय दूसरों के साथ नहीं होने देगी। उसका सपना है आईएएस ऑफिसर बनने का और इसके लिए उसने तैयारी भी शुरू कर दी है। अपनी 11- 12वी की पढ़ाई के लिए एक प्राइवेट स्कूल में दाखिला ले लिया है।

अपने समुदाय से लड़कियों की बाल विवाह भीख मांगने का पेशा आदि को खत्म करना लक्ष्य

आगे की तैयारी के बारे में यमुना कहती है कि स्नातक के लिए उसे दूसरे शहर में जाना होगा क्यों की यहां विश्विद्यालय नहीं है। लोग कहते है तुम बस कंडक्टर या आंगनवाड़ी सेवक बन सकती है काम जल्दी मिलेगा लेकिन मैं वहीं बनूंगी जो चाहती हूं। वह अपने समुदाय को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। यमुना बताती है लॉकडॉउन में सब गांव वापस आ गए और किसी को काम नहीं मिल रहा । मेरा परिवार भी बेरोजगार है। पिता ने किसी और से पैसा लेकर मेरा दाख़िला करवाया है। पैसा वापस करना मुश्किल है लेकिन हम भीख नहीं मांगेंगे हम काम करके पैसा कमाना चाहते है।

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Shreya Sinni

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