राइट टू फूड अभियान के सर्वेक्षण में पाया गया कि लॉकडाउन के बाद भी भुखमरी जारी 

लॉकडाउन के बाद भी भुखमरी जारी 

राइट टू फूड अभियान के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि कई लोगों के पास कोई रोजगार नहीं होने के वजह से वे लोग पौष्टिक आहार लेने में असमर्थ  हैं। और छह से सात महीने लॉकडाउन रहने के कारण से तो कई लोगों को भूखे पेट ही सोना पड़ रहा है। इतना ही नहीं आय में हुए नुकसान के कारण से कई लोग तो अक्सर भोजन छोड़ देते हैं ।

फूड अभियान

दरसअल यह  11 राज्यों में मार्जिन पर रहने वाले 4,000 लोगों के सितंबर और अक्टूबर में राइट टू फूड अभियान के सर्वेक्षण  तहत सामने आया है। और अब प्रधान मंत्री गरीब कल्याण योजना यानी  (पीएमजीकेवाई) के नवंबर के बाद मुफ्त अनाज वापस लेने के सरकार के फैसले पर सवाल उठते नज़र आ रहे हैं।

हम बता दें कि  हंगर वॉच नाम के सर्वेक्षण में मुसलमानों सहित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय और बहिष्कृत समुदायों से यह प्रतिक्रियाएं दर्ज की गईं हैं। जिसमें यह पता चला कि  80% ने मार्च में लॉकडाउन से पहले एक महीने में 7,000 से भी कम कमाया था।


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लोगों को जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ा

इस सर्वेक्षण में शामिल आधे से अधिक लोगों ने कहा कि उनके चावल और गेहूं की खपत में कमी आई है। और 25% ने बताया कि यह बेहद कम हो गया है। इसी तरह दालों की खपत में 64% की कमी दर्ज की गई है। सब्जियों की खपत पर 73% सब्जियों की खपत में गिरावट दर्ज की गई और लगभग 40% ने बताया कि सब्ज़ियों के उपयोग में भारी हद तक कमी आई है।

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लगभग 71% जो मांसाहारी हैं वे अंडे या मांस लेने में सक्षम नहीं हैं। और जब पूर्व-COVID 19 की तुलना में भोजन की मात्रा में गिरावट के बारे में उनसे सवाल किया गया था तब लगभग 66% लोगों ने बताया कि वे जो खाते थे उसकी तुलना में यह काफी मात्रा  में कम हुआ है। इसके साथ ही पता चला कि लॉकडाउन के दौरान भोजन ग्रहण करते के लिए कई लोगों को जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव का भी सामना करना पड़ा था।

रिपोर्ट्स से पता चला कि चार दलितों में से एक एवं चार मुसलमानों में से एक को इन भेदभावों का सामना करना पड़ा है। वहीं अनुसूचित जनजाति के लगभग 12% लोगों के साथ भेदभाव किया गया था। एवं सबसे अधिक तो यौनकर्मी, घरेलू कामगार और सिंगल महिलाओं को इस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है । क्योंकि उनमें से कई के पास कोई दस्तावेज नहीं है एवं जिसके बिना वे पूरी तरह से अपनी खाद्य आवश्यकताओं के लिए नागरिक समाज संगठनों से दान पर निर्भर थे।

राईट टू फूड कैंपिग्न ने किया एक सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मांग की 

सर्वेक्षण में शामिल लगभग 56% लोगों ने बताया कि लॉकडाउन से पहले कभी भी उन्होंने कभी अपने भोजन को  बन्द नहीं किया था।साथ ही कहा कि  लगभग तीन  में से एक को कभी – कभी तो खाली पेट बिस्तर पर जाना पड़ा है।

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ग़ौरतलब है कि राईट टू फूड कैंपिग्न ने एक सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मांग की है। जिसके तहत  हर व्यक्ति को 10 किलो अनाज, 1.5 किलो दाल और 800 ग्राम खाना पकाने के तेल को कम से कम अगले छह महीने तक यानी जून 2021 तक प्रदान किया जाना चाहिए। साथ ही  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के तहत प्रति परिवार 200 दिनों के रोजगार की गारंटी की मांग को सामने रखा है।

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