निर्भया कांड आज भी लोगों के जहन में ताज़ा, भारत में बेटियों की सुरक्षा पर हमेशा सवाल रहा

निर्भया कांड के बाद लोगों ने सड़कों पर आकर बेटियों की सुरक्षा के लिए आंदोलन किया

आजादी के कई वर्षों बाद भी भारत में बेटियों की सुरक्षा पर हमेशा ही सवाल उठता रहा है। हम अखबार में बलात्कार जैसे संगीन जुर्म से जुड़ी खबर पढ़ते रहते हैं। अफसोस की बात यह है कि तमाम सरकारें जिनकी प्राथमिकताओं में से एक है बेटियों को सुरक्षा प्रदान करना वह उन में असफल साबित हुई है। चुनाव आने पर हर पार्टियां बेटियों को लेकर बड़े-बड़े वादे तो कर लेते हैं लेकिन जमीनी तौर पर वह वादे कितने खोखले होते हैं यह किसी से छुपा नहीं है।

आज 16 दिसंबर है और इस तारीख से निर्भया कांड की बातें जुड़ी है। 16 दिसंबर 2012 को देश ने बलात्कार का एक ऐसा मंजर देखा था जिस की यादें आज तक लोगों के जहन में जिंदा है। इस घटना के बाद देश के कानून में महिलाओं के पक्ष में तमाम बदलाव किए गए जिसकी बदौलत भी यह घटना एक ऐतिहासिक घटना के रूप में जानी जाती है।

बेटियों, निर्भया कांड


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16 दिसंबर की वह रात जिसने देश को आईना दिखाया 

करीब 8 साल पहले आज ही के दिन 23 वर्षीय निर्भया जो अपने दोस्त के साथ फिल्म देखने दिल्ली के सकेत सिलेक्ट सिटी वॉक सिनेमा हॉल गई थी। वह एक कॉल सेंटर में काम करके अपनी फिजियोथैरेपी की पढ़ाई का खर्च भी उठा रही थी। वह एक महत्वकांक्षी लड़की थी जो जिंदगी को खुलकर जीना चाहती थी। उस शाम जब निर्भया अपने दोस्त के साथ फिल्म देख रही थी तो उसे पता भी नहीं था कि आने वाले कुछ पलों में ना सिर्फ उसकी जिंदगी बल्कि भारत की तमाम बेटियों की जिंदगी बदलने वाली है।

फिल्म खत्म होने के बाद निर्भया और उसका दोस्त ऑटो का इंतजार करने लगे ताकि वह अपने घर पहुंच सके। काफी देर तक खड़े रहने के बावजूद जब द्वारका जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला तो वह एक ऑटो में बैठकर मुनिरका बस स्टैंड पहुंच गए लेकिन यहां भी द्वारका जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिल रहा था। इसी बीच निर्भय और उसके दोस्त की नजर सामने खड़ी प्राइवेट बस पर पड़ी।

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द्वारका द्वारका की आवाज सुनकर वह दोनों बस पर चढ़ गए। उसमें बैठे बाकी छह यात्री को उन्होंने बस का यात्री समझ लिया लेकिन वह इस बात से अनजान थे कि ड्राइवर समेत सारे 6 लोग एक दूसरे से परिचित हैं। वह बस के यात्री नहीं थे बल्कि नशे की हालत में धुत होकर दिल्ली की सड़कों पर अय्याशी करने पहुंचे थे। रात करीब 9:30 बजे जब बस मुनिरका से आगे आकर महिलापुर के पास पहुंची तो बस में मौजूद एक नाबालिक समेत सारे लोगों ने निर्भया और उसके दोस्त के साथ मारपीट शुरू कर दी। कहासुनी से शुरू हुए झगड़े का अंत जो हुआ वह किसी के कल्पना से भी परे था। एक तरफ रामसिंह और उसके दोस्तों ने निर्भया के दोस्त के साथ मारपीट शुरू की तो वही निर्भया को बस के पीछे ले जाकर उससे हाथापाई करने लगा।

सारे अपराधियों ने एक-एक कर निर्भया का बलात्कार किया और इतना ही नहीं विरोध करने पर उसके शरीर में लोहे का रोड डालकर उसे मारने की भी कोशिश की गई। उसके दोस्त को भी मार-मार कर लहूलुहान कर दिया गया। यह वारदात करीब 1 घंटे तक चली और इसके बाद राम सिंह और उसके साथियों ने निर्भय और उसके दोस्त को मरा हुआ समझकर बस के बाहर फेंक दिया। उन अपराधियों ने दोनों के डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पर्स ,मोबाइल सब कुछ छीन लिए।

निर्भया ने कहा था वह जीना चाहती 

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सिंगापुर पहुंचने के 1 दिन बाद अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया

निर्भया के माता-पिता को रात के करीब 11:00 बजे बेटी के एक्सीडेंट की बात पता चली। निर्भया का परिवार भागता हुआ सफदरजंग अस्पताल पहुंचा जहां उनकी बेटी जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रही थी। मेडिकल रिपोर्ट में पाया गया कि बलात्कार के दौरान अपराधियों ने निर्भया के प्राइवेट पार्ट्स पर रॉड से हमला किया था जिस वजह से उसकी‌ आंत बाहर आ गई थी। निर्भया का इलाज कर रहे वरिष्ठ सरकारी डॉक्टरों ने मीडिया को बताया था कि उन्होंने अपने पूरे मेडिकल करियर में सामूहिक बलात्कार का ऐसा मामला नहीं देखा था।

घटना के बाद करीब 2 हफ्तों तक निर्भया आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ती रही लेकिन इस संघर्ष के बावजूद उसके शरीर पर गंभीर चोटें और अंतड़ियों के बाहर आ जाने के कारण उसके बचने की संभावना बहुत कम थी। दूसरी तरफ इलाज के बाद उसके मित्र की छुट्टी अस्पताल से हो गई थी। निर्भया की खराब हालत को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें सिंगापुर भेजने का फैसला किया। सिंगापुर पहुंचने के 1 दिन बाद अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया। जाते-जाते उसने ना सिर्फ महिलाओं के हक में भारतीय कानून को बदला बल्कि देश को यह एहसास दिलाया कि नारी शक्ति में कितना बल होता है।

दोषियों को मिली फांसी की सजा

2013 में मुख्य आरोपी राम सिंह की तिहाड़ जेल में मौत हो गई। पुलिस का कहना था कि उसने आत्महत्या कर ली है। अगस्त 2013 में नाबालिग आरोपी को बलात्कार और हत्या का दोषी मानते हुए 3 साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया गया। बाकी बचे चार आरोपियों के खिलाफ दिल्ली के फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला चला और उन्हें सामूहिक बलात्कार, हत्या एवं सबूत मिटाने जैसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में दोषी करार दिया गया।

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घटना के बाद देश के विभिन्न इलाकों में आरोपियों को फांसी देने की मांग को लेकर आंदोलन एवं विरोध प्रदर्शन चले। लोग ने सड़कों पर उतर कर निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए कैंडल मार्च किया और सरकार से ऐसे अपराधों के खिलाफ सख्त कानून लाने की मांग की। सजा में नरमी बरतने के तमाम आरोपों को खारिज करते हुए कोर्ट ने चारों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई।

इस जघन्य अपराध को क्रूर एवं अमानवीय घोषित करते हुए योगेश खन्ना की अदालत ने यह बयान दिया कि वह ऐसे जघन्य अपराध पर अपनी आंखें बंद नहीं कर सकता। इसके बाद चारों आरोपी ने देश की सर्वोच्च अदालत से लेकर राष्ट्रपति तक से गुहार लगाई लेकिन उनके मृत्यु दंड में कोई बदलाव नहीं आया। आखिरकार उन्हें 20 मार्च 2020 को फांसी दे दी गई।इस घटना के बाद यह लगा था कि शायद समाज अब बेटियों की इज्जत करने लगे और ऐसी घटना दोबारा ना हो लेकिन अफसोस आज भी हर 15 मिनट में भारत में एक लड़की का यौन शोषण किया जाता है। इस घटना के बाद भारतीय कानून में महिलाओं के हक में काफी बदलाव आए लेकिन जब तक समाज को बेटियों की इज्जत का पाठ नहीं पढ़ाया जाएगा तब तक कानून भी कुछ नहीं कर सकता।

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Aparna Vatsh

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