किसानों ने लोगों तक पहुंचने के लिए निकाला अपना अखबार “ट्रॉली टाइम्स” 

किसानों ने निकाला अपना अखबार ट्रॉली टाइम्स 

बता दें कि किसानों का नए कृषि क़ानूनों को लेकर सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शन 23 वें दिन भी जारी है। राष्ट्रीय राजधानी के सिंघू और टिकरी बॉर्डर पर बढ़ती ठंड भी इन किसानों का हिम्मत तोड़ने में सक्षम नहीं है। हालांकि शीत लहर को ध्यान में रखते हुए किसानों ने प्रदर्शन की व्यवस्था में थोड़े से बदलाव किए हैं और अब सुबह से लेकर दोपहर तक के प्रदर्शन की ज़िम्मेदारी अब बुजुर्ग किसानों के ऊपर है।

ट्रॉली टाइम्स

एवं शाम और रात का ज़िम्मा नौजवानों ने लिया है। वहीं इन मामलों को लेकर किसानों ने अब अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए अखबार निकाला है। उन्होंने कहा कि मीडिया उन्हें अच्छे तरह से नहीं दिखा रही है और इसलिए किसानों ने अपना ख़ुद का अख़बार प्रिंट किया है। किसान समर्थक लोगों ने इस अखबार का नाम ट्रोली टाइम्स रखा है। 

ट्रॉली टाइम्स अख़बार को विशेष रूप से आंदोलनकारियों द्वारा आंदोलनकारियों के लिए निकाला गया

ट्रॉली टाइम्स

जानकारी के मुताबिक़ प्रदर्शन में शामिल होने आए कुछ व्यक्ति किसानों के हक की बातों को लोगों तक पहुंचाने के लिए हिंदी और पंजाबी भाषाओं में अखबार एवं पैम्फलेट भी बांट रहे हैं। ग़ौरतलब है कि हफ्ते में दो बार छपने वाले ट्रॉली टाइम्स के पहले संस्करण में  गुरमुखी में तीन लंबे लेख, फीचर्स, फोटोज़, चित्रण, एवं पंजाब के अलावा भी दूसरे राज्यों से आने वाले आंदोलनकारियों के लिए एक हिंदी अनुभाग भी रखा गया है।


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इस शुक्रवार सुबह किसान आंदोलन के 23वें दिन की शुरूआत के साथ ही किसानों के हाथ में हफ्ते में दो बार निकलने वाले सूचना पत्र का पहला संस्करण आया और अख़बार को  विशेषरूप से आंदोलनकारियों द्वारा आंदोलनकारियों के लिए निकाला गया है। इस विषय पर यह बता दें कि ट्रॉली टाइम्स का पहला संस्करण 12,000 रुपए की लागत से गुड़गांव में छापा गया है एवं लगभग 2,000 प्रतियां छापी गईँ। जिसमें 1,200 सिंघू बॉर्डर और 800 टीकरी बॉर्डर के लिए थीं।

ट्रॉली टाइम्स पत्र का मुख्य उद्देश्य आंदोलन को हर कोने तक पहुंचाना

ट्रॉली टाइम्स

दरसअल इस सूचना पत्र का मुख्य उद्देश्य दिल्ली की सीमाओं पर कई किलोमीटर लंबाई में फैले चल रहे आंदोलन को हर कोने में पहुंचाना था। किसान अपने मंच के संदेश एवं सरकार से वार्तालाप की ताज़ा जानकारी एवं ऐसी और भी खबरों को आंदोलनकारी किसानों तक आसानी से पहुंचाना चाहती है।

किसानों ने बताया कि इसी साल लाए गए तीन केंद्रीय कृषि क़ानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर वे लोग 26 नवंबर को यहां आए थे। मगर जल्द प्रदर्शनों में तेज़ी आते ही नेशनल मीडिया ने हम लोगों को आतंकवादी या खालिस्तानी कहना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा स्टेज के सामने काफ़ी भारी भीड़ रहती है एवं जब बातचीत या चर्चाएं होती हैं। तब बहुत लोग हैं हम तक नहीं पहुंच पाते हैं और सच कहें तो वैसे भी नेशनल मीडिया हमें सही तरीके से नहीं दिखा रही है। परन्तु हम वैसे लोग एकदम नहीं हैं। इसी बीच बता दें कि सिंधु और टीकरी दोनों सीमाओं पर अब भी लगभग 3 लाख लोग जमे हुए नज़र आ रहे हैं ।

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