‘मेरी आख़िरी ख्वाहिश है कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता कायम हो जाए’- राम प्रसाद बिस्मिल

हम सभी जानते हैं कि अशफाक़उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल एक क्रांतिकारी थें. हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) से ताल्लुक रखते थें. कई लोग राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ के शायर के तौर पर जानते हैं लेकिन ये नज़्म राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने नहीं बल्कि पटना के एक शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा था. राम प्रसाद  ‘बिस्मिल’ इस नज़्म को तरन्नुम के साथ गाते थे, शायद उन्होंने अपना तख़ल्लुस ‘बिस्मिल’ भी बिस्मिल अज़ीमाबादी से प्रेरणा लेकर रखा हो.

काकोरी लूट के आरोप में अशफाक़उल्ला खां, राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी अंग्रेज़ों के कैद में थें और आज के ही दिन साल 1927 को इन्हें फांसी दे दी गयी थी.


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इन सारे बातों के इतर एक बात है जो अशफाक़ और बिस्मिल के बारे में हम नहीं जानते या ये भी कह सकते हैं कि जानना नहीं चाहते. अशफाक़ और बिस्मिल का संदेश क्या था ये समझने के लिए हम पहले बिस्मिल के आखिरी ख़त के एक हिस्से को पढ़ते हैं:-

मेरी मुल्क के लोगों से सिर्फ़ एक ही दरखास्त है. अगर आपको हमारी फांसी से ज़रा सा भी तकलीफ़ पहुंचती है या अफ़सोस होता है तो फिर हिन्दुस्तान में, किसी भी हालत में हिन्दू-मुस्लिम एकता को कायम कीजिये. यही हमारी आख़िरी ख्वाहिश है.

राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक हिन्दू थे जो पूजा-पाठ में काफ़ी विश्वास रखते थे और अशफाक़उल्ला खां पांच वक़्त के नमाज़ी. अगर ये कहा जाए कि इन दोनों की दोस्ती थी कि चोट अगर बिस्मिल को लगती थी तो दर्द अशफाक़ को होता था तो शायद आज के वक़्त में किसी को इसपर यकीन ना हो. आज के वक़्त में हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर हमारे समाज में काफ़ी ज़्यादा ज़हर बो दिया गया है. ऐसा नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम कार्ड आज ही खेला जा रहा है. अंग्रेज़ों ने अशफाक़ और बिस्मिल को तोड़ने के लिए भी हिन्दू-मुस्लिम कार्ड खेला था. तस्द्दुक हुसैन उस वक्त दिल्ली के SP हुआ करते थे. उन्होंने अशफाक और बिस्मिल की दोस्ती को हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलकर तोड़ने की भरसक कोशिश की. अशफाक को बिस्मिल के खिलाफ भड़काकर वो उनसे सच उगलवाना चाहते थे. पर अशफाक मुंह नहीं खोल रहे थे. ऐसे में उन्होंने एक रोज अशफाक का बिस्मिल पर विश्वास तोड़ने के लिए कहा. बिस्मिल ने सच बोल दिया है और सरकारी गवाह बन रहा है. तब अशफाक ने SP को जवाब दिया, खान साहब! पहली बात, मैं पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को आपसे अच्छी तरह जानता हूं. और जैसा आप कह रहे हैं, वो वैसे आदमी नहीं हैं.

लेकिन कहा जाता है कि कोई ज़हर आपके मन में धीरे-धीरे भरा जाए तो एक दिन उसका असर ज़रूर होगा. उस ज़हर का असर आज हमारे समाज में दिखाई देता है. आपको कोरोना का शुरुआती दौर तो याद होगा ही, हाल-फ़िलहाल की बात है. उस वक़्त एक नई ख़बर ने जन्म लिया, मुस्लिम तबलीगी कोरोना को फैलाने की साज़िश कर रहे हैं. बिहार में मुख्यमंत्री के घर नालंदा में मुस्लिम दुकानदारों का बहिष्कार कर दिया गया. कहा गया कि मुसलमान जान-बूझकर सभी को कोरोना दे रहे हैं. इसे लेकर काफ़ी तरह की फ़ेक न्यूज़ भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई, यहां तक की हमारी नेशनल मीडिया भी इस ज़हर के असर में आकर झूठ बोलना शुरू कर दिया था. जब हम हिन्दू-मुस्लिम एकता को कोरोना काल में चोट पहुंचा रहे थे तब दरअसल हम अशफाक़-बिस्मिल के सपने को पत्थर मार रहे थे जो उन्होंने हमारे मुल्क के लिए देखा था.

थोड़ा सा पहले एक वक़्त को याद कीजिये, 6 दिसंबर. बाबरी मस्जिद (जिसे अब विवादित ढांचा कहा जाता है) उसे भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में ध्वस्त कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने नियमों को ताक पर रखते हुए वो ज़मीन राम मंदिर बनाने के लिए दे दी. राम मंदिर के भूमि पूजन में (जो एक धार्मिक कार्यक्रम है), देश के प्रधानमंत्री जाते हैं. हमारे प्रधानमंत्री ये दिखा देते हैं कि बाबरी मस्जिद का ध्वस्त होना जिन लोगों के मन में एक ज़ख्म की तरह है वो उसमें मरहम नहीं लगायेंगे बल्कि उस ज़ख्म को और कुरेदने का काम करेंगे. दरअसल उस वक़्त हमारे प्रधानमंत्री अशफाक़ और बिस्मिल को ये बता रहे थें कि उनके विचारों के दिन लद चुके हैं और अब मॉडर्न हिन्दू राष्ट्र आइडियोलॉजी का दौर है और देश के प्रधानमन्त्री से लेकर सभी कोई इसी विचार के साथ काम करेंगे.

मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या !
दिल की बर्वादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या !

मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल ,
उस घड़ी गर नामावर लेकर पयाम आया तो क्या !

ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में ,
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या !

काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते ,
यूँ सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या !

आख़िरी शब दीद के काबिल थी ‘बिस्मिल’ की तड़प ,
सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या !

 

पिछले साल एंटी-सीएए प्रोटेस्ट में एक नारा बार-बार लगता था,

अशफाक़-बिस्मिल का संदेश

हिंदुस्तान सबका देश

साल 2019 में इस सरकार ने एक ऐसा कानून लागू किया जिससे अगर सबसे ज़्यादा किसी को तकलीफ होती तो वो अशफाक़ और बिस्मिल को होती. क्योंकि ये कानून हिन्दू और मुसलमान में फ़र्क करने वाला कानून है और साथ ही ये जाता भी देता है कि दरअसल इस मुल्क में अगर मुसलमानों को रहना है तो एक दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर रहना है. खैर, एकबार अशफाक़उल्ला खां थोड़े शिकायती अंदाज़ में कहते हैं, “मुझे बिस्मिल से एक बात पर काफ़ी जलन होती है, बिस्मिल के महज़ब में ये इजाज़त है कि उसका पुनर्जन्म होगा लेकिन मेरा मज़हब इसकी इजाज़त नहीं देता. यानी बिस्मिल अगले जन्म में भी हिन्दुस्तान की ख़िदमत कर सकता है लेकिन ये मैं नहीं कर सकता.”

खैर, ये ठीक ही है कि आज के समय में अशफाक़-बिस्मिल हिन्दुस्तान में नहीं है, अगर होते तो सबसे पहले उन्हें कागज़ दिखाने पड़ते ये साबित करने के लिए कि भारतीय हैं या नहीं.
अशफाक़उल्ला खां बार-बार एक शे’र पढ़ते थे,

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Amir Abbas

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