2021 रिकैप: बिहार सरकार के आंकड़ें छुपाने से लेकर 100% बिजली के झूठे दावे की पोल खोलती रिपोर्ट

साल 2021 बीत गया. आज साल 2022 की सुबह है. सुबह से मन में एक ही गाना आ रहा है

छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी

नए दौर में लिखेंगे मिल कर नयी कहानी

हम हिन्दुस्तानी (1961) का एक गीत

लेकिन नयी कहानी लिखने के लिए हमें एक बार पुरानी कहानियों से सीख लेना ज़रूरी है. इसके लिए डेमोक्रेटिक चरखा आज साल 2021 में हुए उन घटनाओं और रिपोर्ट्स पर आपका ध्यान फिर से ले जाएगा जिनसे सीखना सरकार और जनता दोनों को काफ़ी ज़रूरी है.

2021 में पटना के UPHC में डॉक्टर्स और दवाओं की कमी:

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जो मूलभूत संरचना मौजूद है वो है प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और शहरों के लिए शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (UPHC). कोरोना की जांच से लेकर कोरोना वैक्सीन तक का काम इन PHCs और UPHCs में किया जा रहा है. बिहार के स्वास्थ्य बजट में इस बार 13,264 (तेरह हज़ार दो सौ चौसठ करोड़) रूपए ख़र्च किये जा रहे हैं. ये राशि पिछले साल से 21.28% अधिक है. पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (PMCH) को विश्वस्तरीय बनाने के लिए 5540.07 (पांच हज़ार पांच सौ चालीस) करोड़ रूपए ख़र्च हो रहे हैं. बिहार की राजधानी पटना में पूरे बिहार के स्वास्थ्य बजट का 45% हिस्सा ख़र्च किया जा रहा है. बिहार में हर UPHC में 1,30,000 (1 लाख 30 हज़ार रूपए) ख़र्च किया जाते हैं.

डेमोक्रेटिक चरखा ने अप्रैल के महीने में बिहार की राजधानी पटना में UPHC में इन नियमों की अवहेलना और डॉक्टर्स की कमी की रिपोर्ट दिखाई थी. साथ ही हर UPHC की वीडियो रिपोर्ट्स पब्लिश की थी. इसके बाद डेमोक्रेटिक चरखा की टीम की मुलाकात पटना की सिविल सर्जन से हुई. इस मुलाकात के बाद सिविल सर्जन ने ये यकीन दिलाया था कि जल्द ही डॉक्टर्स की कमी को पूरा किया जाएगा.

लगभग 3 महीने के बाद पटना के अधिकांश UPHC में डॉक्टर और दवाइयों की कमी को दूर कर दिया गया है. साथ ही जिन UPHC भवन की स्थिति जर्जर थी उनकी भी मरम्मती पूरी की जा चुकी है. इस बदलाव की वजह से पटना की 55% आबादी जो गरीबी रेखा से नीचे आती है और प्राइवेट अस्पताल में इलाज नहीं करवा सकती है, उन्हें लाभ मिला है.

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान बिहार में ऑक्सीजन और बेड्स की भारी कमी

छपरा (सारण) के 25 किलोमीटर दूर बस्ती जलाल पंचायत में सनी पांडे की शादी 28 अप्रैल को हुई. 29 अप्रैल को उनकी तबियत थोड़ी ख़राब लगी तो उन्होंने डॉक्टर से फ़ोन पर सलाह ली. लेकिन लगातार तबियत बिगड़ने के कारण उनके परिजन बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच (PMCH), पटना लेकर आते हैं और उन्हें यहीं भर्ती कर लिया जाता है. जांच में पता चलता है कि उन्हें कोरोना है. इलाज के दौरान 9 मई को उनकी मौत हो जाती है. परिजन का आरोप है कि पीएमसीएच में ना ही ऑक्सीजन की सही से व्यवस्था की गयी है और ना ही डॉक्टर्स सही समय पर आते हैं. जब डेड बॉडी सौंपने के समय परिजनों ने मौत का कारण ‘सरकारी बदइन्तेज़मी’ लिखना चाहा तो मौजूद डॉक्टर ने परिजन के हाथ से कागज़ ही छीन लिया.

बिहार में ऑक्सीजन सिलिंडर में रिफिल के लिए सिर्फ़ 11 ऑक्सीजन प्लांट हैं जो एक दिन में सिर्फ़ 9950 लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन सिलिंडर की सप्लाई कर सकते थे. 22 अप्रैल को बिहार में 157.67 मेट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत सिर्फ़ ऑक्सीजन बेड्स में थी.

इसके अलावा ICU में 12.42 मेट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत थी. उसके बाद से हर दिन ऑक्सीजन की खपत बढ़ते ही जा रही है. केंद्र के तरफ़ से बिहार को 194 मेट्रिक टन ऑक्सीजन का कोटा दिया गया था लेकिन 22 अप्रैल को केंद्र के तरफ़ से सिर्फ़ 72 टन ऑक्सीजन ही मुहैय्या करवाया गया. उसके बाद से ये आंकड़ा घट कर सिर्फ़ 60 टन ऑक्सीजन पर ही आ गया है.  एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने सरकार से ऑक्सीजन की किल्लत पर जवाब मांगा था. जस्टिस चक्रधारी सरन सिंह ने टिप्पणी की थी

There is requirement of continuous supply of oxygen for treatment of COVID patients and failure to procure the amount allocated by the Government of India is a serious lapse having perilous consequences of grave nature hugely affecting the healthcare system to meet the challenge.

ऑक्सीजन के प्रोडक्शन पर बिहार सरकार का झूठा दावा:

बिहार सरकार की तरफ़ से ये जानकारी दी गयी कि 9 सरकारी अस्पतालों में ख़ुद का ऑक्सीजन प्लांट है जिससे ऑक्सीजन की आपूर्ति में कोई कमी नहीं होगी. सरकार द्वारा दी गयी लिस्ट में ये जानकारी दी गयी कि एनएमसीएच (NMCH) में 300 LPM (लीटर प्रति मिनट) के दर से ऑक्सीजन की आपूर्ति की जा रही है. और साथ ही पूरे राज्य में 2620 LPM के दर से ऑक्सीजन उत्पन्न की जा रही है.

इस दावे को लेकर हमलोगों ने NMCH में जाकर देखा तो पता चला कि वहां पर ऑक्सीजन अभी भी उषा एयर प्रोडक्ट (पटना) से लायी जा रही है. जब पूछताछ की गयी तो जानकारी ये दी गयी कि NMCH में हर दिन 900-1200 सिलिंडर की ज़रूरत रहती है लेकिन NMCH में मौजूद ऑक्सीजन प्लांट की क्षमता 24 घंटे में सिर्फ़ 50-60 सिलिंडर की ही है. इसीलिए बाकी का सिलिंडर बाहर से ही मंगवाया जाता है.

ऑक्सीजन प्रोडक्शन पालिसी 2021 के तहत ऑक्सीजन प्लांट शुरू करने के लिए राज्य सरकार 30% कैपिटल सब्सिडी मुहैय्या करवाएगी. दलित, आदिवासी, महिला, अति-पिछड़ा समुदाय, दिव्यांग, युद्ध में शहीद फौजियों की पत्नी, एसिड अटैक सर्वायिवर और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को ऑक्सीजन प्लांट के लिए राज्य सरकार द्वारा 15.75% कैपिटल इंसेंटिव (प्रोत्साहन पूंजी) भी दिए जाने का नियम बनाया गया है. इसपर बात करते हुए ए.एन. सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व निदेशक और विश्लेषक डी.एम.दिवाकर का कहना है कि

ये सरकार के द्वारा काफ़ी देर से शुरू किया गया है जो इस बात को बताता है कि सरकार आम जनता के प्रति कितनी असंवेदनशील है. ये ऑक्सीजन प्रोडक्शन पालिसी के तहत प्लांट का प्रपोजल सितम्बर के महीने में देना है. बीच में इतने दिन हैं उसमें क्या होगा? ऑक्सीजन की आपूर्ति कहां से होगी? सरकार के पास इसको लेकर कोई प्लान नहीं है.

कोरोना के दौरान हुई मौत के ‘झूठे’ आंकड़ें:

बिहार स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पटना में 1 अप्रैल से लेकर 30 अप्रैल तक कुल 293 मौत हुई है. ये आंकड़ें स्वास्थ्य विभाग ने ट्वीट करके सार्वजनिक किये थे. लेकिन पटना नगर निगम के आंकड़ें कुछ और ही कहते हैं. पटना नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक 1 अप्रैल से लेकर 30 अप्रैल तक सिर्फ़ बांस घाट पर 939 दाह संस्कार कोविड प्रोटोकॉल के तहत किये गए हैं. इसके अलावा गुलबी घाट पर 441, खाजेकलाँ घाट पर 107 और शाहगंज कब्रिस्तान में 35 लोगों को दफ़नाया गया है. 

पटना के 29 वर्षीय हसीब हाशमी की मौत कोरोना से हुई. डॉ. काशिफ रहमान (फुलवारी शरीफ़, पटना) ने हसीब हाश्मी का कोरोना में इलाज किया लेकिन उनके इलाज से हसीब हाशमी की तबियत और बिगड़ गयी. हसीब हाश्मी की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव थी. जब उनकी तबियत बिगड़ी तब उनके परिवार वाले उन्हें लेकर निदान हॉस्पिटल अनीसाबाद गए जहां पर उनसे साफ़ कह दिया गया कि अगर उनकी मौत हो जाती है तो उन्हें मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं दिया जाएगा. हसीब हाश्मी के बड़े भाई ज़मीर हाश्मी ने उनका इलाज करवाया लेकिन इलाज के दौरान ही उनकी मौत हो गयी. ऐसे में उन्हें फुलवारी शरीफ़ के एक कब्रिस्तान में दफ़नाया गया. कब्रिस्तान के द्वारा उन्हें मृत्यु प्रमाण पत्र दिया गया जिसमें कोरोना का कोई ज़िक्र था ही नहीं. इस पूरे मामले के ख़िलाफ़ ज़मीर हाश्मी ने बिहार सरकार और प्रधानमंत्री को भी मेल के ज़रिये शिकायत की लेकिन इसपर कोई सुनवाई नहीं हुई.

अब बात करते हैं मई के महीने की. बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार बिहार में 446 मौत हुई है लेकिन नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक मई के पहले 13 दिनों में ही 1060 लोगों का अंतिम संस्कार कोविड प्रोटोकॉल से किया गया है. इसमें से 541 बांस घाट, 397 गुलबी घाट, 90 खाजेकलां घाट, 4 नंदगोला घाट और 28 शाहगंज कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार किया गया. 

कलीमा ख़ातून की मौत बेतिया (पश्चिम चंपारण) के राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय सह अस्पताल में कोरोना से मृत्यु हुई. RT-PCR में रिपोर्ट नेगेटिव आई थी लेकिन CT-Scan में रिपोर्ट पॉजिटिव आई. 14 मई को उनकी मृत्यु इलाज के दौरान हुई. लेकिन आज तक उन्हें उनका मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिला है. कलीमा ख़ातून के बेटे अफसर अली ने बताया कि

जिस दिन मां की मौत हुई उस दिन हमें कुछ समझ में नहीं आया कि उनका मृत्यु प्रमाण पत्र भी लेना है. लेकिन दो दिन बाद जब हॉस्पिटल में अप्लाई करने गए तो बड़ा बाबू, उदय कुमार, ने मृत्यु प्रमाण पत्र देने से साफ़ इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि मृत्यु प्रमाण पत्र बनायेंगे तो वो सिर्फ़ नॉर्मल डेथ का बनायेंगे. 

हालांकि बाद में पटना के जिलाधिकारी ने दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में डेमोक्रेटिक चरखा के आंकड़ों को सही माना और सरकारी आंकड़ें दुरुस्त करने की बात कही.

2021 में कोरोना के दौरान आर्थिक स्थिति बिगड़ी, परिवार ने 14 साल की बेटी की शादी करवा दी:

ये घटना बेगूसराय के डंडारी प्रखंड की है. लॉकडाउन के दौरान एक परिवार की स्थिति काफ़ी ख़राब हो गयी. उनके पास खाने के लिए भी कुछ मौजूद नहीं था. इस वजह से उन्होंने अपनी 14 साल की बेटी की शादी करवा दी. शादी के पीछे परिवार का तर्क ये था कि उनका कुछ बोझ तो कम होगा.

ऐसा नहीं है कि ये कहानी सिर्फ़ एक परिवार की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘गरीब कल्याण अन्न योजना’ की शुरुआत की थी. उन्होंने ये दावा भी किया कि 80 करोड़ लोगों को ‘मुफ़्त’ राशन दिया गया है लेकिन ज़मीनी हकीकत बिलकुल ही उल्ट थी.

बिहार राज्य के आंकड़ों के अनुसार गृहस्थ और अंत्योदय राशन कार्ड को मिला कर बिहार में कुल 1,78,79,453 (एक करोड़ अठत्तर लाख) परिवार के पास राशन कार्ड है. प्रधानमंत्री ग़रीब अन्न योजना के तहत बिहार राज्य को मई के महीने में 3,48,466 मेट्रिक टन गेंहू दिया गया और FCI के ओर से 6,274 मेट्रिक टन गेंहू दिया गया यानी कुल 3,54,740 मेट्रिक टन गेंहू बिहार को मिला लेकिन बंटा सिर्फ़ 1,55,752.03 यानी 1/3 हिस्सा. 

चावल की स्थिति भी कमोबेश वही है. प्रधानमंत्री अन्न योजना के तहत 5,22,698 मेट्रिक टन चावल बिहार को मिला लेकिन बंटा सिर्फ़ 2,33,469.20 मेट्रिक टन. अगर पूरे राशन का हिसाब करें तो केंद्र सरकार की ओर से राज्य को दिया गया 8,78,038 और बांटा गया सिर्फ़ 3,89,221.23

बिहार में भूख की कहानी काफ़ी लंबी है. शायद कोरोना में सरकारी तंत्र के नाकामयाबी की ये एक ऐसी दास्तान है जिस पर काफ़ी कम लोगों की नज़र जा रही है लेकिन अधिकांश बिहार इस भूख से अभी भी गुज़र रहा है.

2021 में किसान आंदोलन की जीत हुई लेकिन बिहार में हर कदम पर किसानों की हार हुई:

बिहार सरकार ने ट्वीट करके जानकारी दी कि उन्होंने इस साल गेंहू की रिकॉर्ड तोड़ ख़रीददारी की और पिछले बार से 12.59% अधिक ख़रीद की गयी है. लेकिन बिहार सरकार केवल आंकड़ों के जाल में ही फंसा कर सच छुपाने में माहिर है. इस साल बिहार सरकार ने गेंहू ख़रीदने का लक्ष्य 7 लाख मेट्रिक टन रखा था, जो 15 जून तक पूरा किया जाना था. 23 जून शाम 8 बजे तक पैक्स ने सिर्फ़ 69472.22 मिट्रिक टन गेंहू की ख़रीद की है. बिहार सरकार अपने लक्ष्य का सिर्फ़ 10% ही गेंहू ख़रीद पायी थी.

महात्मा गांधी जब नील की खेती के ख़िलाफ़ बिहार से आंदोलन की शुरुआत की थी तो उन्होंने इस आश्रम की स्थापना की थी. वृंदावन आश्रम के आस-पास सरकार ने कई किसानों को खेती करने के लिए ज़मीन दी हुई है. लेकिन इन किसानों के पास मोबाइल फ़ोन और पहचान पत्र कुछ भी मौजूद नहीं है. सहदेव महतो वृंदावन आश्रम के पास गेंहू किसान हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें रजिस्टर होने या MSP के बारे में जानकारी है, तो वो बताते हैं

MSP क्या होता है हमें ये नहीं पता. जब हमलोग खेती करते हैं तो एक बड़े व्यापारी हैं पड़ोस के ही वो हमारी सारी फ़सल  ₹1100/क्विंटल के हिसाब से ख़रीद लेते हैं. पैसे तो कम मिलते हैं लेकिन किसी तरह घर चल जाता है.

अभी भी बिहार के किसान खाद की बड़ी किल्लत झेल रहे हैं लेकिन सरकार इसपर कोई माकूल कदम नहीं उठा रही है.

2021 में बिहार में ग्रामीण शिक्षा देश में सबसे ख़राब:

यू डाइस की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में शिक्षक छात्र अनुपात 1:57 है. जो कि 1:30 होना चाहिए. यानि तीस बच्चों पर एक शिक्षक. बिहार के 8000 से ज्यादा स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात 1:100 है. एक साल पहले केंद्र सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट में शिक्षकों की कमी के मामले में बिहार टॉप पर रहा है. जहां करीब तीन लाख शिक्षकों के पद रिक्त हैं. बिहार शिक्षा परियोजना के मुताबिक बिहार में 41762 प्राथमिक विद्यालय हैं जबकि 26523 मध्य विद्यालय हैं. बिहार में 3276 स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे काम चल रहा है. जबकि 12507 विद्यालयों में 2 शिक्षक, 10595 स्कूलों में 3 शिक्षक, 7170 विद्यालयों में 4 शिक्षक, 4366 स्कूलों में 5 शिक्षक और 3874 स्कूलों में 5 या इससे अधिक शिक्षक कार्यरत हैं.

शिक्षकों की कमी के साथ बिहार में शिक्षकों की योग्यता पर भी UNESCO की रिपोर्ट ने सवाल उठाया है. शिक्षकों की योग्यता पर यूनेस्को (UNESCO) की रिपोर्ट कहती है कि बिहार में लगभग 16% प्री प्राइमरी, 8% प्राइमरी, 13% अपर प्राइमरी, 3% सेकेंडरी और 1% हायर सेकेंडरी शिक्षक अंडर क्वालिफाइड हैं.

बिहार का एक ऐसा गांव जहां 2021 तक बिजली नहीं पहुंची:

(सारबकोठी में रिपोर्ट बनांते डेमोक्रेटिक चरखा के ग्रामीण पत्रकार अरुण सम्राट)

दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण ज्योति योजना (DDUGJY) के तहत साल 2014 में केंद्र सरकार ने ये वादा किया था कि अगले 1000 दिनों में सभी ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुंचा दी जायेगी. इस योजना के लिए 43,033 करोड़ रूपए प्रदान किये गए थे. इसमें से सिर्फ़ 33,453 करोड़ रूपए ख़र्च किये गए. इसमें हर राज्य में केंद्र सरकार द्वारा 60% राशि दी जाती थी और राज्य सरकार द्वारा 40%, विशेष दर्जे वाले राज्यों में 85% राशि केंद्र सरकार द्वारा दी जाती थी.

साल 2019 में केंद्र सरकार ने ये घोषणा कर दी कि देश के 99.93% घरों में बिजली पहुंच चुकी है. केवल छत्तीसगढ़ के कुछ घरों में (0.4%) बिजली नहीं पहुंची है. ये सारी जानकारी सरकारी वेबसाइट के आधार पर कही जा रही है. जब हमने उस वेबसाइट पर बिहार के आंकड़ों पर नज़र डाली तो पता चला कि बिहार में सभी घरों में 100% बिजली पहुंच चुकी है.

बाघबन पंचायत में एक गांव है साबरकोठी, इस गांव में आज़ादी के 73 सालों के बाद भी बिजली नहीं पहुंची है. हमारे ग्रामीण पत्रकार अरुण सम्राट जब वहां पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि इस गांव में एक भी बिजली का खंभा भी नहीं लगा है. बाघबन पंचायत में अंदर गांव की तरफ़ जाने वाले रास्ते में कहीं एक बल्ब भी नहीं लगा हुआ था.

डेमोक्रेटिक चरखा ने अप्रैल के महीने में इस रिपोर्ट को पब्लिश किया था. इसके बाद प्रखंड विकास पदाधिकारी ने इस मामले को संज्ञान में लिया और इस गांव में बिजली की व्यवस्था करवाई.

उम्मीद है साल 2022 में बिहार में इन मुद्दों पर सरकार काम करेगी और जल्द ही बदलाव भी लाने का काम करेगी.

निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता ज़रूरी है

आपके लिए डेमोक्रेटिक चरखा आपके लिए ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स पब्लिश करता है जिससे आपको फ़र्क पड़ता है
हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.