भीमा कोरेगांव हिंसा के तीन साल पूरे, अब तक पुलिस कुछ साबित नहीं कर पाई

भीमा कोरेगांव हिंसा के तीन साल पूरे

आज से ठीक तीन साल पहले 2018 में ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठों के बीच हुए युद्ध की 200वीं वर्षगांठ के जश्न के दौरान भीमा कोरेगांव  हिंसक झड़पों का गवाह बना था। इस हिंसा का देश के सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर गंभीर असर आज तक है। इस मामले में कई कवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर आतंकवादी गतिविधियों में सम्मिलित होने जैसे गंभीर आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया, हजारों पन्नों कि चार्जशीट दायर की गई, राजनीतिक दबाव में कई बार जांच एजेंसियां भी बदली गई पर साबित कुछ भी नहीं हो पाया। आज इसी मौके पर हम जानते है इन तीन सालों में क्या मोड़ आए?

भीमा कोरेगाँव हिंसा

16 गिरफ़्तारियां और 10 हज़ार पन्नों की चार्जशीट

इस पूरे मामले में सरकार बदलने के साथ साथ जांच ने भी अपनी दिशा बदली है। पहले इस मामले की जांच पुणे पुलिस कर रही थी लेकिन बाद में केंद्र सरकार ने इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया। शुरूवात में पुणे पुलिस ने इस हिंसा से जुड़े दो अलग-अलग मामले दर्ज किए थे।

भीमा कोरेगांव हिंसा के चार्जशीट में कश्मीर, आतंकवाद, नक्सलवाद आदि के कनेक्शन का जिक्र

भीमा कोरेगाँव हिंसा

एएनआई की ओर से दायर चार्जशीट में दावा किया गया कि समाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा कश्मीरी अलगाववादियों, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी और माओवादी चरमपंथियों के सपंर्क में थे। चार्जशीट में दावा किया गया कि नवलखा से ज़ब्त डिज़िटल उपकरणों से उनके माओवादियों और आईएसआई से संबंध साबित हुए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर हेनी बाबू को भी मामले में गिरफ़्तार किया गया था। एनआईए ने उन पर अपने छात्रों को माओवादी विचारधारा से प्रभावित करने का आरोप लगाया।  इनपर विदेशी फंडिंग के लिए विदेशी ताकत का मदद का भी आरोप हैं।


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कोर्ट में कई बार गिरफ्तार लोगो के मूल अधिकारों के हनन का आरोप लगाया जा चुका 

भीमा कोरेगाँव हिंसा

वरिष्ठ तेलुगू कवि और बुद्धिजीवी वरवर राव बीते दो साल से सलाखों के पीछे हैं और फ़िलहाल ख़राब स्वास्थ्य के चलते उनका मुंबई के नानावती अस्पताल में इलाज चल रहा है। वहीं 83 वर्षीय स्टेन स्वामी पर नक्सलियों के साथ संबंध होने के आरोप हैं। वह भी कई बीमारियों से ग्रसित है और कुछ दिन पहले स्टेन स्वामी को स्ट्रॉ देने से इनकार कर दिया गया था, इस पर जेल प्रशासन की कड़ी निंदा हुई थी बाद में कोर्ट के हसतक्षेप के बाद उन्हें स्ट्रॉ दिया गया था।

 1818 की लड़ाई से है भीमा कोरेगांव का ऐतिहसिक  महत्व

इस लड़ाई में महार सैनिकों ने पेशवा सेना पर जीत हासिल करने में ब्रिटिशों की मदद की थी। हर साल एक जनवरी को हज़ारों लोग, जिनमें अधिकतर दलित समुदाय के लोग होते हैं, वो यहां इकट्ठा होकर श्रद्धांजलि देते है। इस पूरे मामले न पुणे सिटी पुलिस ने आरोप लगाया कि भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा में वामपंथी कार्यकर्ता शामिल थे। वहीं पुणे ग्रामीण पुलिस ने आरोप लगाया कि एक जनवरी 2018 को हुई हिंसा के पीछे हिंदुत्ववादी नेता थे। यह भी कहा गया कि भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में हिंदुत्व की राजनीति से जुड़े लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और उन्हें ‘क्लीन-चिट’ दे दी गई, जबकि दूसरी तरफ वामपंथी झुकाव रखने वाले लोगों को अनुचित रूप से गंभीर कार्रवाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

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Shreya Sinni

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