विवेकानंद सेक्युलर इंसान होने के बावजूद इन्हें हिंदूवादी नेता बना दिया गया

स्वामी विवेकानंद हिंदूवादी नहीं बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति 

भारत जैसे देश में कई ऐसे महापुरुष आए जिन्होंने अपने विचारों व सोचने की क्षमता से कई बड़े बदलाव किया। उन्हीं में से एक महापुरुष  स्वामी विवेकानंद हैं। स्वामी विवेकानंद का जन्म आज ही के दिन यानी की 12 जनवरी को 1863 को बंगाल में हुआ। इस बात से हर कोई वाक़िफ़ है कि स्वामी विवेकानंद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। लेकिन मौजूदा समय में उन्हें एक हिंदू संत तथा एक हिंदूवादी नेता के रुप में प्रदर्शित किया जाता है।

स्वामी विवेकानंद

उन्हें एक हिंदूवादी नेता के रुप में प्रदर्शित करने वाले लोगों में वह लोग शामिल है जो शायद स्वामी विवेकानंद को अच्छी तरह से जानते ही नहीं है क्योंकि विवेकानंद तो ऐसे  इंसान थे जिन्होंने हर धर्म के व्यक्ति के प्रति प्रेम भाव रखा। वर्तमान समय में स्वामी विवेकानंद को कुछ रुढ़िवादी संगठनों तथा मौजूदा सरकार के द्वारा इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है कि विवेकानंद एक हिंदू सन्त थे हालांकि ऐसा नहीं था। 

स्वामी विवेकानंद ने कहा था- सभी धर्म एक 

स्वामी विवेकानंद

साल 1893 में अमेरिका में सर्वधर्म परिषद की बैठक की गई जिसमें भारत की ओर से स्वामी विवेकानंद को प्रतिनिधित्व के तौर पर भेजा गया। यह सम्मेलन 11 सितंबर को शुरू किया गया था तथा स्वामी विवेकानंद या 28 सितंबर को परिषद की समापन में कुछ चंद लाइने कहते है। जिनसे यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि विवेकानंद एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। उन्होंने कहा था कि, “सभी धर्म एक है। आध्यात्मिकता पवित्रता, मन की पवित्रता और दया सभी धर्मों का आधार है। मेरा मानना है कि सभी धर्मों के झंडे तले लिखा जाएगा, कोई संघर्ष नहीं, एक दूसरे की मदद करें, एक दूसरे को आत्मसात करें। नष्ट मत करो, झगड़ा मत करो, दोस्ती चाहते हैं मुझे शांति चाहिए।”


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उन्होंने जाति व्यवस्था को नकारा व स्त्री अधिकारों पर बात की

स्वामी विवेकानंद सिर्फ धर्मनिरपेक्ष ही नहीं बल्कि जाति व्यवस्था को भी नकारते थे। इस बात का पता उनके द्वारा 22 अगस्त 1892 को दीवान जी को भेजें एक पत्र से पता चलता है। इस पत्र में उन्होंने कहा था कि उनको ब्राह्मणों जिनकी 400 पीढ़ियों ने नहीं देखा की वेद क्या है वे आज राष्ट्र को वेद पढ़ा रहे है। भगवान मेरे देश को इन राक्षसों से बचाओ जो ब्राहमणों के रूप में मेरे देश में चलते हैं।” वही 20 अगस्त 1893 को उन्होंने इंटरफेस सम्मेलन में पेरुमल को भेजें एक पत्र में कहा कि,” कोई भी धर्म मनुष्य की महिमा को हिंदू धर्म के समान कठिन नहीं बताता है। दुनिया का कोई भी धर्म ग़रीबों और निचली जातियों पर उतना जुर्म नहीं करता जितना हिंदू धर्म करता है।” विवेकानंद न सिर्फ नकारने वाले एवं धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। बल्कि वे महिलाओं के अधिकारों के बात भी करते थे। लेकिन वर्तमान समय में उनके इन मूल्यों को नकार कर उन्हें एक हिंदू आइकन के रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है जो कि सरासर गलत है।

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