कौन थी क्रांतिकारी रोज़ा लक्सम्बर्ग जिनसे फ़ासीवाद नाज़ी सेना डरती थी

रोज़ा लक्समबर्ग की शहादत को सलाम

रोज़ा लक्समबर्ग का नाम उन सुधारवादी योद्धाओं में शुमार है। जिन्होंने सर्वहारा वर्ग के लिए संघर्ष किया और इस संघर्ष के चलते अपने प्राणों तक को न्यौछावर कर दिया। रोज़ा लक्जमबर्ग का सर्वहारा वर्ग के लिए उनका समर्पण व उनकी कुर्बानी को सालों साल याद रखा जाएगा। आज रोजा लक्जमबर्ग की स्मृति दिवस है।

रोजा लक्समबर्ग

आज ही के दिन यानी कि 15 जनवरी 1919 को उन्हें बर्लिन की सेना ने गिरफ्तार किया, प्रताड़ित किया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया। भले ही आज वे हमारे बीच नहीं है लेकिन हमेशा उनका बलिदान याद रखा जाएगा।

कौन थी रोज़ा लक्समबर्ग?

रोज़ा लक्समबर्ग एक मार्क्सवादी विचारक, दार्शनिक और महान क्रांतिकारी थी। उनका जन्म पोलैंड में 5 मार्च 1871 में हुआ था। वह एक यहूदी परिवार में जन्मी थी। रोजा ने 15 साल की उम्र से ही अपने को लोगों की सेवा में न्यौछावर कर दिया। जब वह 15 साल की थी तभी उन्होंने पॉलिश सर्वहारा पार्टी की सदस्यता ली। तब से लेकर आजीवन उन्होंने श्रमिकों के लिए काम किया। लेकिन हर सुधारवादी नेता की तरह उनकी राह आसान नहीं थी।

रोजा लक्समबर्ग

1887 में जब उन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूरी की तो सेना उनकी गिरफ्तारी के लिए उनके पीछे लग गई। लेकिन इन सब से बच निकल कर वह स्विटज़रलैंड चली आई। जहां उन्होंने ज़्यूरिच विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया। उस दौर में जहां बहुत कम महिलाएं पढ़ -लिख पाती थी। वही रोज़ ने क़ानून में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। उपाधि हासिल करने के बाद वे फिर से अपने राजनीतिक कामों में संलग्न हो गई। उनके पूंजीवाद विरोधी रुख को देखते हुए। उन्हें तुरंत पोलीस हॉर्सलेस पार्टी की सदस्यता मिल गई। लेकिन 1898 में वे बर्लिन चली गई। उन्होंने यूरोप में श्रमिकों के अंतरराष्ट्रीय आंदोलन में लेखन शिक्षण और भाषण का काम किया।


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1915 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया

रोजा लक्समबर्ग

लक्समबर्ग ने जब देखा की प्रथम विश्व युद्ध में लड़ने के लिए श्रमिक वर्ग का इस्तेमाल किया जा रहा था। उनका यह इस्तेमाल बुजुर्ग और कुलीन वर्ग के का हित साधने के लिए किया जा रहा था। तब उन्होंने इस कट्टरपंथी एजेंडा का विरोध किया और स्पार्टाकस की शुरुआत की। लेकिन साल 1915 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन उनकी यह गिरफ्तारी उनके जज़्बे को नहीं रोक पाई। वे जेल से ही अपने लिखने और आंदोलन करने का काम करती रही। अपनी गिरफ्तारी के 3 साल बाद यानी कि 1918 में उन्हें रिहा किया गया। लेकिन 15 जनवरी 1919 को उन्हें और उनके कम्युनिस्ट नेता कार्ल लिबनिखत के साथ गिरफ्तार कर एक होटल ले जाया गया। जहां उन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया तथा एक कार में ले जाया गया। उस कार में उन्हें गोली मार दी गई। बाद में उनकी लाश को एक महल से बरामद किया गया। रोज़ा के समर्थकों द्वारा उन्हें रेड रोज़ा कहा जाता था। इस महान क्रांतिकारी नेता की शहादत को लाल सलाम।

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