रोहित वेमुला के नाम: मैं लेखक बनना चाहता था लेकिन सिर्फ़ ये ख़त लिख पाया

मुझे साइंस से बहुत प्यार है और मैं साइंस का लेखक बनना चाहता था। बिल्कुल कार्ल सगान की तरह लेकिन अंत में मैं सिर्फ़ ये ख़त ही लिख पाया।

17 जनवरी 2016, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं। आज उस घटना को 5 साल हो चुके हैं लेकिन फिर एक सवाल पर बहस कायम है कि ये आत्महत्या थी या फिर एक संस्थानिक हत्या?

Rohit Vemula
                                                          (रोहित वेमुला)

साल 2020 में सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की। उस वक़्त मीडिया चैनलों ने चिल्ला-चिल्ला कर ये साबित करना चाहा कि सुशांत सिंह की आत्महत्या दरअसल एक हत्या है। इसे लेकर सीबीआई जांच भी हुई लेकिन उसमें भी इसे आत्महत्या ही माना गया। लेकिन जब साल 2016 में रोहित वेमुला ने आत्महत्या की तब मीडिया ने उल्टे रोहित और उसके परिवार वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था।


और पढ़ें:- अछूत के सवाल लेख में अछूतों के खिलाफ भगत सिंह के विचार काफी संघर्ष पूर्ण


कौन थे रोहित वेमुला

मेरा जन्म एक भयंकर दुघर्टना थी।

रोहित वेमुला का जन्म 30 जनवरी 1989 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर में हुआ। रोहित वेमुला अपनी पीएचडी की पढ़ाई हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से कर रहे थे। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने ASA यानी अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के साथ मिलकर सामाजिक संघर्षों में काफ़ी सक्रिय थे। वैचारिक तौर पर रोहित वेमुला और ASA संघ और भाजपा की राजनीति के ख़िलाफ़ थे। रोहित वेमुला और उनके साथी यूनिवर्सिटी कैंपस में सरकार की नीतियों की ज़बरदस्त ढंग से तार्किक आलोचना करते थे।

Rohit ASA
(अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के प्रोटेस्ट में रोहित वेमुला)

ABVP यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, जो भाजपा की छात्र शाखा है, ने रोहित वेमुला और उनके चार और साथियों की शिकायत यूनिवर्सिटी प्रशासन से की। जिसके बाद केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने तात्कालिक एचआरडी मिनिस्टर स्मृति ईरानी को पत्र लिख कारवाई की मांग की।
केंद्रीय मंत्री और एचआरडी मंत्रालय के दबाव के बाद रोहित वेमुला और उनके चार साथियों को निष्कासित कर दिया गया। साथ ही उनके फ़ेलोशिप भी बंद कर दी गई।

रोहित वेमुला ने अपने पत्र में लिखा है-

आप जो मेरा पत्र पढ़ रहे हैं, अगर कुछ कर सकते हैं तो मुझे अपनी सात महीने की फ़ेलोशिप मिलनी बाक़ी है. एक लाख 75 हज़ार रुपए. कृपया ये सुनिश्चित कर दें कि ये पैसा मेरे परिवार को मिल जाए. मुझे रामजी को चालीस हज़ार रुपए देने थे. उन्होंने कभी पैसे वापस नहीं मांगे. लेकिन प्लीज़ फ़ेलोशिप के पैसे से रामजी को पैसे दे दें.

रोहित वेमुला और उनके साथियों को जब हॉस्टल से निकाल दिया गया तो ASA के बैनर तले सभी कैंपस में ही भूख हड़ताल पर बैठ गए। लेकिन 17 जनवरी को रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली।

आत्महत्या या फिर संस्थानिक हत्या

रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद इस सवाल पर ज़बरदस्त बहस हुई। स्टूडेंट्स और कई प्रोग्रेसिव फ़ोरम्स का मानना था कि रोहित वेमुला की हत्या सरकार और यूनिवर्सिटी प्रशासन ने की है। आप इन पॉइंट्स पर थोड़ा ध्यान दीजिएगा:-

• केंद्रीय मंत्री दत्तात्रेय ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की शिकायत पर कारवाई की। यूनिवर्सिटी के मामले में और स्टूडेंट पॉलिटिक्स में केंद्रीय मंत्री को इंटरफेयर करने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
• केंद्रीय मंत्री दत्तात्रेय ने एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिख कर मामले को संज्ञान में लेने को क्यों कहा?
• स्मृति ईरानी ने यूनिवर्सिटी के कुलपति यानी वाईस चांसलर के ऊपर कारवाई का दबाव क्यों बनाया?
• क्या हर यूनिवर्सिटी के हर मामले में केंद्रीय मंत्री ऐसे ही इंटरफेयर करते हैं?
• अगर नहीं, तो इस मामले में उन्होंने ऐसा क्यों किया?

Rohit and Friends
(रोहित वेमुला अपने दोस्तों के साथ)

आज से लगभग डेढ़ साल पहले डॉक्टर पायल तड़वी ने मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज में आत्महत्या की। डॉक्टर पायल पर जातिगत आधार पर भेदभाव किया जाता था। डॉक्टर पायल तड़वी पर इतना दबाव बनाया गया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। लेकिन क्या इस मामले को आत्महत्या कहना सही होगा?

Payal Tadvi
(डॉक्टर पायल तड़वी)

कुछ ऐसा ही रोहित वेमुला के केस में भी देखने को मिलता है। जातिगत भेदभाव, टिप्पणियां और जन्म के आधार पर उनसे जो व्यवहार किया गया और इसके ऊपर से यूनिवर्सिटी प्रशासन और सरकार ने रोहित वेमुला की मदद करने के बजाय उन्हें ही निष्कासित कर दिया। इस केस को आप क्या कहेंगे? आत्महत्या या संस्थानिक हत्या?

साल 1999 में एक हॉलीवुड फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, मेट्रिक्स। इसके एक सीन में फ़िल्म के चरित्र नियो को लाल रंग और नीले रंग की गोली के बीच किसी एक को चुनना होता है। लाल रंग की गोली उसे सच्चाई दिखाएगी और नीले रंग की गोली से वो सभी चीज़ों को इग्नोर कर देगा। इस सीन में नियो ने तो लाल रंग की गोली को चुना लेकिन हम सभी ने असलियत से मुंह फेरने के लिए नीले रंग की गोली को चुना है। हमारे आस-पास जातिगत आधार पर हर दिन भेदभाव होता है लेकिन हम सभी अपनी नज़रों को नीचे करके आगे बढ़ जाने में ही भलाई समझते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर साल 2010 में बालमुकुंद ने आत्महत्या क्यों की होती?

आप सभी को बालमुकुंद तो याद होंगे? शायद नहीं। क्योंकि आज के दौर में हम सभी की याददाश्त सिर्फ़ 5 मिनट की होती है। बालमुकुंद उत्तरप्रदेश के कुंडेश्वर से थे। अपने गांव से पहले जिनका एडमिशन एम्स, दिल्ली में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए हुआ था। बालमुकुंद दसवीं में टॉपर थे, इंटरनेशनल मैथ्स कांटेस्ट के विजेता थे और उनका चयन आईआईटी और एम्स दोनों में हुआ लेकिन उन्होंने डॉक्टर बनने का सपना देखा था। लेकिन कॉलेज कैंपस में हर दूसरे पल उन्हें ये याद दिलाया जाता रहा कि वो एक दलित समुदाय (चमार) से ताल्लुक रखते हैं। उन्हें कहा जाता रहा कि चमार कब से डॉक्टर बनने लगें या उनका एडमिशन सिर्फ़ आरक्षण के कारण हुआ है। बालमुकुंद के मां-बाप ने नाम बदल कर जाति के जंजाल से निकलना चाहा लेकिन वो भी मुमकिन नहीं हो सका। मार्च 2010 में मानसिक दबाव में आकर अपने डॉक्टरी के आख़िरी साल में बालमुकुंद ने आत्महत्या कर ली।

चंडीगढ़ के जसप्रीत सिंह, जो अपने मेडिकल कॉलेज के टॉपर थे, उन्होंने भी जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली। लिस्ट लंबी है। इस लिस्ट में आई.आई.टी रूढ़की जैसे कॉलेज भी हैं जहां स्टूडेंट्स ने जातिगत कारणों से आत्महत्या कर ली थी।

9 नवंबर, 2019 फ़ातिमा लतीफ़, 13 मार्च मुथुकृष्णन ये महज़ एक नाम नहीं हैं बल्कि ये एक सिंबल हैं कि भारत में आज भी जाति व्यवस्था मौजूद है। रोहित वेमुला ने अपने ख़त में इंसान की कीमत के बारे में बिल्कुल सटीक बयान किया है।

एक आदमी की क़ीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नज़दीकी संभावना तक सीमित कर दी गई है. एक वोट तक. आदमी एक आंकड़ा बन कर रह गया है. एक वस्तु मात्र. कभी भी एक आदमी को उसके दिमाग़ से नहीं आंका गया. एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी. हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में.

Digiqole Ad Digiqole Ad

Amir Abbas

Related post