कोरोना काल का ‘टीका राष्ट्रवाद’

कोरोना वायरस जिस तरह अब विश्व की सभी भाषाओं का शब्द हो गया है, उसी तरह उसके चलते इस्तेमाल किया जानेवाला एक और शब्द अब हमारे शब्दकोश में जुड़नेवाला है. वह है, टीका-राष्ट्रवाद. अंग्रेज़ी में ‘वैक्सीन नैशनलिज्म’. इसका प्रचलन कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के किए टीके की खोज के बाद किया जा रहा है.

“हमारे देश ने पहले टीका खोज लिया.”

“बाकी दुनिया को जो हो, हमारे देश के लोगों को बाकी देशों के लोगों के पहले टीका लग जाएगा.”


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टीका-राष्ट्रवाद के ये दो रूप हैं. रूस और चीन के नेताओं ने पहलेवाला नारा बुलंद किया. उन्होंने दावा किया कि टीके के मामले में उन्होंने पूरी दुनिया को पीछे छोड़ दिया है. लेकिन वैज्ञानिक बिरादरी ने उनके इस दावे पर संदेह और चिंता प्रकट की.

टीकाकरण

संक्रामक रोगों के विशेषज्ञों ने कहा कि सार्वजनिक टीकाकरण के पहले तीन स्तरों पर टीके की परीक्षा की जाती है. दो चिंताएँ हैं: क्या टीका सुरक्षित है और क्या वह कारगर है? इसके लिए तीसरे स्तर का परीक्षण महत्त्वपूर्ण ही नहीं, अनिवार्य है. जाँच के तीसरे चरण के दौरान जिनपर टीके का परीक्षण किया गया उनकी संख्या पर्याप्त होनी चाहिए.

अगर वह संख्या हज़ारों की नहीं है तो यह ठीक ठीक मालूम करना मुश्किल है कि वह कितना असरकारी है और दूसरे, उसे लेने पर शरीर पर कहीं और तो असर नहीं  पड़ रहा!

टीका लेने पर अगर देह में दूसरी गड़बड़ी पैदा होने लगे तो टीका फायदे से ज्यादा नुकसान पहुँचा सकता है. इसे जानने के लिए नमूने अलग-अलग तरह के और बड़ी संख्या में होने चाहिए.


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सिर्फ यही नहीं, जाँच के जो नतीजे आए हैं, उन्हें टीका बनानेवाली कंपनी को सार्वजनिक करना भी ज़रूरी है. उसे विशेषज्ञों की बिरादरी पढ़ती और परखती है और फिर जब उनमें उसकी प्रभावकारिता के बारे सहमति बन जाती है तब लाखों, करोड़ों लोगों के टीकाकरण की शुरुआत की जा सकती है.

भारत में इस तरह की जाँच के बाद सार्वजनिक प्रयोग की इजाज़त देने के लिए विशेषज्ञों की एक संस्था है जिसे सरकार से स्वायत्त माना जाता है. स्वायत्त इसलिए कि वह बिना किसी दबाव के वह निर्णय कर सके. भारत में उस संस्था का नाम ड्रग्स कंट्रोलर जेनरल ऑफ़ इंडिया (डी.सी.जी.आई).

रूस और चीन में टीके की जाँच के तीसरे चरण को लेकर विशेषज्ञों में काफी संदेह है. इन देशों के शासकों ने उसके नतीजों और आंकड़ों को सार्वजनिक करने की ज़रूरत महसूस नहीं की. ये दोनों ही देशों में अलग-अलग तरह की तानाशाहियाँ हैं. इसलिए वहाँ इस बात पर सार्वजनिक आलोचना खतरनाक है.

शासक जब बिना पूरी प्रक्रिया के किसी टीके को सार्वजनिक प्रयोग के लिए स्वीकृति दिलाने पर ज़ोर देते हैं तो मानना चाहिए कि उनका इरादा लोगों की सुरक्षा का नहीं है, यह साबित करने का है कि उनके नेतृत्व में वह कर लिया गया जो दुनिया में कोई नहीं कर सका. वे यह प्रचारित करते हैं कि यह उनके नेतृत्व में राष्ट्र की उपलब्धि है. अगर कोई इसपर सवाल उठाए तो उसे नेता अपनी आलोचना मानते हैं. लेकिन अपनी आलोचना को वे राष्ट्र की आलोचना में बदल देते हैं. प्रक्रिया पर प्रश्न किया जाए तो उसे राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाता है.


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रूस और चीन जैसी तानाशाहियों में भी ऐसे लोग हैं जो अपनी जान की परवाह किए बिना जनता को उसके हित में सच बताने का काम करते हैं. उनके लिए इस दुस्साहस का परिणाम गंभीर हो सकता है. ऐसे देशों में जनता को कभी सच मालूम भी नहीं होगा क्योंकि उसका कोई जरिया नहीं है. मीडिया पूरी तरह से सरकार के काबू में होता है और वह सरकार या नेता की बात को ही एकमात्र और अंतिम सत्य के रूप में प्रचारित करता है. जनता को इस तरह अपनी ख़बर भी नहीं होती.

रूस में विकसित किए गए टीके को सार्वजनिक प्रयोग के लिए जारी करते हुए राष्ट्रपति पूतिन ने दुनिया में नंबर 1 होने का दावा किया. चीन के वैज्ञानिकों पर दबाव डाला गया कि वे राष्ट्रीय राजनीतिक जिम्मा मानकर वे टीका बनाएँ.

भारत को अभी भी जनतंत्र माना जाता है. लेकिन यहाँ भी वही किया गया जो रूस और चीन में किया गया है. यहाँ डी सी जी आई ने कहा कि भारत बायोटेक कंपनी के द्वारा विकसित किए टीके कोवैक्सिन की जाँच का अनिवार्य तीसरा चरण पूरा किए बिना भी इसे इस्तेमाल किया जा सकता है. उसने टीके को आपातकाल में सीमित प्रयोग के लिए स्वीकृत किया है.

विशेषज्ञ अनुमति की इस उलझी हुई भाषा से हैरान हैं. उनका कहना है कि दो में से एक ही बात हो सकती है: या तो टीका जाँच के तीसरे चरण में  है, और अगर ऐसा है तो उसका सार्वजनिक इस्तेमाल नहीं हो सकता या वह सारी जाँच के बाद सुरक्षित और कारगर पाया गया है और आम जनता को लगाया जा सकता है. आपातकाल में सीमित प्रयोग जैसी कोई चीज़ नहीं हो सकती. अगर वह हो भी तो सीमित का क्या अर्थ है. क्या लाखों की संख्या को भी सीमित माना जाएगा? और अभी आपातकाल की क्या स्थिति है? जब संक्रमण का जोर खुद ब खुद घट रहा है तब तो आपातकाल नहीं ही है. फिर टीके को जाँच के तीनों चरणों से क्यों न गुजारा जाए? जनता को क्यों भुलावे में रखा जाए?

ये प्रश्न राजनेताओं ने नाहीं, डॉक्टर गगनदीप कांग जैसी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक ने उठाए हैं. उन्होंने साफ़ कहा है कि वे इस चरण में यह टीका कभी नहीं लेंगी. लेकिन राष्ट्रीय टीका विकसित कर लेने के उत्सवी शोर शराबे में उनकी आवाज़ दबा दी गई.

(डॉक्टर गगनदीप कांग)

हड़बड़ी किसकी थी? क्या यह दिखलाने कि हम रूस, चीन और यूरोप से पीछे नहीं? उसका असली कारण तब मालूम हुआ जब प्रधानमंत्री ने ऐलान किया कि यह टीका उनके आत्मनिर्भर भारत अभियान की देन है. विशेषज्ञों ने सवाल किया कि तीसरे चरण की जाँच पूरी किए बिना इसे सार्वजनिक प्रयोग की इजाज़त देना नैतिक रूप से तो गलत है ही, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उचित नहीं.

लेकिन जो भी सवाल कर रहा है उसपर सरकार के मंत्री और उनके वफादार वैज्ञानिक यह कहकर हमला कर रहे हैं कि वे राष्ट्र की उपलब्धि को मानने से इनकार कर रहे हैं. दूसरे शब्दों में वे राष्ट्रविरोधी हैं.

अभी जो भी टीका ले रहे हैं वे एक तरह से इस टीके की जाँच  के तीसरे चरण में बिना पूरी जानकारी के गिनी पिग हैं. उन्हें अगर कोई नुकसान हुआ तो उसके मुआवज़े का कोई प्रावधान भी नहीं है. लेकिन यह सवाल भी नहीं उठाया जा सकता. मीडिया भी जनता की तरफ से बोलने की जगह सरकार का गुणगान करने में व्यस्त है.

याद करना चाहिए कि जब एक साल पहले विपक्षी दल के नेता राहुल गाँधी ने चेतावनी देना शुरू किया था कि कोरोना वायरस के संक्रमण का ख़तरा है तब मंत्रियों ने उनपर यह कहकर हमला किया था कि वे राष्ट्र को डरा रहे हैं. सरकार ने उस समय संक्रमण के खतरे को मानने से इनकार कर दिया था. जिसने भी उसकी बात की उसे राष्ट्र-विरोधी घोषित किया गया था. उसने उस समय जो ढिलाई बरती उसका नतीजा भारत की आम जनता को भुगतना पड़ा. लेकिन उसे प्राकृतिक और दैवी प्रकोप बता दिया गया और इस तरह नेता अपनी लापरवाही के अपराध से बरी हो गया.

आज जब जब फिर बिना पूरी प्रक्रिया और आवश्यक सावधानी के सबको टीका लगाने की आलोचना हो रही है तो फिर इस आलोचना को राष्ट्रविरोधी घोषित किया जा रहा है. यही टीका-राष्ट्रवाद है. यह राष्ट्रवाद नेता के लिए भले ठीक हो और उसकी ताकत बढ़ा दे लेकिन जनता के लिए तो यह घातक है.

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