तीन कृषि क़ानून के निहितार्थ: प्रो. डी. एम. दिवाकर की टिप्पणी

तीन कृषि क़ानून 4 अध्यायों में विभाजित

भारत सरकार ने 2020 में किसान के नाम पर तीन कृषि क़ानून को लागू कर दिया है एक किसान सशक्तिकरण एवं संरक्षण कीमत आश्वासन एवं खेती सेवा समझौता क़ानून , दूसरा है किसान उत्पादन व्यापार एवं वाणिज्य क़ानून तीसरा है आवश्यक वस्तु क़ानून। भारत सरकार दावा करती है कि यह क़ानून किसानों के संरक्षण,सशक्तिकरण और सहूलियत के लिए है। इन क़ानूनों से किसानों की कठिनाइयां दूर होगी और किसान खुशहाल होंगे।

तीन कृषि क़ानून

यह क़ानून किसानों की बेहतरी के लिए है। इस क़ानून से किसान अपनी उपज बेचने के लिए कहीं भी आजाद होगा। यदि यह सच है तो क़ानून किसानों के हित में बना है किसानों से सलाह लेकर इस क़ानून को बनाना अच्छा होता। किसानों को विश्वास में नहीं लेने से लोकतंत्र के पहले सिद्धांत का अनदेखी किया गया। आइए इन क़ानूनों की पड़ताल करें।

तीन क़ानून

किसान कीमत आश्वासन एवं खेती समझौता क़ानून 4 अध्यायों में विभाजित है। पहला अध्याय अनुच्छेद 1 और 2 में इस क़ानून में प्रयुक्त शब्दों की परिभाषा है। दूसरे अध्याय में अनुच्छेद 3 से 12 तक लिखित करार संबंधी प्रावधानों का वर्णन है, जिसके मुताबिक किसान अब अपने किसी निजी कंपनी से अपने उत्पादन और खेती संबंधी सेवा के लिए स्पष्ट लिखित करार कर सकता है जिसमें फसल, उसकी आपूर्ति का समय, गुणवत्ता, कीमत, खेती के लिए विभिन्न तरीके की सेवाएं, आदि का परस्पर स्वीकार्य शर्तों पर निश्चय किया जा सकता है।

यह करार सामान्यतः एक फसल से लेकर 5 साल तक का हो सकता है। अगर कोई फसल 5 साल से अधिक समय का हो तो किसान और कंपनी के परस्पर सहमति से तय की जा सकेगी। करार के अनुसार किसान तयशुदा कीमत पर कंपनी को बेचने के लिए बाध्य है। वह तयशुदा कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य हो यह भी जरूरी नहीं होगा।

साथ ही बाजार में फसल का भाव अधिक हो भी तो करार के कारण किसी दूसरे खरीदार को नहीं बेच सकते जबकि पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य से बाजार भाव अधिक होने पर किसान अपना फसल किसी को भी और कभी भी मंडी में बेचने के लिए आजाद थे। अतः न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल की कीमत की कोई गारंटी नहीं है। इस प्रकार कीमत आश्वासन क़ानून का शीर्षक भी भ्रामक है।

यह दावा किया जाता है कि तीन कृषि क़ानून से किसानों को आजादी मिलेगी

तीन कृषि क़ानून

सरकार द्वारा यह दावा किया जाता है कि इस क़ानून से किसानों को आजादी मिलेगी लेकिन जब किसानों का कंपनी से लिखित करार हो जाता है तो उन्हें वहीं फसल लगानी होगी जो करार में शामिल है चाहे परिस्थिति बदल भी जाए। कीमत बाजार में बढ़ती जाए लेकिन किसानों को वही दाम मिलेगा जिस पर करार हुआ है। हिंदुस्तान की खेती आज भी मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है।

यदि मॉनसून कमजोर हुआ तो उपज कम होगी और फसल का दाम बाजार में बढ़ जाएगा किंतु करार में जो दाम तय हुआ है वही मिलेगा। साथ ही खेती के लिए जो सेवा कंपनी देगी उसका भुगतान भी करना होगा। इस प्रकार ना तो फसल लगाने की आजादी ना बेचने की आजादी। फसल के कीमत की कमी और बेचने का नुकसान तो हुआ ही कंपनी द्वारा लगाए गए लागत को भी वापस चुकाना पड़ेगा।


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तीन कृषि क़ानून

इस क़ानून से पहले आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के अधीन व्यापारी को एक सीमा से अधिक जमाखोरी की इजाजत नहीं थी लेकिन इस क़ानून में अब अनुच्छेद 7 के अधीन असीमित जमाखोरी की इजाजत तो है ही राज्यों में पहले से बने जमाखोरी के खिलाफ क़ानून को समाप्त कर दिया गया है।

सरकार यद्यपि बिचौलियों को खत्म करने के लिए इन कानूनों को जरूरी बताती है, लेकिन अनुच्छेद 10 में नए बिचौलियों का भी प्रावधान किया गया है। इस प्रकार आवश्यक वस्तु क़ानून 1955 में संशोधन 2020 लाकर जमाखोरी की छूट दे दी गई है। जिससे व्यापारी फसल कटने के समय से ही सस्ते दामों में अनाज खरीद कर जमा कर सकेंगे और बनावटी अभाव पैदा कर महंगे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा सकेंगे।

फसल की कटाई से 6 सप्ताह तक की कीमत को फसल कटनी कीमत कहते हैं

तीन क़ानून

हमें मालूम होना चाहिए की फसल की कटाई से 6 सप्ताह तक की कीमत को फसल कटनी कीमत कहते हैं जो अमूमन न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य से कम होता है। इसे अवसादी बिक्री भी कहते हैं। किसान अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यापारियों और लोगों से उधार लेने के एवज में सस्ते दामों का नाच बेचते हैं। इस अवसादी बिक्री को रोकने के लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था की।

अन्यथा जिसके पास तैयार फसल रखने की सुविधा होती है और तत्काल नकदी की जरूरत नहीं होती वे तो बाजार भाव चढ़ने पर ही फसल बेचने आए हैं। यद्यपि बहुत थोड़े से किसानों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पाता है।

शांता कुमार समिति के अनुसार केवल छह फ़ीसदी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पाता है शेष 94% आज भी अवसादी बिक्री करते हैं। यदि खेती उत्पादन बाजार समिति से बाहर निकलकर बेचना ही मैदान होता तो आज हिंदुस्तान का 94 फ़ीसदी किसान खुशहाल होता और किसानों की आत्महत्या नहीं बढ़ रही होती। फिर भी कृषि बाजार समिति किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देता है।

यदि बाजार में फसल की कीमत कृषि बाजार समिति से ज्यादा हो तो किसान को अपनी फसल बाजार में बेचने की आजादी होती है। चुकीं खेती उत्पादन मंडी समिति औसतन 40 किलोमीटर दूर होता है, छोटी किसान मंडी नहीं जा पाते हैं तो व्यापारी उनसे सस्ते दामों में खरीद कर मंडी में बेचते हैं और किसानों का लाभ व्यापारी ले जाते हैं।

सरकार अब किस आज़ादी की बात करना चाहती है? यह सच है कृषि उत्पादन बाजार समिति में कई कमियां है, जिसे दूर करने की जरूरत है लेकिन एक समांतर बाजार खड़ा करना इसका हल नहीं हो सकता। बिहार इसका उदाहरण है। बिहार में खेती बाजार समिति 2006 में ही भंग कर दी गई थी। अब लगभग 15 साल होने को आए हैं लेकिन किसानों की माली हालत नहीं सुधरी।

प्राथमिक खेती साख सहकारी समिति अर्थात पैक्स के माध्यम से किसानों की फसल खरीद होती है। अधिकांश किसान मिलेंगे जिन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं के बराबर मिला है, अधिक मिलने की तो बात ही नहीं है। यदि सरकार किसानों के हित में बात करना चाहती है तो इस कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी बाध्यकारी क्यों नहीं बनाना चाहती है?

अध्याय 3 में करार में विवाद की हालात में निपटारा का प्रावधान अनुच्छेद 13 से 15 तक में दिया गया है

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अध्याय 3 में करार में विवाद की हालत में निपटारा का प्रावधान अनुच्छेद 13 से 15 तक में दिया गया है जिसके अनुसार यदि करारनामा में समझौता समिति का उल्लेख है तो समिति दोनों पक्षों के बीच विवाद का निपटारा करेगी।

संतोषजनक निपटान नहीं होने की स्थिति में अनुमंडल अधिकारी या अपीलीय प्राधिकार को विवाद निपटारा का अधिकार है। लेकिन यहां संतोषजनक निपटान नहीं होने पर अनुच्छेद 18 एवं 19 में यह क़ानून केंद्र एवं राज्य सरकारों निबंधन प्राधिकार, अनुमंडल प्राधिकार, अपीलीय प्राधिकार का निर्णय के खिलाफ किसान कंपनी पर क़ानूनी कार्रवाई नहीं कर सकता है।

यह क़ानून सिविल कोर्ट को भी इस मामले में सुनने का अधिकार नहीं देता है। मेरी जानकारी में यह पहली बार हुआ है कि सरकार का कोई कानून के लागू होने पर विवाद की स्थिति में कोर्ट को इस विवाद को सुनने का हक नहीं होगा।

यही हालात खेती उत्पादन और वाणिज्य क़ानून का भी है जिसमें अनुच्छेद 15 में भी इस तरीके का प्रावधान है। जहां तक करारनामा का सवाल है सरकार द्वारा किसान को कोई क़ानूनी सहायता देने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में कंपनी अपने वकीलों के बल पर करार और अनुमंडल एवं अपीलीय प्राधिकार को आसानी से प्रभावित कर पाएगा और किसान के लिए हमेशा घाटे का सौदा रहेगा।

यह हिंदुस्तान के नागरिकों के मौलिक अधिकार के हनन के जैसा ही है। फिर भी हमारे देश के प्रधानमंत्री और कहते हैं कि यह क़ानून किसानों को सशक्त करेगा और संरक्षण देगा जबकि सभी प्रावधान कंपनी खेती के पक्ष में हैं। कंपनी अपने लाभ के लिए सुविधा अनुसार करार आसानी से कर पाएगा।

व्यापारी को भी एक राज्य से दूसरे राज्य किसान के उत्पादन को ले जाने की छूट दी गई है

तीन कृषि क़ानून

किसान उत्पादन व्यापार एवं वाणिज्य प्रोत्साहन एवं सहूलियत क़ानून 2020 में सिर्फ किसान ही नहीं व्यापारी को भी एक राज्य से दूसरे राज्य में किसान के उत्पादन को ले जाने की छूट दी गई है। हिंदुस्तान के अधिकांश किसान सीमांत और लघु आकार के जोत का है जो अपनी उपज बेचने दूसरे राज्य में नहीं जा सकेंगे। जाहिर है कि यह क़ानून व्यापारी को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

इन व्यापारियों के लिए राज्य में खेती उपज मंडी समिति के अधीन लगने वाले बाजार शुल्क से मुक्त रखा गया है। ऐसे में सरकारी मंडी में अनाज बेचने के बजाय मंडी से बाहर निजी मंडी में फसल बेचने को सरकार प्रोत्साहित कर रही है।

निजी मंडी की पहुंच किसानों के घर, फैक्ट्री, भंडार, शीतगृह भूमिगत भंडारण आदि तक होगी। यद्यपि सरकारी मंडी को बंद करने की बात नहीं कही गई है पर निजी मंडी को बाजार शुल्क कमीशन आदि नहीं लगने के कारण व्यापारी सरकारी मंडी में नहीं जाएंगे।

परिणाम अनुसार सरकारी मंडी बंद हो जाएगी। मंडी से जुड़े रोजगार पाने वाले लाखों लोग बेरोजगार होंगे। एक तरफा जहां इससे सरकारी खजाने पर बुरा असर पड़ेगा वहीं सरकारी मंडियों में आधारभूत संरचना के विकास के लिए धन का अभाव होगा।

पहले से कमजोर आधारभूत संरचना की कमी झेल रहा शेत्र और भी बदतर हालात में होगा। अतः संभव है कि कुछ वर्ष भले ही निजी खरीदार लाभप्रद दाम भी दे लेकिन अंत का कंपनी खेती करार का दंश झेल रहा पंजाब में किसान जान देने को मजबूर है।

अगर कंपनी खेती किसानों के हित में होता तो पंजाब का किसान आत्महत्या नहीं करता। कर्नाटक का फलता फूलता कमभेड किसान दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति को कैडबरी ने किस तरह निगल लिया यह किसी से छिपा नहीं है। 

कृषि क़ानून में जमाखोरी की छूट दी गई

तीन क़ानून

आवश्यक वस्तु क़ानून 1955 में संशोधन कर 2020 में केवल असाधारण परिस्थिति जैसे युद्ध, आकाल, असाधारण मृत्यु, वृद्धि और गंभीर प्राकृतिक आपदा की हालात को छोड़कर जमाखोरी की छूट दे दी गई है।

‘खेत की उपज का व्यापारी विभिन्न राज्यों से अनाज की खरीद बिक्री कर सकेंगे और किसान ज्यादातर अपने उत्पादन फसल की कटनी के समय में अवसादी कीमत पर बेचने को मजबूर होंगे। अतः लाभ किसानों के बजाय व्यापारी का होना है। साथ ही अनाज का बनावट अभाव आम बात होगा। यह कानून मजदूर किसानों को और भी संकट में डाल कर भुखमरी पैदा करेगा अतः किसानों को अपनी हक की लड़ाई लड़नी ही पड़ेगी। नोटबंदी के बाद देश की अर्थव्यवस्था लुढ़कने लगी थी।

वस्तु और सेवा कर से हालात और भी खराब होते चले गए। कोरोना महामारी के बीच अचानक बिना सोचे समझे और बिना किसी तैयारी के ताला बंदी से अर्थ व्यवस्था ठप हो गई है। पहली तिमाही का विकास दर 23.9 प्रतिशत नीचे गिर गया और फिर भी खेती का विकास दर 3.54 प्रतिशत रहा है। कॉर्पोरेट जगत की नजर खेती पर बहुत पहले से है।

कंपनी खेती को बढ़ावा देने के लिए कॉर्पोरेट जगत ने इस अवसर का उपयोग किया है। वर्तमान सरकार ने किसानों के हित की चिंता किए बगैर खेती को कंपनी के हवाले करने के लिए यह क़ानून बनाया है।

देश के विभिन्न राज्यों में तीन कृषि क़ानून का विरोध कर रहे हैं किसान

तीन कृषि क़ानून

देश के विभिन्न राज्यों में किसान संगठन इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं। पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, बिहार, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों में भी विरोध हो रहे हैं। रेल चक्का जाम धरना और प्रदर्शन का दौर चल रहा है।

ग्राम सभाओं को सशक्त बनाकर अपने आंदोलन का संवैधानिक रास्ता अपनाया है। पंजाब और कर्नाटक में ग्राम सभा से प्रस्ताव पारित कराकर महामहिम राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजा जा रहा है।

इसी तर्ज पर बिहार सहित अन्य राज्यों में ग्राम सभाओं में विद्वत किसानी क़ानून के खिलाफ प्रस्ताव पास करे। सरकार परस्त मीडिया बिहार में हो रहे किसान विरोध को समाचारों में जगह नहीं दे रही है।

ऐसे में किसान मीडिया विकसित करने की जरूरत है। साथ ही किसान उत्पादन की नाकाबंदी कर गांवों में अपने उत्पादन को बेचने तथा गरीबों के बीच वितरित कर किसान अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं। निर्णय किसानों को लेना है कि किसान अपने पास रखनी है या कंपनी के हवाले करनी है।

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DM Diwakar

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