क्या बालिका दिवस मनाने से हम शिक्षा के लैंगिक भेदभाव को ख़त्म कर पायेंगे?

देश के विकास में पुरुष एवं महिलाएं दोनों की आवश्यकता है समान 

बालक हो या बालिका शिक्षा किसी के भी लिए जीवन जीने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी देश में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में भी शिक्षा की अहम भूमिका होती है। वहीं किसी भी व्यक्ति को मार्गदर्शन कराने में भी शिक्षा का बड़ा योगदान होता है। 

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हम आपको बता दें कि महिलाएं हमारे देश भारत की आबादी का करीबन आधा हिस्सा है। देश के विकास में योगदान करने के लिए पुरुष एवं महिलाएं दोनों की समान आवश्यकता होती है। बेटी बचाओ बेटी पढाओ से लेकर मिड डे मील की योजना तक,सरकार ने विभिन्न तरीकों से लड़कियों की शिक्षा में सुधार लाने का लक्ष्य रखा है।मगर देखा जाए तो समाज में ऐसे कई कारक हैं जो महिलाओं की कम शिक्षा दर के लिए जिम्मेदार हैं।

ग़रीबी,माता-पिता की नकारात्मक सोच,और विद्यालयों में कम सुविधाएँ बनी बाधाऐं

किसी भी बच्चे को स्कूल भेजने की लागत बहुत अधिक होती है। जिसमें स्कूल पोशाक, स्टेशनरी, किताबें और वाहन की लागत शामिल होती है और ऐसे में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के लिए यह सुविधाएँ उपलब्ध कराना बेहद कठिन है। बता दें कि गरीब परिवारों की करीबन 30% लड़कियों ने तो कभी भी कक्षा के अंदर पैर ही नहीं रखा है।

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जो एक दिन के भोजन का खर्च नहीं उठा पाते, उनके लिए  शैक्षिक व्यय उठाना तो बहुत दूर की बात हैं। जिस कारण से  माता-पिता अपनी बेटियों को घर में रखने को मजबूर होते हैं। इतना ही नहीं देश के कई हिस्सों में प्राथमिक विद्यालय गांवों से बहुत दूर स्थित होते हैं। जिस वजह से विद्यालय तक पहुंचने के लिए करीबन कई जगहों में 4 से 5 घंटे का सफ़र करना पड़ता है। साथ ही मासिक धर्म स्वच्छता सुविधा की कमी के कारण भी हर साल लाखों लड़कियाँ स्कूल से बाहर निकाल दी जाती हैं। 

नकारात्मक सोच भी इसके पीछे बड़ा कारण है जिस कारण से कई लोग सोचते हैं कि लड़की को खाना बनाना, घर को साफ़ सुथरा रखना एवं घरेलू कार्यों को सीखना चाहिए कारण  लड़की के जीवन में इसकी जरूरत शिक्षा से काफ़ी अधिक है। जिस सोच ने समाज को पीछे की ओर धकेल दिया है। जिनमें 65% घरेलू काम या भीख मांगने में लगे हुए हैं।


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लड़कियों को अध्ययन करने से रोकने का प्रमुख कारण बाल विवाह 

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सबसे बड़ा और अहम कारक इस मामले में बाल विवाह है। हमारे भारतीय समाज में एक लड़की को कम उम्र में शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है और जिस कारण से उन्हें बहुत कम उम्र में ही स्कूल से निकाल लिया जाता है। इसलिए लड़कियों को अध्ययन करने से रोकने का एक प्रमुख कारण बाल मजदूरी भी है। 18 वर्ष की होने से पहले लगभग 4 में से 1 लड़की की शादी हो चुकी होती है।

लड़कियों को काम और कम उम्र में पैसा कमाने के लिए अपनी अध्ययन को रोकना पड़ता है। गरीबी के कारण कई माता-पिता ऐसे हैं जो अपनी लड़कियों को छोटी उम्र में काम करने का दबाव डालते हैं और उनकी पढ़ाई लिखाई बंद कर देते हैं।

ग़ौरतलब है कि यह स्थिति महामारी हिट से पहले ही देखी गई है लेकिन देखना है कि क्या अब नई शिक्षा नीति 2020 के  प्रावधान वास्तव में लड़कियों की ज़रूरतों को पूरा करते हैं और सभी उपयुक्त रूप से लागू होते है की नहीं। आईए इस इस बालिका दिवस पर बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाए।

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