गणतंत्र दिवस में राम मंदिर की झांकी निकालना धर्मनिरपेक्षता पर चोट करना नहीं है?

भारत के इतिहास में गणतंत्र दिवस का विशेष महत्व है क्योंकि इसी दिन हमारे संविधान की स्थापना हुई थी। वह संविधान जो लोगों को समानता, स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है तथा अपने बुनियादी ढांचे में धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप को रखता है। लेकिन इस बार का गणतंत्र दिवस की झांकी संविधान पर एक तरह से चोट थी क्योंकि इस बार गणतंत्र दिवस में एक विशेष धर्म से संबंधित रैली निकाली गई। गणतंत्र दिवस की परेड में राम मंदिर की झांकी निकालना यह प्रदर्शित करता है कि परेड का भगवाकरण किया गया।


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एक तरफ संविधान में यह दावा किया जाता है कि भारत हर धर्म, जाति, लिंग जन समुदाय का देश है तथा इसमें हर धर्म का प्रतिनिधित्व किया जाता है। लेकिन इस रैली ने संविधान के इस दावे पर कुठाराघात किया है।

भारत के इतिहास में राम मंदिर का मसला सबसे विवादास्पद मसला है। 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाई गई जिसके बाद से कई मौकों पर सांप्रदायिक दंगे भी हुए, देश का माहौल तनावपूर्ण हुआ। लेकिन यह सब देखते हुए भी इस मुद्दे को भुनाया गया और इसका राजनीतिकरण भी कई बार किया गया।


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जितनी बार राजनीति ने इस मसले को अपने में समाया है, उतनी बार ही धर्मनिरपेक्ष भारत पर चोट लगी है। मौजूदा सरकार राम मंदिर को अपने एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती आई है। इस मुद्दे को लेकर भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष तत्वों का भी भगवाकरण किया गया।

संसद में लाए गए विधयेक हो, राम मंदिर का भूमि पूजन हो, इन सब में एक विशेष धर्म के प्रतीकों का प्रयोग देखा जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर मंदिर की झांकी निकालना देश के अन्य धर्मों को हाशिए में धकेलने जैसा है। क्योंकि राजनीति में इन धर्मों का प्रतिनिधित्व नजर नहीं आता। मौजूदा सरकार द्वारा चलाई जा रही विभेदकारी नीतियां अन्य धर्मो के लोगों में भय और घृणा की भावना पैदा कर रही है जोकि देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के लिए खतरा है।


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इतना सब कुछ होने के बावजूद किसी भी प्रतिष्ठित मीडिया संस्था द्वारा इस मुद्दे को ना उठाना यह प्रदर्शित करता है कि देश अब धीरे-धीरे इस विभेद की राजनीति का हिस्सा बनता जा रहा है, जिसका काम सत्तापक्ष की चाटुकारिता करना रह गया है।

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