इससे पहले भी कई किसान आंदोलन हुए लेकिन किसान कभी देशद्रोही नहीं हुए

मोदी सरकार के कार्यकाल में कृषि आंदोलन गले की रस्सी बन चुका

फसलों के उत्पादन के साथ देश की आज़ादी और देश के निर्माण में भी किसान समाज एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हमारे देश की करीबन 70 प्रतिशत आबादी वर्तमान में कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई है एवं इनके बेहतरी की बात करके ही देश को मजबूत तैयार किया जा सकता है। मोदी सरकार के सात साल के कार्यकाल में ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई आंदोलन गले की रस्सी बन चुका है। इस दो तरफे की ज़िद वाले जंग में मुख्यत देश का किसान पिसता जा रहा है।

कृषि आंदोलन

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के खिलाफ भारत का अन्नदाता किसान एक बार फिर सड़कों पर उतरने को मजबूर है। प्रदर्शनकारी किसानों को इस बात का डर है कि नए क़ानूनों से मंडिया खत्म हो जाएंगी एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर होने वाली खरीदी भी रुक जाएगी। दूसरी ओर सरकार उल्टा तर्क दिए जा रही है कि एमएसपी पर खरीदी बंद नहीं होगी।

व्यापक जन जागरण में किसानों की भूमिका नज़रअंदाज़ करना मुश्किल

हम आपको बता दें कि यह देश का पहला किसान आंदोलन नहीं है और न ही आख़िरी क्योंकी देश के इतिहास में किसान आंदोलनों का एक बड़ा और समृद्ध इतिहास रहा है। भारतीय इतिहास के झरोखे में अगर हम नज़र डालेंगे तो जान पाएंगे कि अपने ही देश में आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद किसानों के कई ऐसे आंदोलन हुए हैं। जिसने यहां के हुक्मरानों की कुर्सियां तक हिला के रख दी हैं। देश में इससे पहले भी ऐसे कई किसान आन्दोलन हुए हैं। जिस आंदोलन ने उस दौर की सरकार के दंभ को भी चकनाचूर किया था।

कृषि आंदोलन

भारतीय समाज और भारत के स्वाधीनता संग्राम में आदि-वासियों, जनजातियों और किसानों के आंदोलनों का अहम योगदान रहा है एवं व्यापक जन जागरण में उनकी भूमिका को बिल्कुल नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। साल 2017 में मंदसौर मध्यप्रदेश में हुए किसान आन्दोलन की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा है जहाँ पुलिस की गोली लगने से सात किसानों की मौत हो गयी थी।

वहीं कर्ज-माफ़ी और फ़सलों के डेढ़ गुना अधिक समर्थन मूल्य की मांग को लेकर तमिलनाडु के किसानों ने साल 2017 एवं साल 2018 में देश की राजधानी दिल्ली में अर्धनग्न होकर, अपने हाथों में मानव की खोपड़ियाँ एवं हड्डियाँ लेकर प्रदर्शन किए थे। फ़िर महाराष्ट्र के नासिक से मुंबई तक किसानों का पैदल मार्च तो भारत के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है।

बात अगर वर्तमान आन्दोलन की करें तो किसान आन्दोलन की चिंगारी से पंजाब हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, ओड़िसा, बंगाल, आंध्रप्रदेश, बिहार समेत लगभग समस्त भारतीय राज्य के किसान सड़कों पर उतर कर इस आन्दोलन का हिस्सा बन चुके हैं।

वर्तमान में सरकार कृषि क़ानूनों को ख़त्म न करने को लेकर ज़िद पर अड़ चुकी है इससे सरकार,अन्नदाताओं के आशाओं पर कुठाराघात कर रही है इसलिए अब देश के माटीपुत्र अपने अधिकारों की मांग के लिए सरकारी जुल्मों और साजिशों के आगे नतमस्तक होने को तैयार नहीं हैं।


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समय-समय पर किसानों ने दिखाई अपने कृषि आंदोलन की ताक़त

आजादी के पहले भी देश के किसानों ने अंग्रेज़ी हुक़ूमत के समय-समय पर अपने आन्दोलन की ताकत को दिखाया है। अंग्रेजों और देशी रियासतों के सबसे बड़े आंदोलन उनके शोषण से ही उपजे थे।देखा जाए तो जितने भी ‘किसान आंदोलन’ हुए हैं उनमें अधिकतर आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ हुए थे। जिनमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण हैं-

कूका विद्रोह: 

1872 में कृषि संबंधी समस्याओं और अंग्रेजों द्वारा गायों की हत्या करने के विरोध में यह सशस्त्र विद्रोह किया गया था। जिस आन्दोलन के दौरान 66 नामधारी सिख शहीद हुए थे।

दक्कन विद्रोह: 

इस विद्रोह में किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया था और यह आंदोलन एक-दो स्थानों तक नहीं बल्कि पूरे देश के विभिन्न भागों में फैल गई थी। 

एका आन्दोलन:

1919 में उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर यह आंदोलन चलाया गया था।

मोपला विद्रोह: 

केरल के मालावार क्षेत्र में मोपला किसानों के द्वारा 1920 में यह विद्रोह किया गया था। जिसे महात्मा गांधी, शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेताओं का सहयोग प्राप्त हुआ था। 

रामोसी किसानों का विद्रोह: 

महाराष्ट्र में जमींदारों के अत्याचार के विरुद्ध  वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रामोसी किसानों ने इस विद्रोह का बिगुल फूंका था। 

ताना भगत आन्दोलन: 

1914 में लगान की ऊँची दर और चौकीदारी कर के विरुद्ध ताना भगत आंदोलन की शुरुआत 1914 में बिहार में हुई थी। इस आंदोलन के प्रवर्तक ‘जतरा भगत’ थे। 

तेलंगाना आन्दोलन: 

आंध्रप्रदेश में यह आन्दोलन साहूकारों व जमींदारों के शोषण के ख़िलाफ़ 1946 में शुरू किया गया था।

बिजोलिया किसान आन्दोलन:

यह ऐतिहासिक बिजोलिया किसान आंदोलन 1847 से प्रारंभ होकर लगभग आधी शताब्दी तक चलता रहा।जिसमें   किसानों ने निरंकुश नौकरशाही एवं स्वेच्छाचारी सामंतों का संगठित होकर मुकाबला किया था।

नील विद्रोह (चंपारण सत्याग्रह): 

नील विद्रोह की शुरुआत बंगाल के किसानों के द्वारा की गई थी। दूसरी तरफ बिहार के चंपारण में किसानों से अँग्रेज़ बगान मालिकों ने एक अनुबंध करवा लिया था, जिसके अंतर्गत किसानों को अपनी ज़मीन के कुछ भागों पर नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ‘तिनकठिया पद्धति’ कहते थे।जब 1917 में गांधी जी इन विषम परिस्थितियों को जान पाए तो उन्होंने बिहार जाने का फैसला किया। गांधी जी मजरूल हक, नरहरि पारीख, राजेन्द्र प्रसाद एवं जेबी कृपलानी के साथ बिहार गए और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपना पहला सत्याग्रह प्रदर्शन किया।

खेड़ा सत्याग्रह: 

साल 1918 में खेड़ा किसानों की समस्याओं को लेकर यह आन्दोलन शुरू किया था। खेड़ा के कुनबी-पाटीदार किसानों ने सरकार से लगान में रहत की मांग की मगर उन्हें कोई रियायत नहीं मिली। जिसके बाद खेड़ा आन्दोलन की शुरुआत की गई थी।

बारदोली सत्याग्रह:  

सूरत (गुजरात) के बारदोली तालुका में किसानों द्वारा 1928 में अंग्रेजों को लगान नहीं देने के लिए यह आन्दोलन चलाया गया था।आन्दोलन में कुनबी-पाटीदार जातियों के भू स्वामियों के साथ-साथ ही सभी जनजातियों के लोगों ने भी हिस्सा लिया था।

तेभागा आन्दोलन:

किसान आंदोलनों में 1946 का बंगाल का तेभागा आंदोलन सर्वाधिक सशक्त आंदोलन था,बंगाल का तेभागा आन्दोलन फ़सल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीड़ित बटाईदार किसानों को दिलाने के लिए किया गया था। इस आन्दोलन में करीबन 50 लाख किसानों नें भाग लिया था एवं यह करीब 15 जिलों में फैला हुआ था।

तीन किसान विरोधी कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ संघर्षरत किसानों का हौसला बुलंद

कृषि आंदोलन

इन प्रमुख किसान आन्दोलन के अलावा भी भारत में कई अन्य किसान आन्दोलन हुए थे। इसलिए वर्तमान में चल रहा किसान आंदोलन कोई नई बात नहीं है, इससे पहले भी अन्नदाता कई बार सत्ता का दंभ चूर कर चुके हैं। वर्तमान में चल रहे किसान आन्दोलन की शुरुआती दिनों में आन्दोलन को सरकार द्वारा काफ़ी बदनाम करने की चेष्टाएं की गयी हैं मगर आज केन्द्रीय गृह मंत्री से लेकर कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी ये मानने को तैयार हैं कि यह विशुद्ध रूप से किसान आन्दोलन है।

तीन किसान विरोधी कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ संघर्षरत किसानों का हौसला पूरी तरह से बुलंद है। केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि क़ानूनों के साथ वर्षों से अंसतोष में जी रहे किसानों के सब्र का बाँध इस तरह टूटा है कि वे संघर्ष के लिए मजबूर हो गए हैं।

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