दिल्ली दंगे के एक साल बाद भी, पुलिस पर सवाल उठाना जायज़ 

दिल्ली दंगे में 53 लोगों की जानें गईं थी और ढेर सारे घर, दुकान जला दिए गए

रिपोट्स के मुताबिक़ दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में एक वर्ष पहले हुए दंगों में भारी जान-माल का नुकसान हुआ था। उस हिंसा में 53 लोगों की जानें गईं थी और ढेर सारे घर, दुकान जला दिए गए थे।आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ मरने वालों में 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे। दिल्ली दंगे से जुड़ी पुलिस ने लगभग 752 एफ़आईआर दर्ज की थी और बहुत बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया था। जिनमें एनआरसी-सीएए का विरोध करने वाले छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हैं।हालाँकि मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में दिल्ली पुलिस के कामकाज की तारीफ़ करते हुए कहा था कि पुलिस ने हिंसा और आगज़नी पर मुस्तैदी से काबू पाया है। 

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जानकारी के मुताबिक एक साल पहले 25 फरवरी को फ़ारूकिया मस्ज़िद में दंगाइयों की एक भीड़ दाखिल हुई थी। जिन्होंने मस्ज़िद में आग लगा दी थी, मस्ज़िद के ठीक पास में सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ स्थानीय महिलाओं का प्रदर्शन चल रहा था,जिनके तिरपाल से बनाए गए तंबू में भी आग लगा दिया गया था। इतना ही नहीं मस्ज़िद में कुल जमा सात-आठ लोगों को बेरहमी से पीटा गया था।मगर सवाल यह है कि इस हिंसा के एक साल बाद चश्मदीद गवाहों और पीड़ितों की शिकायत पर भी पुलिस ने अब तक एफ़आईआर क्यों नहीं दर्ज की है।

खुर्शीद और अख़्तर दोनों दिल्ली हिंसा के चश्मदीद गवाह और शिकार 

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इस घटना के चश्मदीद गवाह और पीड़ितों में 44 साल के फ़िरोज़ अख्तर हैं। फ़िरोज़ ने अप्रैल 2020 में शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत पर 21 जुलाई  2020 की तारीख़ का दयालपुर थाने का ठप्पा है एवं शिकायत पर गृह मंत्रालय में भी रिसिव किए जाने की मुहर है।

चश्मदीद गवाह फ़िरोज़ ने अपनी शिकायत में लिखा है कि 25 फरवरी, 2020 शाम 6.30 बजे फ़िरोज़ मग़रिब की नमाज़ पढ़ने फ़ारूकिया मस्जिद पर रुके थे तभी एसएचओ दयालपुर के साथ कुछ लोग वर्दी पहने मस्जिद में दंगाइयों के साथ घुसे,उन दंगाइयों में बृजपुरी निवासी अरुण बसोया, पास में दुकान चलाने वाले चावला जी और राहुल वर्मा भी थे। जिनके हाथों में डंडे, भाले, पेट्रोल बम, तलवारें थीं। देखते ही देखते दंगाइयों ने पास में चल रहे एंटी-सीएए प्रदर्शनों में शामिल महिलाओं पर हमला बोल दिया। अरूण और अन्य दंगाइयों ने मस्जिद के मौलाना के पैरों को ईंटों पर रखकर बेरहमी से डंडों से मारा एवं मोअज़्जिन (मस्जिद में अज़ान लगाने वाला शख्स) के मुंह पर डंडों से इतना मारा गया कि उसके जबड़े तक टूट गए।

दंगाइयों ने फ़िरोज़ को लोहे की रॉड से मारा, जिस कारण से उनके सिर और दाहिनी हाथ पर गहरी चोटें आई। उसे मरा हुआ समझ जल रहे एंटी-सीएए प्रो-टेस्ट की तिरपाल में फेंक दिया मगर वे किसी तरह अपनी जान बचा कर वहां से निकल गए। दंगों में हिंसा का शिकार होने के कारण उनके सिर पर 90 टांके लगे।फ़िरोज़ पहले से ही विकलांग थे, अब तो उनकी दाहिने हाथ की उंगलियों ने भी काम करना बंद कर दिया है। फ़िरोज़ का आरोप है कि शिकायत दर्ज करने के बाद उनके घर पुलिस के कुछ लोगों ने आकर शिकायत वापस लेने का दवाब बनाया था। साथ ही रास्ते में फ़िरोज़ और उनके बेटे पर हमले भी हुए, जिससे डरकर फ़िरोज़ ने मुस्ताफ़ाबाद में किराए का घर छोड़, तुर्कमान गेट में रहना शुरू किया।

दिल्ली हिंसा में ख़ुर्शीद के चेहरे की कई हड्डियाँ और एक आँख हुई है खराब 

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दूसरे चश्मदीद गवाह पुराने मुस्तफ़ाबाद के रहने वाले ख़ुर्शीद सैफ़ी हैं। दंगाइयों द्वारा 25 फरवरी, 2020 को फ़ारूकिया मस्ज़िद में हुई हिंसा में खुर्शीद के चेहरे के दाहिने हिस्से की कई हड्डियां और एक आंख खराब हुई है,वे एक आर्किटेक्ट थे मगर अब एक ही आंख बची है तो वह अपना काम छोड़ चुके हैं। उन्होंने बताया कि मुस्तफ़ाबाद के ईदगाह में लगे रिलिफ कैम्प में एक शिकायत डेस्क लगाई गई थी।वहां 15 मार्च को खुर्शीद ने डेस्क पर शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत पर पुलिस स्टेशन दयालपुर, प्रधानमंत्री मुख्यालय, गृह मंत्रालय का रिसिविंग स्टैंप है।

ख़ुर्शीद ने अपनी शिकायत में लिखा है कि 25 फ़रवरी क़रीब शाम 6.30 बजे राहुल वर्मा, अरूण बिसोया और मेन रोड वाले चावला जी एवं उनके साथियों ने पुलिस के साथ मिलकर बृजपुरी पुलिया पर चल रहे एंटी-सीएए प्रोटेस्ट पर बैठी महिलाओं पर हमला किया था। दंगाइयों के हाथों में डंडे, तलवार, भाले, त्रिशूल और पेट्रोल बम थे।ख़ुर्शीद मस्जिद की गेट पर ही खड़ा थे, वहीं पुलिस की नीली वर्दी-सी पहन कर कुछ लोग इन दंगाइयों के साथ मस्जिद में दाखिल हुए थे। इन लोगों ने नमाजियों को मारना शुरू कर दिया और राहुल वर्मा ने तो कई लोगों पर गोलियां भी चलाई।


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एफ़आईआर संख्या 64/2020 में एक वर्ष बाद भी कोई चार्जशीट नहीं की गई फ़ाइल 

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फ़ारूक़िया मस्जिद में हुई आगज़नी और हिंसा से संबंधित पुलिस ने 26 फ़रवरी 2020 को दयालपुर थाने में एक एफ़आईआर-64 दर्ज की।मगर उस एफ़आईआर को एक पीसीआर कॉल के माध्यम से सब-इंस्पेक्टर राम प्रकाश से मिली जानकारी के आधार पर दर्ज किया गया है।

ग़ौरतलब है कि पुलिस की उस एफ़आईआर में किसी का भी नाम नहीं लिखा है और साथ ही एफ़आईआर के मुताबिक़ जो लोग एंटी सीएए प्रदर्शन पर बैठे थे, जिसमें अधिकतर मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति थे। उन लोगों ने ही मस्जिद में आग लगा दी थी। मामले में पुलिस ने चश्मदीदों की शिकायतों पर एफ़आईआर दर्ज नहीं की है।

ख़ुर्शीद और अख़्तर न सिर्फ़ इस हिंसा के चश्मदीद गवाह हैं बल्कि खुद इस हिंसा के शिकार भी हैं,बावजूद इसके उनकी शिकायतों पर पुलिस ने अब तक कोई ध्यान नहीं दिया है, न ही उनकी शिकायतों को एफ़आईआर में जोड़ा गया,न ही उनके बयान अब तक लिए गए हैं।

बता दें कि किसी भी मामले में 90 दिनों के अंदर चार्जशीट दायर कर दी जाती है और यदि मामला यूएपीए की धाराओं का हो, तो चार्जशीट दायर करने की अवधि 180 दिन( 6 महीने) तक हो सकती है। मगर यहां तो एफ़आईआर संख्या 64/2020 में एक वर्ष बाद भी कोई चार्जशीट नहीं फ़ाइल की गई है। अप्रैल, 2021 में इस मामले में दिल्ली पुलिस एक्शन टेकेन रिपोर्ट (एटीआर) दायर करेगी शायद इस रिपोर्ट के आने के बाद ही ये तस्वीर थोड़ी और साफ़ नज़र आएगी।

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