लॉकडाउन के दौरान दो महिलाओं ने किया मोबाइल पैड बैंक की शुरुआत, पीरियड्स को बनाया सम्मान का प्रतीक

महिलाओं को पीरियड्स कुदरती तौर पर मिला हैं जो उन्हें ‘महिला’ का दर्जा देता है। लेकिन हमारे समाज में पीरियड्स को लेकर कई रूढ़िवादिता प्रचलित है इसीलिए इस मुद्दे पर खुलकर बातचीत करना भी वर्जित है। ‘पीरियड्स’ को लेकर हमारा असहज होना, हमारे बीमारू समाजिक ढांचे को प्रदर्शित करता है। समाज में पीरियड्स को लेकर इस तरह की धारणाएं प्रचलित हैं जो इसे शर्म का प्रतीक बनाने का काम करती हैं।

(बिहार की 84% महिलायें आज भी पीरियड्स के दौरान कपड़ा इस्तेमाल करती हैं.)

पीरियड के दौरान महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है तथा उन्हें नए कपड़े पहनने,  रसोई घर में जाने, मंदिर जाने और अचार छूने जैसी आदि पर पाबंदियां लगाई जाती हैं। यही वजह है कि महिलाएं इस मुद्दे पर खुलकर बात नहीं करती और कई प्रकार की लापरवाही खुद के साथ कर जाती हैं।

इसी कड़ी में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के द्वारा साल 2015-16 में सर्वे किया गया जिसमें मिले आंकड़ों के मुताबिक बिहार की करीब 82 फ़ीसदी महिलाएं पीरियड के दौरान कपड़ों का उपयोग करती हैं। कपड़े के इस्तेमाल से  भारत में बड़ी मात्रा में महिलाएं दिन प्रतिदिन सर्वाइकल कैंसर की शिकार बनती जा रही हैं।

(आज के समय में भी पीरियड्स को एक ‘शर्म’ की बात समझी जाती है.)

लेकिन इन महिलाओं के ऐसा करने के पीछे आर्थिक कारण तथा शिक्षा का अभाव है। लेकिन बिहार की 2 महिलाओं ने इन मिथकों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया तथा महिलाओं के बीच जागरूकता की मुहिम चलाई है। बिहार की पल्लवी सिन्हा और अमृता सिंह ने महिलाओं के बीच पीरियड्स को लेकर जागरूकता फैलाई। इसके साथ ही उनके आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने 20 जिलों में मोबाइल पैड बैंक की शुरुआत की है।


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महिलाओं को हेल्थ केयर के साथ दी जाती है फ्री काउंसलिंग

साल 2017 में अमृता सिंह और पल्लवी सिन्हा ने इसकी स्थापना की। बिहार की इन महिलाओं के प्रयासों के फलस्वरूप आज बिहार के बेगूसराय, नवादा, पूर्णिया, छपरा, सीवान, हाजीपुर, बक्सर, जमुई समेत करीब 20 जिलों में मोबाइल पैड बैंक संचालित किए जा रहे हैं।

मोबाइल पैड बैंक के संचालन में एक सामाजिक संगठन ‘नव अस्तित्व फाउंडेशन’ शामिल है। इस संस्था के प्रमुख है पल्लवी सिन्हा जो कि पेशे से डॉक्टर हैं, वहीं अमृता सिंह इसकी फाउंडर हैं जो कि एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मोबाइल पैड बैंक के लिए हर महीने इसमें महिलाओं का अकाउंट खोला जाता है और उन्हें सेनेटरी नैपकिन का पासबुक दिया जाता है। इस पासबुक के जरिए ही उन्हें पैड मिलते हैं।

लेकिन पैड देने के साथ ही महिलाओं को इस बारे में भी जागरूक करना ज़रूरी होता है कि पैड का इस्तेमाल कैसे करना है और अपने स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखना है।

इसके लिए भी इन्होंने ‘शी केयर कार्ड’ की शुरुआत की है। दरअसल इस कार्ड की मदद से महिलाओं को फ्री काउंसलिंग प्रदान की जाती है। इस काउंसलिंग में उन्हें महिलाओं को होने वाले विभिन्न प्रकार की बीमारियों के बारे में जानकारी दी जाती है जिससे महिलाएं भी अपने उन मुद्दों पर बात कर सकें जिनके बारे में वे खुलकर बात नहीं करती। लेकिन सिर्फ़ इसमें चर्चा ही नहीं होती बल्कि महिलाओं का फ़्री हेल्थ चेकअप भी करवाया जाता है। जिसमें उनका थायराइड चेक करना नैनोग्राफ़ी आदि की सुविधा मुहैया करवाई जाती है।

लॉकडाउन के दौरान मोबाइल पैड बैंक की स्थापना की गई थी

दरअसल इन मोबाइल पैड बैंक की स्थापना लॉकडाउन के दौरान की गई थी। इस संबंध में अमृता सिंह और पल्लवी सिन्हा बताती हैं कि लॉकडाउन के दौरान महिलाओं का घर से बाहर निकालना मुश्किल था। इसके अलावा महिलाओं को कई प्रकार की परेशानी तथा झिझक होती थी जिस वजह से उन्होंने घर-घर जाकर पैड का वितरण करने का फ़ैसला किया।

कई बार तो लोग ऑर्डर देकर इन्हें बुलाते हैं और महिलाएं अपनी ज़रूरत के हिसाब से पैड का चयन करती हैं। इनके द्वारा 5 रुपये में दो पैड दिए जाते हैं इसकी तुलना यदि बाज़ार के पैड से की जाए तो उनके दाम कहीं अधिक होते हैं।

ऐसे में यह काफ़ी सस्ता और किफ़ायती भी हैं। हालांकि मोबाइल पैड बैंक के जरिए 2 सालों तक फ़्री में पैड्स वितरित किए गए। महिलाएं इसे गंभीरता से लें इसीलिए अब इसमें कुछ पैसे भी लिए जाते हैं। इसके साथ ही यह पैड खरीदने वाली महिलाओं को दो री-यूजेबल पैड भी फ्री में प्रदान करती है।

मोबाइल पैड बैंक के जरिए महिलाओं को मिला रोजगार

इस मोबाइल पैड बैंक की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसे महिलाओं द्वारा संचालित किया जा रहा है। वही महिलाएं ऑटो चलाकर मोबाइल पैड बैंक में घर-घर जाकर इन्हें वितरित करती हैं जिस वजह से महिलाओं को रोज़गार भी मिलता है। वहीं अन्य महिलाएं इनसे पैड खरीदने में सहज भी महसूस करती हैं।

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