Bihar COVID crisis: बदहवास सांसें, बिलखते परिजन और नाकाम सरकार की दास्तां

सरकार कोरोना के नाम पर सबको मार रही है. ना ही ऑक्सीजन है और ना ही डॉक्टर रहता है. मेरे सामने मेरा बच्चा मर गया. हम जी कर भी क्या ही करेंगे. एक ही बच्चा था मेरा किसी तरह उसको अच्छे से पढ़ायें, एयरटेल में ब्रांच मैनेजर था मेरा बेटा. सरकार मुआ (मार) दी है मेरे बेटा को.

छपरा (सारण) के 25 किलोमीटर दूर बस्ती जलाल पंचायत में सनी पांडे की शादी 28 मई को हुई. 29 मई को उनकी तबियत थोड़ी ख़राब लगी तो उन्होंने डॉक्टर से फ़ोन पर सलाह ली. लेकिन लगातार तबियत बिगड़ने के कारण उनके परिजन बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच (PMCH), पटना लेकर आते हैं और उन्हें यहीं भर्ती कर लिया जाता है. जांच में पता चलता है कि उन्हें कोरोना है.

(सनी पांडे की पत्नी)

इलाज के दौरान 9 मई को उनकी मौत हो जाती है. परिजन का आरोप है कि पीएमसीएच में ना ही ऑक्सीजन की सही से व्यवस्था की गयी है और ना ही डॉक्टर्स सही समय पर आते हैं. जब डेड बॉडी सौंपने के समय परिजनों ने मौत का कारण ‘सरकारी बदइन्तेज़मी’ लिखना चाहा तो मौजूद डॉक्टर ने परिजन के हाथ से कागज़ ही छीन लिया.

(सनी पांडे के परिजनों से कागज़ छीनते पीएमसीएच के डॉक्टर )

ये एक मामला सिर्फ़ सनी पांडे का ही नहीं है. एनएमसीएच में जब डेमोक्रेटिक चरखा की टीम पहुंची हुई थी तो उस समय सोनपुर से एक कोरोना मरीज़ को रेफ़र करके एनएमसीएच भेजा गया था. एम्बुलेंस में मरीज़ पड़े हुए थे और लगातार उनका ऑक्सीजन गिरता ही जा रहा था. लेकिन एनएमसीएच में उस समय कोई भी डॉक्टर मौजूद नहीं था. एम्बुलेंस में मरीज़ दोपहर 1:30 PM बजे से लेकर 2:30 PM बजे तक पड़े रहे. उनके परिजन परेशान होकर अलग-अलग जगह जाते रहे कभी उन्हें पर्ची कटाने के लिए कहीं भेजा जाता तो कभी कहा जाता कि इंतज़ार कीजिये डॉक्टर आयेंगे तो देखेंगे. जब तक डॉक्टर आते, उनका ऑक्सीजन और कम होता चला गया और वहीं एम्बुलेंस में उनकी मौत हो गयी.

(डॉक्टर नहीं रहने के कारण एम्बुलेंस में पड़े मरीज़)

बिहार में 1 अप्रैल को 488 कोरोना संक्रमित मरीज़ मिले थे और अब हर दिन औसतन 15,000 (पंद्रह हज़ार) मरीज़ मिल रहे हैं. यानी कोरोना के रिपोर्ट किये गए नए मामले करीब 1586% बढ़ गए हैं. बिहार में अभी तक 6.02 लाख कोरोना के केस मिले हैं जिनमें से 3,357 मरीज़ों की मौत हो चुकी है. अभी बिहार में पॉजिटिविटी रेट 10.3% है और रिकवरी रेट 64% है.  बिहार में ऑक्सीजन की भी काफ़ी ज़्यादा कमी रही है. बिहार में ऑक्सीजन सिलिंडर में रिफिल के लिए सिर्फ़ 11 ऑक्सीजन प्लांट हैं जो एक दिन में सिर्फ़ 9950 लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन सिलिंडर की सप्लाई कर सकते थे. 22 अप्रैल को बिहार में 157.67 मेट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत सिर्फ़ ऑक्सीजन बेड्स में थी.

इसके अलावा ICU में 12.42 मेट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत थी. उसके बाद से हर दिन ऑक्सीजन की खपत बढ़ते ही जा रही है. केंद्र के तरफ़ से बिहार को 194 मेट्रिक टन ऑक्सीजन का कोटा दिया गया था लेकिन 22 अप्रैल को केंद्र के तरफ़ से सिर्फ़ 72 टन ऑक्सीजन ही मुहैय्या करवाया गया. उसके बाद से ये आंकड़ा घट कर सिर्फ़ 60 टन ऑक्सीजन पर ही आ गया है.  एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने सरकार से ऑक्सीजन की किल्लत पर जवाब मांगा था. जस्टिस चक्रधारी सरन सिंह ने टिप्पणी की थी

There is requirement of continuous supply of oxygen for treatment of COVID patients and failure to procure the amount allocated by the Government of India is a serious lapse having perilous consequences of grave nature hugely affecting the healthcare system to meet the challenge.

(हिंदी अनुवाद- कोविड रोगियों के उपचार के लिए ऑक्सीजन की निरंतर आपूर्ति की आवश्यकता है और भारत सरकार द्वारा आवंटित राशि से ख़रीद में हुई विफलता एक गंभीर चूक है. इससे स्वास्थ्य प्रणाली पर काफ़ी ज़्यादा असर डाल रही है.)

Patna High Court
(पटना हाईकोर्ट, फ़ाइल इमेज)

इस सुनवाई में बिहार सरकार की तरफ़ से ये जानकारी दी गयी कि 9 सरकारी अस्पतालों में ख़ुद का ऑक्सीजन प्लांट है जिससे ऑक्सीजन की आपूर्ति में कोई कमी नहीं होगी. सरकार द्वारा दी गयी लिस्ट में ये जानकारी दी गयी कि एनएमसीएच (NMCH) में 300 LPM (लीटर प्रति मिनट) के दर से ऑक्सीजन की आपूर्ति की जा रही है. और साथ ही पूरे राज्य में 2620 LPM के दर से ऑक्सीजन उत्पन्न की जा रही है.

(एनएमसीएच का ऑक्सीजन प्लांट)

इस दावे को लेकर हमलोगों ने NMCH में जाकर देखा तो पता चला कि वहां पर ऑक्सीजन अभी भी उषा एयर प्रोडक्ट (पटना) से लायी जा रही है. जब पूछताछ की गयी तो जानकारी ये दी गयी कि NMCH में हर दिन 900-1200 सिलिंडर की ज़रूरत रहती है लेकिन NMCH में मौजूद ऑक्सीजन प्लांट की क्षमता 24 घंटे में सिर्फ़ 50-60 सिलिंडर की ही है. इसीलिए बाकी का सिलिंडर बाहर से ही मंगवाया जाता है.

(उषा एयर से मंगाया गया ऑक्सीजन सिलिंडर)

ऑक्सीजन प्रोडक्शन पालिसी 2021 के तहत ऑक्सीजन प्लांट शुरू करने के लिए राज्य सरकार 30% कैपिटल सब्सिडी मुहैय्या करवाएगी. दलित, आदिवासी, महिला, अति-पिछड़ा समुदाय, दिव्यांग, युद्ध में शहीद फौजियों की पत्नी, एसिड अटैक सर्वायिवर और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को ऑक्सीजन प्लांट के लिए राज्य सरकार द्वारा 15.75% कैपिटल इंसेंटिव (प्रोत्साहन पूंजी) भी दिए जाने का नियम बनाया गया है. इसपर बात करते हुए ए.एन. सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व निदेशक और विश्लेषक डी.एम.दिवाकर का कहना है कि

ये सरकार के द्वारा काफ़ी देर से शुरू किया गया है जो इस बात को बताता है कि सरकार आम जनता के प्रति कितनी असंवेदनशील है. ये ऑक्सीजन प्रोडक्शन पालिसी के तहत प्लांट का प्रपोजल सितम्बर के महीने में देना है. बीच में इतने दिन हैं उसमें क्या होगा? ऑक्सीजन की आपूर्ति कहां से होगी? सरकार के पास इसको लेकर कोई प्लान नहीं है.

(सोशल मीडिया पर मदद मांगते और मदद मुहैय्या करवाते स्टूडेंट्स)

22 अप्रैल से बिहार में अधिक ऑक्सीजन की किल्लत शुरू हुई तो सोशल मीडिया पर कई लोगों ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया. पटना यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने मिलकर फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर एक सेंट्रलाइज्ड ग्रुप बनाया जहां से लोग मदद मांग भी रहे हैं और मदद दे भी रहे हैं. एहतेशाम इब्राहीम पटना यूनिवर्सिटी के छात्र हैं और साथ ही जब बिहार में ऑक्सीजन की किल्लत हुई तो उन्होंने पहल कदमी की. एहतेशाम ने बताया कि

यूनिवर्सिटी से जुड़े कई लोग कोरोना पॉजिटिव हो गए थे और मदद के लिए हम लोग के पास कई फ़ोन आने लगे थे. पिछले साल भी हम लोगों ने कोरोना पॉजिटिव जो घर पर अकेले थे उनके लिए खाने और दवाइयों का इंतज़ाम किया था. उस दौरान हमारे कुछ साथियों ने मिलकर ऑक्सीजन सिलिंडर भी खरीदा था. जब ऑक्सीजन की किल्लत हुई तब हमलोगों ने उस सिलिंडर में रिफिल करवा कर लोगों में बांटना शुरू कर दिया. लेकिन एक समय के बाद हमारे पास ऑक्सीजन की कमी हो गयी और मरीज़ों की संख्या बढ़ने लगी. तब हमारे साथियों ने मिलकर सीधा फैक्ट्री में जाकर ऑक्सीजन लेकर लोगों में बांटने लगे.


और पढ़ें- क्या बिहार के PHCs की चरमराती व्यवस्था में कोरोना से लड़ने की ताकत बची हुई है?


सरकार की नाकामयाबी सिर्फ़ ऑक्सीजन के मामले में ही नहीं बल्कि इलाज में भी देखने को मिल रही है. पीएमसीएच बिहार का सबसे बड़ा अस्पताल है. इसे वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए बिहार सरकार ने इसपर 5540 करोड़ रूपए ख़र्च कर रही है जो पूरे राज्य के स्वास्थ्य बजट का 42% हिस्सा है. इसी पीएमसीएच में अनिरुद्ध कुमार के चाचा कोरोना वार्ड में भर्ती हैं. अनिरुद्ध ने पीएमसीएच की बदइन्तेज़मी के बारे में बताया कि

चाचा जी को नेब्युलायिज़र (भाप) देना था उसके लिए उनका ऑक्सीजन मास्क उतारा गया. उसके बाद ऑक्सीजन मास्क उतार कर वार्ड बॉय और सिस्टर चली गयी और अगले एक घंटे तक कोई भी वहां नहीं आया. जब चाचा जी का ऑक्सीजन लेवल घटने लग गया और वो हम लोगों को फ़ोन किए तब हमलोग प्रशासन से बात किए और चाचा जी को ऑक्सीजन लगाया गया. अगर उस दिन चाचा जी फ़ोन नहीं करते तो आज शायद उनकी मौत हो चुकी होती.

(अपने चाचा के बारे में बताते अनिरुद्ध)

बिहार की राजधानी पटना में हर दिन औसतन 2 हज़ार मामले मिल रहे हैं. केंद्र सरकार ने पूरे देश में 15 जिलों की एक लिस्ट जारी की है जो कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित हैं उसमें एक पटना भी है. इसी बीच बिहार सरकार ने अपने जांच की गति में भी काफ़ी कमी कर दी है. 27 अप्रैल को पटना हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बिहार सरकार ने जानकारी दी कि पूरे बिहार में 19 RT-PCR जांच केंद्र सक्रिय हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 4 मई तक 19 जांच केंद्र होने के बावजूद बिहार में 1 लाख से कम जांच की जा रही है. ताज्जुब की बात ये है कि बिहार में पिछले साल 12 RT-PCR जांच केंद्र सक्रिय थे तब 1 लाख से अधिक जांच की जा रही थी. स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने 16 अप्रैल को सर्वदलीय बैठक में ये जानकारी दी थी कि बिहार में 1 लाख से अधिक जांच हर दिन हो रहे हैं.  RT-PCR जांच के साथ एक सबसे बड़ी समस्या आ रही है कि इसकी रिपोर्ट काफ़ी देर से दी जा रही है. सचिवालय पटना के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत डॉक्टर अलका बताती हैं कि

कोरोना को लेकर हमलोग काम तो लगातार कर रहे हैं लेकिन जांच की गति धीमी है. पिछले 15-20 दिनों से आरटीपीसीआर जांच (जिससे कोरोना के बारे  में पता चलता है) की रिपोर्ट RMRI से आई ही नहीं है.

(डॉक्टर अलका)

ऐसे में जब बिहार में कोरोना की जांच धीमी है, ऑक्सीजन की काफ़ी ज़्यादा कमी है तो ये सवाल उठता है कि आख़िर सरकार की कोरोना को लेकर पिछले 1 साल में क्या तैयारी रही है?

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Amir Abbas

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