(अस्पताल में लगे ताले)

बिहार के गांव में स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल, स्वास्थ्य उपकेन्द्र बंद रहने के कारण वैक्सीन की रफ़्तार धीमी

आप आये हैं सर तो आप ख़ुद देख लीजिये क्या स्थिति है. हम लोग शिकायत करते हैं तो अफ़सर साहब बोलते हैं कि झूठ बोल रहे हैं. आप देखिये ये सारी दवाई जो है सब एक्सपायरी है. सरकारी अस्पताल में फ्री में दवा देना है तो मतलब क्या एक्सपायरी देकर हम लोग को मारेंगे?

एक्सपायरी दवा
(एक्सपायरी दवाएं दिखाते ग्रामीण)

जब डेमोक्रेटिक चरखा की टीम जयरामपुर (बेगूसराय) गांव पहुंची तो वहां के स्वास्थ्य उपकेन्द्र की स्थिति देखकर काफ़ी हैरानी हुई. स्वास्थ्य उपकेन्द्र पर ताला लगा हुआ है. बाहर में गाय-भैंस का चारा, चारा काटने की मशीन और गाय-भैंस बंधी हुई है. दवाई की अलमारी टूटी हुई है और उसमें एक्सपायरी दवाएं रखी हुई हैं. मनोज कुमार, 6 नंबर वार्ड (भगवानपुर प्रखंड) के पंच हैं. उन्होंने डेमोक्रेटिक चरखा की टीम को दवाइयां दिखायीं और बताया कि ना तो कभी यहां डॉक्टर आती हैं और ना ही ANM. इस इलाके में 10 किलोमीटर तक कोई दूसरा सरकारी अस्पताल नहीं है. इस वजह से 1 महीने पहले रुखसार खातून अपनी जान गंवा चुकी हैं. रुखसार खातून अपने पिता लाल मोहम्मद के घर अपनी पहली डेलिवरी के लिए आई थी. जब अचानक उनको प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) हुई जिसके बाद वो उप-स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे. लेकिन डॉक्टर नहीं होने की वजह से उन्हें दूसरे जगह जाना पड़ा और रास्ते में उनकी मौत हो गयी.

(डेमोक्रेटिक चरखा से बात करते वार्ड नंबर 6 के पंच)

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत जिला अस्पताल पहुंचने से पहले जो सबसे नज़दीक इलाज के लिए व्यवस्था सरकार के द्वारा किया गया है वो है स्वास्थ्य उपकेन्द्र जिसे अंग्रेज़ी में Health Sub-center कहा जाता है. स्वास्थ्य उपकेन्द्र हर 5 हज़ार की आबादी पर होता है और जो पहाड़ी इलाके हैं, जहां पहुंचना मुश्किल हो, वहां हर 3 हज़ार की आबादी पर एक स्वास्थ्य उपकेन्द्र का निर्माण सरकार के द्वारा किया जाना है. बिहार में आबादी के हिसाब से 20760 स्वास्थ्य उपकेन्द्र होने चाहिए लेकिन अभी तक 18992 स्वास्थ्य उपकेन्द्र की मंज़ूरी दी गयी है. इसमें कहीं भी ये लिखा हुआ नहीं है कि इसमें से कितने स्वास्थ्य उपकेन्द्र हैं जो अभी कार्यरत हैं. सरकार के पास इसका कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है. स्वास्थ्य उपकेन्द्र का मुख्य काम मातृत्व स्वास्थ्य के साथ-साथ टीकाकरण करना होता है. मतलब कोरोना के इस दौर में शहरों में कई सरकारी और प्राइवेट अस्पताल हैं जो कोरोना टीकाकरण का कम कर रहे हैं लेकिन गांव में स्वास्थ्य उपकेन्द्र कोरोना टीकाकरण के लिए काफ़ी ज़रूरी और उपयोगी साबित हो सकता ‘था’. था इसलिए क्योंकि आज के समय में अधिकांश स्वास्थ्य उपकेन्द्र निष्क्रिय हैं. सरकारी कागज़ पर वहां ANM मौजूद हैं और साथ ही डॉक्टर को भी वहां आकर दौरा और इलाज करना है, जो कागजों पर हो रहा है. लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है.

(प्राथमिक चिकित्सा का सेटअप. स्रोत- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन)

बिहार में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी कोई नयी बात नहीं है लेकिन जिस हिसाब से इसके कारण लोगों की ज़िन्दगी पर असर होता है वो काफ़ी चिंताजनक है. मसलन, बेगूसराय में 292 स्वास्थ्य उपकेन्द्र कार्यरत हैं, हालांकि आबादी के हिसाब से बेगूसराय में कम से कम 558 स्वास्थ्य उपकेन्द्र होने चाहिए. हर स्वास्थ्य उपकेन्द्र में कम से कम दो ए.एन.एम. (ANM) यानी Auxiliary Nursing Midwifery होने चाहिए जो मातृत्व स्वास्थ्य का ध्यान रख सकें, साथ ही प्रजनन और टीकाकरण का काम कर सकें. 292 स्वास्थ्य उपकेन्द्र के हिसाब से ANM की संख्या 584 होनी चाहिए लेकिन बेगूसराय में ANM की संख्या सिर्फ़ 230 है. इसका असर गांव के टीकाकरण में देखा जा सकता है.

17  मई 2021 के आंकड़ों के हिसाब से बिहार में सिर्फ़ 5.8% आबादी को ही वैक्सीन की पहली डोज़ मिली है. इतनी धीमी गति से चल रही टीकाकरण की प्रक्रिया के पीछे तीन कारण हैं.

  1. बिहार में वैक्सीन की काफ़ी कमी है. राजधानी पटना में भी 18 साल से लेकर 44 साल के लोगों को वैक्सीन नहीं लगायी जा रही है. सरकारी अधिकारियों ने ये साफ़ कर दिया है कि बिहार के वैक्सीन ख़त्म हो चुके हैं.
  2. जिन गांव में वैक्सीन पहंची थी वहां से उसे वापस पटना भेज दिया गया क्योंकि वहां वैक्सीन लगाने वाला कोई नहीं था.
  3. कई जगहों पर वैक्सीन भी है और लगाने वाले भी, तब भी वहां वैक्सीन नहीं लग रही है. प्रशासन का कहना है कि कम से कम 20-30 लोग आयेंगे तब ही वैक्सीन दी जायेगी नहीं तो नहीं दी जायेगी.

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पहले कारण पर कई मीडिया ने रिपोर्ट्स की हैं जिसके कारण ये मामला सबके सामने है. अब आते हैं दूसरे मामले पर. राटन स्वास्थ्य उपकेन्द्र (बेगूसराय) में ताले बंद रह रहे हैं. ANM को उस गांव में स्वास्थ्य उपकेन्द्र के साथ-साथ आंगनबाड़ी में भी वैक्सीन लगाने हैं लेकिन वहां पर ANM है ही नहीं. ठीक यही समस्या भगवानपुर के भी स्वास्थ्य उपकेन्द्र की है. इसको लेकर गांव वालों ने सिविल सर्जन बेगूसराय को कई दफ़ा फ़ोन भी किया और साथ ही उन्हें व्हाट्सएप्प पर मैसेज भी किया. लेकिन सिविल सर्जन ने ना ही फ़ोन उठाया और ना मैसेज को देखकर भी कोई जवाब दिया.

तीसरा कारण काफ़ी अजीब है. पटना में जब हमारे संवाददाता सुजीत सागर ईस्ट सेंट्रल रेलवे सीनियर सेकंड्री स्कूल के टीकाकरण स्थल पर पहुंचें तो उन्हें जानकारी मिली कि वहां पर वैक्सीन होने के बाद भी लोगों को वैक्सीन नहीं दी जा रही है. वहां के प्रशासन का तर्क था कि जब तक 20-30 लोग वैक्सीन लेने नहीं आयेंगे तब तक किसी को भी वैक्सीन नहीं दी जायेगी.

रोहित भी ईस्ट सेंट्रल रेलवे स्कूल में वैक्सीन लेने आये थे. उन्होंने बताया

जब मैंने प्रशासन से कहा कि अगर लोग नहीं आये हैं जितने लोग आये हैं उतने ही लोगों को वैक्सीन दे दीजिये. तो यहां के लोगों ने कहा कि अगर आपको जल्दी थी तो आप 10 बजे सुबह क्यों नहीं आयें. अब मेरा स्लॉट 3 बजे का था मैं सुबह 10 बजे क्यों आऊंगा? मेरी एक मेडिकल शॉप है, मैं एक फ्रंटलाइन वर्कर हूं अब मैं अपनी दुकान बंद करके घंटों से यहां खड़ा हूं कि मुझे वैक्सीन मिल जाए.

(वैक्सीन लेने आये रोहित)

बिहार में स्वास्थ्य उपकेन्द्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की गुणवत्ता को ध्यान में रखने के लिए बिहार सरकार द्वारा रोगी कल्याण समिति का गठन किया जाता है जिसमें 9 सदस्य होते हैं. इन 9 सदस्यों में प्रखंड विकास पदाधिकारी को बतौर अध्यक्ष और  1 चिकित्सा पदाधिकारी को भी उस समिति में रहना है. लेकिन क्षेत्रीय मूल्यांकन समिति ने जब बेगूसराय का दौरा किया तो उसमें उन्होंने लिखा कि रोगी कल्याण समिति की बैठक नियमित तौर पर नहीं की जा रही है इसके कारण से स्वास्थ्य उपकेन्द्र और प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेन्द्रों की गुणवत्ता में काफ़ी गिरावट हुई है.

इस पर बात करते हुए जन स्वास्थ्य अभियान के संचालक और पॉलीक्लीनिक के चिकित्सक डॉ. शकील का कहना है कि

सबसे पहले तो स्वास्थ्य उपकेन्द्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संख्या में काफ़ी कम है. तो वैसे ही लोगों की पहुंच कम हो गयी है. जो हैं भी वहां पर जो ज़रूरी मशीन होने चाहिए या स्वास्थ्यकर्मी, डॉक्टर, फार्मासिस्ट, रेडियोग्राफर होने चाहिए वो मौजूद ही नहीं हैं. एम्बुलेंस की काफ़ी कमी है अगर मरीज़ की स्थिति गंभीर हो जाए और उसे स्वास्थ्य उपकेन्द्र से कहीं दूसरे अस्पताल ले जाना है तो उसकी कोई सुविधा ही नहीं है.

बिहार में टीकाकरण के कम होने पर डॉ. शकील बताते हैं कि

मुमकिन है कि गांव में वैक्सीन लगाने वाले ANM ना मौजूद हों. अगर आप आंकड़ों को देखेंगे तो पता चलेगा कि बिहार में 35% ANM की कमी है. लेकिन अगर वैक्सीन के डिस्ट्रीब्यूशन के तरीके को देखें तो पता चलेगा कि ये ज़्यादा शहरों में ही बांटा गया है और बहुत से बहुत जिला मुख्यालय में दिया गया है. ये सिर्फ़ बिहार की समस्या नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या है.

सेंटर फ़ॉर पालिसी रिसर्च ने एक आंकड़ा साल 2018 में प्रकाशित किया था. उस आंकड़ें में ये बताया गया था कि बिहार अपने स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सबसे कम ख़र्च करने वाले राज्यों में से एक है. इस वजह से बिहार में 15,180 लोगों पर एक हॉस्पिटल बेड है. ये आंकड़ा पूरे देश में सबसे कम है.

(स्रोत- सेंटर फ़ॉर पालिसी रिसर्च)

ऐसे में बिहार की अधिकांश आबादी गांव में रहती है और गांव में प्राथमिक चिकित्सा की बदहाली पर कोई काम किया ही नहीं गया है.

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Amir Abbas

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