बिहार सरकार का MSP पर झूठा दावा, अपने लक्ष्य का सिर्फ़ 10% किया पूरा

9 जून को भारत सरकार ने किसानों के लिए तथाकथित क्रांतिकारी कदम उठाते हुए हर फ़सल पर MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाया. उसी के तुरंत बाद बिहार के कृषि मंत्री अमरेन्द्र प्रताप सिंह ने एक प्रेस कॉफ्रेंस करते हुए केंद्र सरकार को इसके लिए धन्यवाद दिया और कहा

2021-22 में धान की ख़रीद में ₹72/क्विंटल का इज़ाफ़ा हुआ है. पिछले साल धान की कीमत ₹1868/क्विंटल थी जो इस साल बढ़कर ₹1940/क्विंटल कर दिया गया है. इसी तरह बाजरा में ₹100/क्विंटल का इज़ाफ़ा किया गया है.

एक तरफ़ सरकार किसानों को आश्वस्त करने के लिए MSP को बढ़ाने का काम कर रही है वहीं दूसरी ओर देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान पिछले 7 महीने से लगातार आंदोलनरत हैं. आंदोलनरत किसानों की मांग है कि MSP को कानून के तौर पर लागू किया जाए और हर किसानों को MSP सुनिश्चित की जाए. केंद्र सरकार ने कई मौकों पर ये कहा है कि भारत में किसानों को MSP की सही रकम मिलती रही है. लेकिन इस दावे के उलट बिहार में किसानों को MSP तो दूर, उनके जीवन-यापन करने लायक रकम भी नहीं मिलती है.


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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बिहार की कुल 12 करोड़ की आबादी का तकरीबन दो-तिहाई हिस्सा अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. इनमें से अधिकांश छोटे और सीमान्त किसान हैं. कई किसान ऐसे हैं जो दरअसल कृषि मज़दूर हैं. राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसमें 81% आबादी कार्यरत है, एवं राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी लगभग 42% की हिस्सेदारी है. बिहार में साल 2006 में नीतीश कुमार की सरकार APMC (Agricultural Produce Market Committee) की मंडियों को ख़त्म करके पैक्स (PACS) का घठन किया. शुरुआत में इस फ़ैसले को कृषि सुधार समझा गया लेकिन जल्द ही इस फ़ैसले दुष्प्रभाव किसानों पर दिखने लगा. 

(मक्का किसान, फ़ोटो क्रेडिट- शाह फ़ैसल)

बिहार के सीमान्त इलाकों में एक जिला है किशनगंज. इस इलाके में मक्के की खेती की जाती है. बिहार पूरे देश में शीर्ष मक्का उत्पादकों में से एक है. रबी के सीज़न में पूरे देश के मक्के का 80% उत्पादन बिहार में होता है. लेकिन इतने बड़े उत्पादन के बावजूद बिहार में मक्के की ख़रीद को लेकर किसी भी तरह का तंत्र मौजूद नहीं है. सरकार ने मक्के की ख़रीद पर ₹1850 MSP रखी थी. साल 2019-20 में मक्के पर ₹1760 की MSP सरकार द्वारा तय की गयी थी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब बिहार सरकार ने मंडी व्यवस्था को पूरे तरीके से ख़त्म कर दिया है और पैक्स मक्के की ख़रीद करती नहीं है तो फिर ये किसान मक्के को कहां बेचेंगे?

इस सवाल के जवाब में किशनगंज के मक्का किसान अफाराज़ुल बताते हैं

बिहार में मक्के की कोई मंडी है ही नहीं. इसके लिए हमलोग को इस्लामपुर (पश्चिम बंगाल) या दलकोला में जाकर मक्का बेचना पड़ता है. लेकिन वहां भी कभी भी हमें  MSP नहीं मिलती है. ₹1850 की जगह हमें ₹1100-₹1200 मिलते हैं. इतने में हम घर कैसे चला पायेंगे?

(फ़ोटो क्रेडिट- शाह फ़ैसल)

किशनगंज के वरिष्ठ पत्रकार शाह फ़ैसल कई दिनों से मक्का किसानों के मुद्दों पर लिखने का काम करते हैं. शाह फ़ैसल बताते हैं,

किशनगंज का इलाका निचला इलाका है जहां हमेशा पानी भरा रहता है. ऐसे जगह पर गेहूं की फ़सल उगा पाना काफ़ी मुश्किल है. इन इलाकों में मक्का काफ़ी अधिक उत्पादन होता है. लेकिन सरकार के पास मक्का ख़रीदने की कोई व्यवस्था नहीं है.

शंकर महतो एक मक्का किसान हैं. उन्होंने 3 बीघे के खेत में मक्के की फ़सल लगायी थी. 3 बीघे में खेती के लिए उन्हें ₹24,000 की ज़रूरत थी जो उन्होंने किशनगंज के एक महाजन से सूद पर उधार लिए. शंकर को ये उम्मीद थी कि इस बार उन्हें मक्के का सही दाम मिलेगा लेकिन इस बार उन्हें निराशा हाथ लगी है. शंकर महतो बताते हैं

सरकार ने वादा किया था कि कम-से-कम हमें ₹1850/क्विंटल मिलेगा इसी आस में हम खेती भी किये और सूद पर पैसे भी उधार लिए. जब इस्लामपुर लेकर गए तो वहां पर ₹1200/क्विंटल का दाम मिल रहा है. ऐसे में अब महाजन का पैसा भी नहीं चुका पाए हैं और वो मेरी खेती को ज़ब्त करने की बात कह रहा है.

पैक्स की वेबसाइट से मिली जानकारी के अनुसार इस साल 2,23,586 किसानों ने मक्के की ख़रीद के लिए आवेदन दिया था लेकिन पैक्स की तरफ़ से कोई ख़रीद नहीं की गयी.

ऐसा नहीं है कि ये स्थिति सिर्फ़ मक्का किसानों की है. पैक्स (PACS) गेंहू, धान और दलहन की ख़रीद करता है लेकिन वहां भी काफ़ी गड़बड़ी नज़र आती है. बिहार सरकार ने ट्वीट करके जानकारी दी कि उन्होंने इस साल गेंहू की रिकॉर्ड तोड़ ख़रीददारी की और पिछले बार से 12.59% अधिक ख़रीद की गयी है. लेकिन बिहार सरकार केवल आंकड़ों के जाल में ही फंसा कर सच छुपाने में माहिर है. इस साल बिहार सरकार ने गेंहू ख़रीदने का लक्ष्य 7 लाख मेट्रिक टन रखा था, जो 15 जून तक पूरा किया जाना था. 23 जून शाम 8 बजे तक पैक्स ने सिर्फ़ 69472.22 मिट्रिक टन गेंहू की ख़रीद की है. बिहार सरकार अपने लक्ष्य का सिर्फ़ 10% ही गेंहू ख़रीद पायी है.

कृषि विभाग के सचिव एन सरवन कुमार ने कहा कि इस साल गेहूं का उत्पादन करीब 65 लाख मीट्रिक टन होने का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 2020-21 के रबी विपणन सत्र में मात्र 5,000 टन गेहूं की खरीद की गई थी, जबकि संशोधित लक्ष्य 7 लाख मीट्रिक टन का था. 2019-20 में राज्य एजेंसियों ने 2815 टन गेहूं की खरीद की थी.

हालांकि बिहार राज्य किसान महासभा के महासचिव अशोक प्रसाद कृषि विभाग के सचिव एन सरवन कुमार के आंकड़ों को नकारते हुए कहते हैं:-

बिहार में 65 लाख मिट्रिक टन नहीं बल्कि उससे अधिक गेंहू की पैदावार हुई है. लेकिन पैक्स गेंहू ख़रीद पाने में असक्षम है उसकी बहुत बड़ी वजह है अनाज गोदाम की कमी. उदाहरण के लिए बेगूसराय में पैक्स के पास अभी सिर्फ़ 6 हज़ार मेट्रिक टन के स्टोरेज की क्षमता मौजूद है. जिसमें से 2 हज़ार टन में पहले से चावल का भंडारण किया जा चुका है. ऐसे में बेगूसराय में 10939 मेट्रिक टन की ख़रीद की गयी तो वो रखा कहा जाएगा?

अशोक प्रसाद की बात बिहार के सारण जिले में सच साबित होते दिख रही है. सारण के गड़खा प्रखंड के मिठेपुर पैक्स में किसानों का गेंहू स्टोरेज की कमी के कारण नहीं ख़रीदा जा सका. गड़खा प्रखंड के किसान शिवशंकर राम ने 5 बीघे में गेंहू की फ़सल तैयार की थी. मिठेपुर पैक्स ने ये गेंहू कभी ख़रीदा ही नहीं. शिवशंकर राम जैसे और भी किसान पैक्स के इंतज़ार में रह गए और बेमौसम की बारिश में उनकी कटी हुई फ़सल ख़राब हो गयी. जब डेमोक्रेटिक चरखा ने मिठेपुर पैक्स से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि

अभी कोरोना की वजह से ख़रीद नहीं की जा सकी है. अभी जान बचायेंगे या गेंहू खरीदेंगे?

किसानों ने सहकारिता की हेल्पलाइन और टोल फ़्री नंबर पर भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन दोनों नंबर पर किसी ने भी जवाब नहीं दिया. डेमोक्रेटिक चरखा ने भी 3 दिन लगातार टॉल फ़्री नंबर 18003456290 पर और हेल्पलाइन नंबर 06122200693 पर कॉल किया तो कई बार कॉल लगाने के बावजूद इसपर बात नहीं हो सकी.

बिहार में सबसे कम गेंहू अधिप्राप्ति अरवल ज़िले में की गयी है. अरवल में सिर्फ़ 13 किसानों का गेंहू ख़रीदा गया है. इसकी मात्रा

76.9 मिट्रिक टन है. जब हमलोगों ने सहकारिता अधिकारी, अरवल से बात की तो उन्होंने सरकारी आंकड़े को ही गलत ठहरा दिया. उन्होंने बताया कि

आप अपने आंकड़ों को दुरुस्त कीजिये. 76.9 मिट्रिक टन नहीं बल्कि 1100 मिट्रिक टन से अधिक गेंहू की ख़रीद की गई है.

जब सहकारिता अधिकारी को ये बताया गया कि ये आंकड़ें पैक्स की वेबसाइट से लिए गए हैं और 13 किसानों में 1100 मिट्रिक टन से अधिक ख़रीद कैसे हो सकती है तो अधिकारी ने फ़ोन काट दिया.

सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से खुलासा होता है कि बिहार में देश के कुल गेहूं के उत्पादन का 5.7% हिस्सा है. इस साल किसानों ने 2,33,000 हेक्टेयर से अधिक की कृषि भूमि पर गेहूं की खेती की है.

अशोक प्रसाद पैक्स और कृषि विभाग के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए आगे बताते हैं

68 हज़ार हेक्टेयर पर सिर्फ़ बेगूसराय जिले में गेहूं की खेती की गयी है. तो ज़ाहिर सी बात है कि पूरे राज्य में 2,33,000 हेक्टेयर से कहीं अधिक भूमि पर खेती की गयी है. पैक्स के गेंहू नहीं ख़रीदने की सिर्फ़ 2 वजह है, एक तो भ्रष्टाचार और दूसरी व्यवस्था की कमी. पैक्स सिर्फ़ उन लोगों के गेंहू की ख़रीद करती है जो सरकार की सूची में रजिस्टर्ड किसान हैं. कई ऐसे छोटे किसान हैं जो सिर्फ़ किसानी करते हैं उन्हें रजिस्टर होना नहीं आता. ना उनके पास मोबाइल फ़ोन है और ना ही किसी तरह का पहचान पत्र. उसके बाद जो बिहार के बड़े व्यापारी हैं वो यहां के छोटे व्यापारियों से हर तरह की फ़सल औने-पौने दाम पर खरीदते हैं उसके बाद यही फ़सल ले जाकर पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में बेचते हैं, क्योंकि इन राज्यों में सही दाम मिलते हैं. उसके बाद यही फ़सल बिहार सरकार वापस पंजाब-हरियाणा से ख़रीदती है. ऐसे में यहां की पैदावार घूमकर यहां आती है और महंगी बिकती है.

(सहदेव महतो, पश्चिम चंपारण)

कुछ ऐसी ही स्थिति पश्चिम चंपारण के वृंदावन आश्रम की है. महात्मा गांधी जब नील की खेती के ख़िलाफ़ बिहार से आंदोलन की शुरुआत की थी तो उन्होंने इस आश्रम की स्थापना की थी. वृंदावन आश्रम के आस-पास सरकार ने कई किसानों को खेती करने के लिए ज़मीन दी हुई है. लेकिन इन किसानों के पास मोबाइल फ़ोन और पहचान पत्र कुछ भी मौजूद नहीं है. सहदेव महतो वृंदावन आश्रम के पास गेंहू किसान हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें रजिस्टर होने या MSP के बारे में जानकारी है, तो वो बताते हैं

MSP क्या होता है हमें ये नहीं पता. जब हमलोग खेती करते हैं तो एक बड़े व्यापारी हैं पड़ोस के ही वो हमारी सारी फ़सल  ₹1100/क्विंटल के हिसाब से ख़रीद लेते हैं. पैसे तो कम मिलते हैं लेकिन किसी तरह घर चल जाता है.

राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसमें 81% आबादी कार्यरत है, एवं राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी लगभग 42% की हिस्सेदारी है. लेकिन इसके बावजूद भी बिहार के किसानों की फ़सल नहीं ख़रीदी जाती है. भारत सरकार के नए कृषि कानून के ज़रिये पूरे देश में मंडी व्यवस्था ख़त्म होने की कगार पर है. ऐसे में जिन राज्यों में किसानों को फ़सल की सही कीमत मिलती भी है तो जल्द ही ख़त्म हो जायेगी. 

(ये रिपोर्ट ज़फ़र इकबाल और शाह फ़ैसल के सहयोग से लिखी गयी है.)

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Amir Abbas

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