DC इम्पैक्ट: दलित बच्चियों के पास पढ़ाई के लिए नहीं थे स्मार्टफ़ोन, BASF और मलाला फंड से मिले स्मार्टफ़ोन

हम टीचर बनना चाहते थे लेकिन अब नहीं बन पायेंगे. ना ही स्मार्ट फ़ोन है और ना ही मेरे मां-बाप के पास पैसे हैं कि वो मुझे स्मार्टफ़ोन ख़रीद सकें.

बेगूसराय के घाघरा गांव की रौशनी डेमोक्रेटिक चरखा से बात करते हुए भावुक हो जाती हैं. रौशनी 11वीं क्लास की छात्रा हैं और पिछले साल से लॉकडाउन में स्कूल बंद होने के कारण स्कूल नहीं जा पा रही हैं. बिहार सरकार ने ऑनलाइन एप्प e-LOTS के ज़रिये पढ़ाई करवा रही है. लेकिन रौशनी सहित ऐसे कई स्टूडेंट्स हैं जिनके पास ऑनलाइन पढ़ाई का कोई साधन उपलब्ध नहीं है.

(डेमोक्रेटिक चरखा के ग्रामीण पत्रकार रंजीत से बात करती रौशनी)

वीडियो रिपोर्ट देखें- दलित बच्चे नहीं कर पा रहे हैं ऑनलाइन पढ़ाई, लाखों बच्चे का भविष्य अंधकार में


8 फ़रवरी को लोकसभा में में प्रश्नकाल में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि महामारी के दौरान कोई बच्चा ऑनलाइन शिक्षा से वंचित नहीं रहा है, कारण सरकार द्वारा इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं एवं ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने में भारत ने अनेक देशों को पीछे छोड़ दिया है. केंद्रीय मंत्री ने साथ ही कहा कि वंचित वर्ग के बच्चों तक मोहल्ला स्कूलों के ज़रिये पहुंचा गया है और अभी 34 शैक्षणिक चैनल हैं जिनमें से 22 उच्च शिक्षा एवं 12 स्कूली शिक्षा के स्तर पर हैं. लेकिन केन्द्रीय मंत्री के बयान की तस्वीर बिहार के गांव में बिल्कुल अलग है.

जब डेमोक्रेटिक चरखा ने ऑनलाइन पढ़ाई और उसके साधन पर रिपोर्ट करना शुरू किया तो 3 तरह के केस आम तौर पर सामने आयें.

  1. ऑनलाइन पढ़ाई के लिए किसी भी तरह के साधन का उपलब्ध ना होना.
  2. घर में एक ही स्मार्टफ़ोन, जो घर के कमाने वाले व्यक्ति के पास होता है.
  3. घर में एक से अधिक बच्चे और उन में लड़कों की पढ़ाई और स्मार्टफ़ोन को प्राथमिकता देना.

बेगूसराय के डंडारी की चांदनी ख़ातून ने 10वीं का एग्जाम पास किया. उसके बाद वो आगे भी पढ़ना चाहती थी. उनके मां-पिता का देहांत कई साल पहले ही हो चुका है और वो अपनी एक बूढ़ी दादी के साथ रहती हैं. चांदनी ख़ातून के घर की मासिक आय ₹2000 है. जब लॉकडाउन के कारण उनकी पढ़ाई रुकी हुई थी तो उनकी शादी करवा दी गयी. चांदनी ख़ातून बताती हैं

मेरे पास शादी के अलावा और कोई रास्ता नहीं था. लेकिन अगर लॉकडाउन नहीं लगा रहता या फिर सरकार ने किसी भी तरह के ऑनलाइन पढ़ाई का साधन उपलब्ध करवाया होता तो मेरी शादी नहीं होती.

(डेमोक्रेटिक चरखा से बात करती चांदनी ख़ातून)

डेमोक्रेटिक चरखा ने चांदनी ख़ातून, रौशनी सहित कई स्टूडेंट्स की रिपोर्ट 25 मई को पब्लिश की थी और उसके साथ ही बिहार सरकार और आम जनता से अपील की थी इन स्टूडेंट्स को ऑनलाइन पढ़ाई के साधन जैसे स्मार्टफ़ोन, टैबलेट, लैपटॉप या कंप्यूटर मुहैय्या करवाने में मदद करें. डेमोक्रेटिक चरखा की रिपोर्ट के बाद बेगूसराय में स्टूडेंट्स की मदद के लिए सामने आते हैं बिहार आंबेडकर स्टूडेंट फोरम (BASF) और मलाला फंड. BASF और मलाला फंड के ज़रिये 9 बच्चियों को स्मार्टफ़ोन दिया गया है.

(BASF और मलाला फंड के ज़रिये फ़ोन वितरण में रंजीत सहित लाभार्थी)

स्मार्टफ़ोन मिलने के बाद रौशनी ख़ुशी से कहती हैं

अब तो हम टीचर बन जायेंगे. हम अभी से बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं. जब से मलाला फंड और BASF की ओर से फ़ोन मिला है हम अपनी पढ़ाई भी कर रहे हैं और मोहल्ले के बच्चों को भी पढ़ा रहे हैं. अगर रंजीत सर (डेमोक्रेटिक चरखा के ग्रामीण पत्रकार) नहीं आते तो हमें ये फ़ोन कभी नहीं मिल पाता.

मलाला फंड और BASF ने इन बच्चियों को स्मार्ट फ़ोन मुहैय्या करा कर समुदाय की बड़ी मदद की है. डेमोक्रेटिक चरखा की तरफ़ से बदलाव के साथियों को शुक्रिया.

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Ranjeet Kumar

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