#Aazadi_Special: आज़ादी के 74 साल बाद क्या transgender भूख से आज़ाद हो पाए हैं?

जब हमलोग पटना सदर प्रखंड के RTPS (लोक सेवाओं का अधिकार) काउंटर पर गए तो वहां के अधिकारी एक हैं, उनका नाम विजय कुमार है, वो बोलते हैं कि राशन कार्ड सिर्फ़ मर्द और औरत के लिए ही बनता है आप लोगों के लिए कोई सुविधा मौजूद नहीं है. हम बस एक ही बात पूछना चाहते हैं, हम किन्नर (Transgender) हैं तो क्या हमें भूख नहीं लगती है? क्या हम इंसान नहीं हैं? कब तक हमें सरकारी सुविधाओं से परे रखा जाएगा?

अंशिका ये बात कहते हुए भावुक हो जाती हैं. अंशिका एक ट्रांसजेंडर (Transgender) हैं. हर दिन घर से बाहर निकलते ही समाज ट्रांसजेंडर होने के कारण भेदभाव करना शुरू कर देता है. लेकिन बिहार में राज्य सरकार भी ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय के साथ भेदभाव कर रही है. कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान लगे लॉकडाउन में ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ सरकारी भेदभाव और गहरा होता जा रहा है. साल 2011 में हुई जनगणना के अनुसार बिहार में 60 हज़ार ट्रांसजेंडर (Transgender) मौजूद हैं. लेकिन इस 40 हज़ार की आबादी को सरकार किसी भी तरह से मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उचित कदम नहीं उठा रही है.

कोरोना की पहली लहर के दौरान लगे लॉकडाउन में आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया. अधिकांश लोगों के पास राशन मौजूद नहीं था. इन्हीं में से एक थें ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय के लोग. बिहार में चूंकि अधिकांश ट्रांसजेंडर बधाई मांगने और अलग-अलग तरह के इवेंट में परफॉर्म करके पैसा कमाते हैं तो इनके पास कभी भी अधिक मात्रा में राशन नहीं रहता है. इसी वजह से बिहार में किसी भी ट्रांसजेंडर के पास राशन की सुविधा उपलब्ध नहीं थी.

(विज्ञापन)

केंद्र और राज्य सरकार ने कई योजनाओं के तहत लोगों में राशन वितरण की कोशिश की लेकिन इन योजनाओं में कहीं भी कोई प्रावधान ट्रांसजेंडर के लिए नहीं था. राशन कार्ड नहीं होने के कारण किसी भी ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय के लोगों को सरकार की ओर से राशन नहीं दिया गया.

(RTPS के लाइन में खड़ीं मुक्ति)

The Transgender Protection (Protection of Rights) Act, 2019 के तहत किसी भी ट्रांसजेंडर को शिक्षा, रोज़गार, पेशा, स्वास्थ्य, योजनाओं का लाभ, रहने की जगह, सर्विस या सुविधा में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता है.


और पढ़ें- बिहार सरकार का MSP पर झूठा दावा, अपने लक्ष्य का सिर्फ़ 10% किया पूरा


साल 2020 में इसी भेदभाव को उजागर करने के लिए वीरा यादव, जो एक ट्रांसजेंडर हैं, उन्होंने पटना हाईकोर्ट में एक याचिका (CWJC No.5627) दायर की थी. वीरा यादव की ओर से ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, बिहार (HRLN) ने ये केस लड़ा था. HRLN, बिहार के वकील दीपक सिंह बताते हैं

ये केस ऐतिहासिक रहा. इसमें पटना हाईकोर्ट ने कई ऐसे जजमेंट दिए जिसकी वजह से आज के समय में सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडर समुदाय को आरक्षण भी मिला. इस केस में कोर्ट ने ये भी कहा था कि सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के राशन जैसी मूलभूत चीज़ मिलने का अधिकार होना चाहिए. लेकिन अफ़सोस की बात है कि आजतक ट्रांसजेंडर समुदाय का राशन कार्ड नहीं बन पाया है. इसके लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार स्थानीय प्रशासन है.

मुक्ति एक विकलांग ट्रांसजेंडर (Transgender) हैं. उनके लिए ज़्यादा समय तक खड़े भी रह पाना संभव नहीं है. उनका एक पैर पूरे तरीके से ख़राब है. लेकिन इसके बाद भी जब मुक्ति ब्लॉक ऑफिस में राशन कार्ड बनवाने के लिए जाती हैं तो उन्हें हर काउंटर पर दौड़ाया जाता है और उसके बाद कह दिया जाता है कि उनका राशन कार्ड नहीं बन सकता. जब मुक्ति और बाकी मौजूद ट्रांसजेंडर (Transgender) ने प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) से ये पूछा कि उनका राशन कार्ड कब तक बनेगा तो उन्होंने कहा कि

अभी RTPS काउंटर बंद है. जब खुलेगा तब आपलोग का राशन कार्ड बनेगा. इंतज़ार कीजिये.

(डेमोक्रेटिक चरखा से बातचीत करती अंशिका)

हालांकि प्रखंड विकास पदाधिकारी के दावे के उलट RTPS काउंटर खुला हुआ था और वहां पर सभी लोगों का राशन कार्ड बन रहा था सिवाए ट्रांसजेंडर समुदाय के. वीरा यादव जनहित याचिका में मुख्य तौर पर 7 मांगे राखी गयीं थीं.

  1. बिहार सरकार द्वारा तत्काल तौर पर 25 किलो राशन सहित 5 हज़ार रूपए की सहायता.
  2. घर के किराय के लिए 2 हज़ार रूपए
  3. राशन कार्ड के बिना तत्काल तौर पर राज्य और केंद्र सरकार की सभी योजनाओं का लाभ
  4. आंगनवाड़ी की तरह एक और सेंटर जहां से ट्रांसजेंडर समुदाय पोषक आहार ले सकें.
  5. न्यूनतम 3,500 रूपए की मासिक पेंशन
  6. ट्रांसजेंडर के लिए शिकायत निवारण केंद्र जो 20 दिन में शिकायत का निपाटारा करे
  7. ऐसी महामारी के दौर में ट्रांसजेंडर समुदाय की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उचित नियम.

इस याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर मौजूद वकील अजय ने कोर्ट में कहा था कि बिहार सरकार ने कई ऐसे नियम बनाये हैं जिसके ज़रिये बिना राशन कार्ड के भी राशन मिल सकता है. लेकिन मौजूदा समय में राशन मिलना तो दूर की बात है कई आदेश और नोटिस के बाद भी राशन कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है. इस मामले में ट्रांसजेंडर राइट्स एक्टिविस्ट और दोस्ताना सफ़र की अध्यक्ष रेशमा प्रसाद बताती हैं

फ़्री राशन की बात सरकार तो कह रही है लेकिन हमें कहीं भी फ़्री राशन दिख तो नहीं रहा है. खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सभी को राशन मिलने का अधिकार है चाहे वो मर्द हो, औरत हो या कोई ट्रांसजेंडर. लेकिन केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को ये देखना चाहिए कि कहां चूक हो रही है और ट्रांसजेंडर समुदाय को राशन कार्ड नहीं मिल पा रहा है.

(लॉकडाउन से पहले डांस इवेंट से ट्रांसजेंडर घर चलाती थीं.)

ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय को राशन कार्ड बनाने में इतनी परेशानी क्यों हो रही है ये समझने के लिए जब डेमोक्रेटिक चरखा की टीम ने डीएम कार्यलय में कॉल किया तो वहां से अनुभाजन अधिकारी का नंबर दिया गया और कहा गया कि वही ये काम करेंगे. लेकिन जब अनुभाजन अधिकारी से बात हुई तो उन्होंने कहा,

मैं किसी का भी राशन कार्ड बनाने का ज़िम्मेदार नहीं हूं आप ADM सप्लाई से बात कीजिये.

ADM सप्लाई से अभी तक कोई संपर्क नहीं हो पाया है क्योंकि वो फ़ोन नहीं उठा रहे हैं और ना ही अपने दफ़्तर में मौजूद हैं.

इस अंधेरे में जब सरकार ने ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय को छोड़ दिया तो उस समय उम्मीद की किरण बन कर रेशमा प्रसाद और दोस्ताना सफ़र ने समुदाय की काफ़ी मदद की. राखी इवेंट्स में डांस का कार्यक्रम करती हैं. ट्रांसजेंडर होने के कारण उन्हें कोई दूसरा काम भी नहीं मिलता है. लॉकडाउन के दौरान जब सारे कार्यक्रम बंद थें उस समय एक ऐसा वक़्त आया जब राखी को पानी पीकर ही गुज़ारा करना पड़ रहा था. राखी बताती हैं

सब कुछ बंद हो गया है (बिहार के लॉकडाउन गाइडलाइन्स के अनुसार इवेंट्स पर प्रतिबंध है), कोई दूसरा काम तो हमलोग को मिलता है नहीं. ऐसे में कितना दिन बीत गया पानी पीकर, खाने के लिए कुछ भी मौजूद नहीं था. फिर हम रेशमा जी को कॉल किये तो वो हमलोग के लिए राशन का इंतज़ाम करवा कर भेजी थी, तब जाकर हमलोग कुछ खा पायें.

सरकार की जवाबदेही को समझाते हुए HRLN, बिहार के वकील दीपक सिंह बताते हैं

कोरोना का जो दौर रहा है वो महामारी का रहा. ऐसे में सरकार को राशन कार्ड बनाने की प्रक्रिया को और सरल बनाना चाहिए तो सरकार ने उसे और जटिल बना दिया है. हमारी डिमांड थी कि समुदाय को ऑन-स्पॉट राशन कार्ड बना कर दिया जाए. बिहार सरकार में राशन कार्ड बनाने के लिए RTPS की ऑनलाइन सुविधा भी है, उसमें पहले थर्ड जेंडर का ऑप्शन ही नहीं दिया हुआ था. ऐसे में तो सरकार की मंशा साफ़ दिखाई देती है कि वो राशन कार्ड नहीं बनाना चाहती है. दूसरी बात, कोर्ट के ऑर्डर के बाद भी अभी तक समुदाय का राशन कार्ड नहीं बना है. इस वजह से आज भी समुदाय को राशन नहीं मिल रहा है.

कल स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये दावा किया कि 80 करोड़ भारतीय को प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना की तहत मुफ़्त राशन मिला है. लेकिन इस योजना में कहीं भी ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय को लाभ नहीं मिला है. तो क्या प्रशासन ट्रांसजेंडर को अपना नागरिक मानता भी है?

Digiqole Ad Digiqole Ad

Anupriya

Related post