लोदीपुर-चांदमारी सड़क को आर्मी ने किया बंद, रास्ता नहीं होने के कारण 5 ग्रामीणों की अभी तक मौत

मेरे पति को शाम के समय हार्ट अटैक हुआ. आस पड़ोस के लोगों ने जल्दी एम्बुलेंस को फ़ोन किया लेकिन जो गांव की मुख्य सड़क (लोदीपुर-चांदमारी सड़क) है उसे मिलट्री वालों से बंद कर दिया था. गांव का दूसरा रास्ता इतना पतला और ख़राब है कि वहां पर एम्बुलेंस क्या कोई भी चार चक्के की गाड़ी नहीं आ सकती है. हमलोग किसी तरह ऑटो से लेकर उन्हें दानापुर सदर अस्पताल पहुंचे तब तक उन्होंने दम तोड़ दिया. अस्पताल पहुंचने से 5 मिनट पहले मेरे पति का देहांत हो गया. उन्हें बचाया जा सकता था.

(अपने मृत पति की तस्वीर के साथ कमला देवी)

कमला देवी बताते हुए रुआंसी हो जाती हैं. ये कहानी सिर्फ़ कमला देवी की नहीं गांव के कई लोगों की है. 5 अगस्त 1765 को दानापुर (उस समय इसे दीनोपुर के नाम से जान जाता था.) में आर्मी कैंटोनमेंट (छावनी) की स्थापना की गयी. पहले ये बांकीपुर में था लेकिन बाद में इसे दानापुर में स्थानांतरित कर दिया गया. दानापुर Bihar Regiment Center का हेडक्वाटर है. दानापुर कैंटोनमेंट (छावनी) के पीछे चांदमारी गांव है. गांव के बुज़ुर्ग बताते हैंकि ये गांव छावनी की स्थापना से पहले उसी जगह था जहां पर आज छावनी है. लेकिन ब्रिटिश आर्मी ने गांव को पीछे बसा दिया लेकिन आने-जाने का रास्ता वही पुराना था.

2017 तक ग्रामीण बिना रोक-टोक के छावनी होते हुए मुख्य सड़क (एनएच 30) पर आते थे. लेकिन 2018 से आर्मी ने रास्ता बंद करने की कवायद शुरू कर दी. वजह बताई कि ये रास्ता ऑफिसर के क्वाटर के पास से गुज़रता है तो सुरक्षा के लिए ये कदम उठाया जा रहा है.

(आर्मी द्वारा बैरिकेटिंग कर बंद किया गया लोदीपुर-चांदमारी सड़क)

पिछले साल जब लॉकडाउन के दौरान पूरा देश बंद था उस समय आर्मी ने उस रास्ते को पूर्ण रूप से बैरिकेटिंग करके बंद कर दिया है. इसी चांदमारी गांव में बिहार के सबसे बड़े स्कूल में से एक डीपीएस (दिल्ली पब्लिक स्कूल) भी स्थित है. लेकिन आर्मी ने डीपीएस के बच्चों के लिए रास्ता बंद नहीं किया है हालांकि नियम और परिभाषा के मुताबिक वो भी सिविलियन्स ही हैं. इसी मुद्दे पर ग्रामीणों और आर्मी के अधिकारियों के बीच विवाद भी है.


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प्रिया कुमारी चांदमारी गांव की रहने वाली हैं और 11वीं क्लास में पढ़ाई करती हैं. प्रिया पढ़ाई के लिए शाहपुर गांव जाती हैं. जब लोदीपुर-चांदमारी मार्ग खुला हुआ था तो प्रिया को स्कूल पहुंचने में 15 मिनट लगते थे. लेकिन अब उसे 1 घंटे से भी ज़्यादा का समय पैदल चल कर स्कूल जाना पड़ता है. प्रिया के मुताबिक

हमलोग जब लोदीपुर-चांदमारी मार्ग से स्कूल जाते थे तो जल्दी पहुंचते थे लेकिन अब तो 1 घंटा लगता है स्कूल पहुंचने में. उसके ऊपर से जिस रास्ते से हमलोग स्कूल जाते हैं उस रास्ते में काफ़ी दूर तक जंगल का इलाका है. इस वजह से घर वालों को काफ़ी डर भी लगता है उस रास्ते से भेजने के लिए. इस वजह से अब घर वालों ने पढ़ाई छोड़वा दी है. हम कभी महीने में एक दिन ही स्कूल जाते हैं और घर वालों ने कहा है कि 12वीं के बाद हम आगे पढ़ भी नहीं सकते क्योंकि शहर को जोड़ने वाला रास्ता ही नहीं है.

(प्रिया कुमारी अभी 11वीं में पढ़ाई करती हैं.)

प्रिया की तरह गांव की कई बच्चियां अपनी पढ़ाई और कोचिंग छोड़ चुकी हैं. ऐसे ही एक बच्ची है नैंसी. 10वीं के बाद अब वो आगे पढ़ाई नहीं कर रही हैं. नैंसी की मां बताती हैं

आपको ये बताने की ज़रूरत तो है नहीं कि बाहर में लड़कियों के साथ क्या हो रहा है. इसका स्कूल हमारे घर से 1 किलोमीटर की दूरी पर था. उसपर से आर्मी के जवान रहते थे तो हमारी बच्चियां बेफिक्र होकर आना जाना करती थीं. रास्ता बंद होने के कारण इसका स्कूल अब 7 किलोमीटर दूर हो चुका है. साथ ही नए रास्ते में जंगल पड़ता है, ऐसे में हम अपनी बच्ची को अकेले नहीं भेज सकते ये जानते हुए कि वो रास्ता सुरक्षित नहीं है.

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चांदमारी गांव पहुंचने के दो रास्ते हैं. पहला रास्ता आरा रोड (एनएच 30) के बीच से छावनी होते हुए, इसकी दूरी लगभग 300 मीटर है. दूसरा रास्ता, छावनी से पहले हथिखाना और आनंद बाज़ार के रास्ते 5 किलोमीटर घूम कर गांव पहुंचना. साथ ही दूसरा रास्ता इतना पतला और जर्जर है कि यहां पर मोटरसाइकिल भी मुश्किल से चल पाती है. एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाने के कारण अभी तक चांदमारी गांव के 5 लोगों ने अपनी जान गंवा दी है.

केशव राय दुग्ध उत्पादन के काम से जुड़े हुए थे. वो अपने घर में एकलौते काम करने वाले थे. जब केशव राय का काम ख़त्म करके वापस लौटे तो उनकी तबियत थोड़ी ख़राब लगी. जब तबियत बिगड़ने लगी तो घर वालों ने गांव के ही एक ऑटो पर उन्हें अस्पताल पहुंचाने लगे. लेकिन रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गयी.

(केशव राय की तस्वीर)

लगातार मौत और बच्चों की पढ़ाई छूटने की वजह से 15 महीने पहले चांदमारी गांव के लोगों ने आंदोलन शुरू किया. लेकिन सरकार और मीडिया की नज़र कभी भी इस मुद्दे पर नहीं पड़ी. साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान चांदमारी सहित आस-पास के 5 गांव ने ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का नारा दिया और पूरे वोटिंग प्रक्रिया का बहिष्कार किया था. साल 2020 में जब आंदोलन अपने चरम पर था तो अनुमंडल पदाधिकारी के आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने आंदोलन ख़त्म कर दिया था. लेकिन जब आश्वासन हकीकत में तब्दील नहीं हो सका तब ग्रामीणों ने फिर से आंदोलन की शुरुआत की. इस बार ग्रामीणों ने 100 घंटे का सत्याग्रह की शुरुआत की है, जिसमें 50 घंटे यानी 24 अगस्त 2021 से लेकर 26 अगस्त 2021 धरना और अगले 50 घंटे यानी 27 अगस्त 2021 से 29 अगस्त 2021 तक भूख हड़ताल करने का फ़ैसला किया है.

(ग्रामीणों द्वारा चल रहा सत्याग्रह)
(ग्रामीणों द्वारा चल रहा सत्याग्रह)

लोदीपुर-चांदमारी सड़क बचाओ आंदोलन और अॉल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के राष्ट्रीय सचिव सुशील कुमार बताते हैं

देखिये हमारी मांग सिर्फ़ एक लाइन की है, अगर डीपीएस की बसें उसी रास्ते से बिना किसी रोक-टोक के आ सकती हैं तो फिर ग्रामीण क्यों नहीं आ सकते? ग्रामीणों के बच्चे क्यों नहीं आ सकते? ग्रामीणों के बच्चे भी तो बच्चे ही हैं ना. मिलेट्री ने सुरक्षा का हवाला देकर रास्ता बंद किया. सैंकड़ों सालों से छावनी और गांव दोनों हैं लेकिन आज तक कोई भी अप्रिय घटना नहीं घटी.

रास्ते के बंद होने की वजह क्या है ये जानने के लिए जब डेमोक्रेटिक चरखा ने आर्मी के अधिकारियों से बात करनी चाही तो उन्होंने साफ़ तौर से मना कर दिया. डीएम, पटना द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार

आर्मी अधिकारियों से बातचीत 2019 में ही हुई थी. उन्होंने बताया कि ये ज़मीन A1 सेक्टर के अंतर्गत है. यानी ये ज़मीन सिर्फ़ मिलेट्री उद्देश्य से ही इस्तेमाल की जायेगी और इसपर सिविलयन्स का कोई अधिकार नहीं होगा. ये मामला अनुमंडल पदाधिकारी के अधीन है. गांव वालों की परेशानी को देखते हुए 4 वैकल्पिक रास्तों का प्रस्ताव है. 2.5 किलोमीटर की चांदमारी-तुरह पथ का निर्माण भी करवाने का प्रस्ताव है.

हालांकि  चांदमारी-तुरह पथ मार्च में ही बन जाना चाहिए था लेकिन इसका काम अभी शुरू नहीं हुआ है.

(डेमोक्रेटिक चरखा से बातचीत करते सुशील कुमार)

सुशील कुमार संविधान का हवाला देकर बताते हैं

रास्ता इन ग्रामीणों का मौलिक अधिकार है. संविधान की धारा 21 के तहत सभी नागरिकों को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार प्राप्त है. लेकिन रास्ता छीन कर इन ग्रामीणों से सम्मानपूर्वक जीना का अधिकार भी छीना जा रहा है. जब राज्य सरकार का ये कहना है कि 4 वैकल्पिक मार्ग बनेंगे तो ये अच्छी बात है लेकिन जब तक वैकल्पिक मार्ग नहीं बनते हैं तक तक ये सड़क सरकार को खुलवानी चाहिए और जब वैकल्पिक मार्ग बन जाए तो सरकार इस सड़क को बंद भी करा सकती है.

किसी वैकल्पिक मार्ग नहीं रहने और मौजूदा रास्ते की स्थिति जर्जर होने के कारण अभी तक 5 ग्रामीणों की मौत हुई और अनेक बच्चों की पढ़ाई भी छूट गयी है.

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Amir Abbas

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