(उषा एयर से मंगाया गया ऑक्सीजन सिलिंडर)

आखिर किन कारणों से बिहार NITI AAYOG की रिपोर्ट में हेल्थ सेक्टर में रहा फिसड्डी?

NITI AAYOG ने स्वास्थ्य विभाग पर एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में बिहार के अस्पतालों की हालत सबसे ख़राब है. इस रिपोर्ट को स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय और WHO (World Health Organization), इंडिया ने मिल कर तैयार किया है. NITI AAYOG की रिपोर्ट के अनुसार भारत में जिला अस्पतालों में प्रति एक लाख आबादी पर औसतन 24 बेड हैं और बिहार में ये आंकड़ा केवल 6 बेड का है.

डेमोक्रेटिक चरखा ने कोरोना के पहले और दूसरे वेव के दौरान कई जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की रिपोर्टिंग की थी जिसमें बिहार के स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति चरमराई दिखाई दे रही थी. हालांकि अब NITI AAYOG की रिपोर्ट से ये बात स्पष्ट हो चुकी है.

(डॉक्टर नहीं रहने के कारण एम्बुलेंस में पड़े मरीज़)

NITI AAYOG ने अपनी रिपोर्सट में जिस चरमराई व्यवस्था की बात की है उसे समझने के लिए हमें बिहार का स्वास्थ्य बजट समझना होगा. बिहार के स्वास्थ्य बजट में इस बार 13,264 (तेरह हज़ार दो सौ चौसठ करोड़) रूपए ख़र्च किये जा रहे हैं. ये राशि पिछले साल से 21.28% अधिक है. पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (PMCH) को विश्वस्तरीय बनाने के लिए 5540.07 (पांच हज़ार पांच सौ चालीस) करोड़ रूपए ख़र्च हो रहे हैं. बिहार की राजधानी पटना में पूरे बिहार के स्वास्थ्य बजट का 45% हिस्सा ख़र्च किया जा रहा है. स्वास्थ्य बजट अधिक होने के बाद भी इसका अधिकांश हिस्सा पटना ने ‘मेडिकल बिल्डिंग’ बनाने में ख़र्च किया जा रहा है. पटना के पीएमसीएच में मूलभूत सुविधाओं की कमी अस्पताल परिसर में दाख़िल होते ही दिखाई देने लगती है.

छपरा (सारण) के 25 किलोमीटर दूर बस्ती जलाल पंचायत में सनी पांडे की शादी 28 मई, 2021 को हुई. 29 मई, 2021 को उनकी तबियत थोड़ी ख़राब लगी तो उन्होंने डॉक्टर से फ़ोन पर सलाह ली. लेकिन लगातार तबियत बिगड़ने के कारण उनके परिजन बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच (PMCH), पटना लेकर आते हैं और उन्हें यहीं भर्ती कर लिया जाता है. जांच में पता चलता है कि उन्हें कोरोना है. 9 मई को उनकी मौत हो जाती है. परिजन का आरोप है कि पीएमसीएच में ना ही ऑक्सीजन की सही से व्यवस्था की गयी है और ना ही डॉक्टर्स सही समय पर आते हैं. जब डेड बॉडी सौंपने के समय परिजनों ने मौत का कारण ‘सरकारी बदइन्तेज़मी’ लिखना चाहा तो मौजूद डॉक्टर ने परिजन के हाथ से कागज़ ही छीन लिया.

(सनी पांडे की पत्नी)

एक जिला अस्पताल पहुंचने से पहले कोई भी व्यक्ति लोकल लेवल पर भी अपना इलाज करवा सकते हैं. सरकार ने इसके लिए प्राथमिक उप-स्वास्थ्य केंद्र (5 हज़ार की आबादी पर होना चाहिए. साथ ही कम से कम दो मेडिकल स्टाफ़), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (30 हज़ार की आबादी पर होना चाहिए), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (80 हज़ार की आबादी पर एक) और इसके बाद जिला अस्पताल आता है. बिहार के बेगूसराय के भगवानपुर प्रखंड के जयरामपुर गांव में एक प्राथमिक उप- स्वास्थ्य केंद्र स्थापित है. प्राथमिक उप-स्वास्थ्य केंद्र हर 5 हज़ार की आबादी पर स्थापित होता है और यहां कम से कम दो मेडिकल स्टाफ़ होने चाहिए. उप-स्वास्थ्य केंद्र के खुलने का समय सुबह 8 बजे से होता है. डॉक्टर को गांव भ्रमण पर भी जाना होता है ताकि गांव वालों का इलाज और स्वच्छता के बारे में बता सकें.

इस प्राथमिक उप-स्वास्थ्य केंद्र में डॉ. दिलीप की नियुक्ति है और यहां मीनाक्षी कुमारी और कुमकुम सिन्हा ए.एन.एम के पद पर नियुक्त हैं. प्राथमिक उप-स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर और ए.एन.एम रहना तो दूर की बात हैं यहां पर उप-स्वास्थ्य केंद्र खुलता भी नहीं है. वहां जब हमारे ग्रामीण पत्रकार गुलशन पहुंचें तो उन्हें दरवाज़े पर ताले लटके दिखाई दिए.

(अस्पताल में लगे ताले)

उप-स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में गाय-भैंस बांधने का सामान, चारा, गाय की नादी और गाय का चारा काटने की मशीन रखी हुई थी. गुलशन ने गांव के लोगों से बात-चीत की और गांव वालों ने बताया कि इस उप-स्वास्थय केंद्र में कभी भी डॉक्टर नहीं आते हैं, ए.एन.एम हफ्ते में एक दिन ही आती हैं. इस इलाके में 10 किलोमीटर तक कोई दूसरा सरकारी अस्पताल नहीं है. इस वजह से 1 महीने पहले रुखसार खातून अपनी जान गंवा चुकी हैं. रुखसार खातून अपने पिता लाल मोहम्मद के घर अपनी पहली डेलिवरी के लिए आई थी. जब अचानक उनको प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) हुई जिसके बाद वो उप-स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे. लेकिन डॉक्टर नहीं होने की वजह से उन्हें दूसरे जगह जाना पड़ा और रास्ते में उनकी मौत हो गयी. साथ ही जो अस्पताल में बांटने के लिए दवाई रखी गयी हैं वो भी एक्सपायरी हैं.

एक्सपायरी दवा
(एक्सपायरी दवाएं दिखाते ग्रामीण)

स्वास्थ्य व्यवस्था की ये स्थिति होने की एक और वजह है डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की कमी. बिहार में डॉक्टर की कमी कोई नया मुद्दा नहीं है. 16 मई 2020 में बिहार सरकार ने पटना हाईकोर्ट में एक शपथ पत्र दिया जिसके अनुसार बिहार में 11645 पदों में से केवल 2877 पदों पर ही बहाली हुई है. यानी 8768 पद अभी भी ख़ाली पड़े हुए हैं. 5674 पद सिर्फ़ ग्रामीण इलाकों में ख़ाली हैं. इसका मतलब ये है कि बिहार सरकार की नज़रों में ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था दुरुस्त करने की कोई इच्छा ही नहीं है. बिहार में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी कोई नयी बात नहीं है लेकिन जिस हिसाब से इसके कारण लोगों की ज़िन्दगी पर असर होता है वो काफ़ी चिंताजनक है. मसलन, बेगूसराय में 292 स्वास्थ्य उपकेन्द्र कार्यरत हैं, हालांकि आबादी के हिसाब से बेगूसराय में कम से कम 558 स्वास्थ्य उपकेन्द्र होने चाहिए. हर स्वास्थ्य उपकेन्द्र में कम से कम दो ए.एन.एम. (ANM) यानी Auxiliary Nursing Midwifery होने चाहिए जो मातृत्व स्वास्थ्य का ध्यान रख सकें, साथ ही प्रजनन और टीकाकरण का काम कर सकें. 292 स्वास्थ्य उपकेन्द्र के हिसाब से ANM की संख्या 584 होनी चाहिए लेकिन बेगूसराय में ANM की संख्या सिर्फ़ 230 है. 

इस पर बात करते हुए जन स्वास्थ्य अभियान के संचालक और पॉलीक्लीनिक के चिकित्सक डॉ. शकील का कहना है कि

सबसे पहले तो स्वास्थ्य उपकेन्द्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संख्या में काफ़ी कम है. तो वैसे ही लोगों की पहुंच कम हो गयी है. जो हैं भी वहां पर जो ज़रूरी मशीन होने चाहिए या स्वास्थ्यकर्मी, डॉक्टर, फार्मासिस्ट, रेडियोग्राफर होने चाहिए वो मौजूद ही नहीं हैं. एम्बुलेंस की काफ़ी कमी है अगर मरीज़ की स्थिति गंभीर हो जाए और उसे स्वास्थ्य उपकेन्द्र से कहीं दूसरे अस्पताल ले जाना है तो उसकी कोई सुविधा ही नहीं है.

बिहार के स्वास्थ्य व्यवस्था की चरमरायी स्थिति की एक मुख्य वजह रही, अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (APHCs) को बंद करना. बिहार सरकार ने अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य को कोरोना की दूसरी लहर के दौरान खोलने का आदेश दिया लेकिन ज़मीन पर ये आदेश भी सही से लागू नहीं हो सका. बेगूसराय जिले के लखनपट्टी में एक अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था. ये बेगूसराय का दूसरा सबसे बड़ा अस्पताल था लेकिन लगतार बंद रहने और उदासीन रवैया के कारण इसका अस्तित्व भी समाप्त हो चुका है. बेगूसराय में डेमोक्रेटिक चरखा के ग्रामीण पत्रकार करण पासवान लखनपट्टी के अतिरिक्त स्वास्थ्य उपकेन्द्र पहुंच कर स्थिति देखी तो वहां पर ना ही दवाएं मौजूद थी और ना ही कोई नर्सिंग स्टाफ.

बिहार में कोरोना के दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की काफ़ी किल्लत रही. बिहार में ऑक्सीजन सिलिंडर में रिफिल के लिए सिर्फ़ 11 ऑक्सीजन प्लांट हैं जो एक दिन में सिर्फ़ 9950 लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन सिलिंडर की सप्लाई कर सकते थे. 22 अप्रैल, 2021 को बिहार में 157.67 मेट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत सिर्फ़ ऑक्सीजन बेड्स में थी.

इसके अलावा ICU में 12.42 मेट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत थी. केंद्र के तरफ़ से बिहार को 194 मेट्रिक टन ऑक्सीजन का कोटा दिया गया था लेकिन 22 अप्रैल को केंद्र के तरफ़ से सिर्फ़ 72 टन ऑक्सीजन ही मुहैय्या करवाया गया. उसके बाद से ये आंकड़ा घट कर सिर्फ़ 60 टन ऑक्सीजन पर ही आ गया है.  एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने सरकार से ऑक्सीजन की किल्लत पर जवाब मांगा था. जस्टिस चक्रधारी सरन सिंह ने टिप्पणी की थी

There is requirement of continuous supply of oxygen for treatment of COVID patients and failure to procure the amount allocated by the Government of India is a serious lapse having perilous consequences of grave nature hugely affecting the healthcare system to meet the challenge.

(हिंदी अनुवाद- कोविड रोगियों के उपचार के लिए ऑक्सीजन की निरंतर आपूर्ति की आवश्यकता है और भारत सरकार द्वारा आवंटित राशि से ख़रीद में हुई विफलता एक गंभीर चूक है. इससे स्वास्थ्य प्रणाली पर काफ़ी ज़्यादा असर डाल रही है.)

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान चेरिया बेरियारपुर के ग्रामीणों ने ‘अस्पताल नहीं तो वोट नहीं’ आंदोलन शुरू किया और चुनावों का बहिष्कार किया. इस विधानसभा में आंदोलन के कारण वोटिंग पोल भी कम हुआ लेकिन आज तक इस विधानसभा में एक अस्पताल का प्रस्ताव पास नहीं हुआ है. बिहार सरकार ने नए अस्पताल बनाने और बने हुए अस्पतालों के रख-रखाव पर कोई भी ठोस काम नहीं किया है. पटना से लगभग 40 किलोमीटर दूर बिक्रम के इलाके में एक ट्रामा सेंटर बनाया गया. इस ट्रामा सेंटर को बने लगभग 16 साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक ये सेंटर शुरू नहीं किया गया है.

जिला हॉस्पिटल में पहुंचने से पहले मरीज़ों के पास इलाज के लिए कई अस्पताल होते हैं. इनमें स्वास्थ्य उपकेन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. अगर इन अस्पतालों की स्थिति अच्छी रहेगी तो जिला अस्पतालों पर बोझ कम होगा. लेकिन इन अस्पतालों की स्थिति काफ़ी ख़राब है और सरकार का इन अस्पतालों की ओर NITI AAYOG की रिपोर्ट के बाद भी कोई ख़ास ध्यान नहीं गया है.

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Amir Abbas

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