बिहार में क्यों कम हो रही है चीनी मिल और गन्ना किसानों के जीवन की मिठास?

मीठा खाना और मीठा बोलना किसे पसंद नहीं होता है. लेकिन यही मिठास बिहार के किसानों के लिए कड़वी होते जा रही है. बिहार में एक समय में 33 चीनी मिल हुआ करती थी और पूरे देश की 40% चीनी उत्पादन बिहार में होती थी. लेकिन आज के समय में इसकी संख्या घट कर ढाई से तीन प्रतिशत के बीच हो गयी है. इसकी वजह से गन्ना किसानों की स्थिति भी दयनीय हो चुकी है.

बिहार के गोपालगंज में गन्ने की खेती काफ़ी होती है. चीनी मिल भी मौजूद है. लेकिन अभी के समय में चीनी मिल बंद होते जा रहे हैं.


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ठीक यही स्थिति सीवान के चीनी मिलों की हो चुकी है. एक समय में सीवान में सबसे बड़े चीनी मिल हरदिया मोड़, पचरुखी और पक्वलिया में थे. लेकिन आज इन चीनी मिलों की ईंट भी मौजूद नहीं है. सीवान से डेमोक्रेटिक चरखा के पत्रकार फ़हीम खान बताते हैं

(हरदिया मोड़ की चीनी मिल अब जर्जर हो चुकी है. फोटो-फ़हीम खान)

दरअसल चीनी मिलों को बंद करने का मकसद कारखाने की ज़मीन को हथियाना था. पचरुखी चीनी मिल की ज़मीन को बड़हरिया के पूर्व विधायक श्याम बहादुर सिंह ने अपने सामने ही बेचवाया था. अब आज के समय में स्थिति ये हो गयी है कि पूरे सीवान में कोई भी किसान गन्ने की खेती नहीं कर रहा है. गोपालगंज में जो गन्ने की खेती हो रही है लेकिन उसे भी ख़रीददार नहीं मिल रहे हैं. वहां की चीनी मिल भी घाटे में चल रही है. सीवान और गोपालगंज के किसानों को अब गन्ने बेचने के लिए कुशीनगर जाना पड़ता है.

2016 में नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस यानी एनएसएसओ ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किसानों की औसत मासिक आय 6,426 रुपये है और सालाना 77,112 रुपये. ये आंकड़ा जुलाई 2012-जून 2013 के बीच का है.

नाबार्ड ने भी 2016-2017 की अपनी सर्वे रिपोर्ट में बताया कि किसानों की औसत मासिक आय 8,931 रुपये है. बिहार की 77% आबादी कृषि के क्षेत्र से जुडी हुई है. बिहार की जीडीपी में भी कृषि क्षेत्र का योगदान 18% का है. लेकिन इसके ग्रोथ में काफ़ी गिरावट देखने को मिल रही है. साल 2005-10 के बीच में ये ग्रोथ रेट 5.4% का था, उसके बाद ये घट कर 3.7% तक आया और अब ये 1-2% तक आ चुका है. बिहार में कृषि योग्य भूमि लगभग 53.95 लाख हेक्टेयर है, जिसमें गन्ने की खेती लगभग 2.70 लाख हेक्टेयर में होती है.

(ग्रोथ में हुई गिरावट)

गन्ना किसानों की एक बड़ी समस्या है कि उन्हें समय पर मिल मालिकों की तरफ़ से पैसे नहीं मिलते हैं और इसकी वजह से उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब रहती है. बिहार के कई किसानों ने अच्छे दाम मिलने की वजह से यूपी में गन्ना बेचना शुरू कर दिया. लेकिन वहां भी किसानों को समय पर पैसे नहीं मिलते हैं. प्रतापपुर चीनी मिल (उत्तर प्रदेश) पर बिहार के गन्ना किसानों का 4.71 करोड़ रुपये बकाया है. इसी तरह हाटा चीनी मिल पर भी किसानों का करीब 75 लाख रुपये बकाया है. यूपी की दोनों चीनी मिलों की तुलना में बिहार की नौ चीनी मिलों ने गन्ना किसानों का 87 प्रतिशत से अधिक भुगतान कर दिया है. बिहार में सबसे कम यानी 55 प्रतिशत भुगतान करने वाली लौरिया की चीनी मिल है. वहीं, सर्वाधिक 91 प्रतिशत भुगतान करने वाली बगहा की चीनी मिल है. अभी तक 90 करोड़ रुपये का भुगतान चीनी मिलों ने कर दिया है. वहीं, अभी 13 करोड़ रुपये किसानों का चीनी मिलों पर बकाया है.

रामेश्वर साहू गोपालगंज के एक गन्ना उत्पादक हैं. उनका प्रतापपुर के चीनी मिल पर 5 लाख रूपए बकाया है. परिणाम स्वरुप पैसों के अभाव में उन्हें महाजन से सूद पर पैसे लेने पड़े हैं. रामेश्वर साहू डेमोक्रेटिक चरखा को बताते हैं-

अभी मेरे पास 5 लाख होते लेकिन चीनी मिल ने मेरे पैसे 2 सालों से नहीं दिए हैं. इस वजह से मेरे घर में खाने को भी कुछ नहीं बचा है. हम सूद पर महाजन से पैसा उधार लेकर किसी तरह अपना घर चला रहे हैं. चीनी मिल से पूछो तो वो कहते हैं कि हम घाटे में चल रहे हैं. सरकार भी इस मामले में दख़ल नहीं दे रही है.

चीनी मिल पर इतना बकाया राशि क्यों है ये समझने के लिए डेमोक्रेटिक चरखा की टीम ने कई चीनी मिल के मालिकों से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने अलग-अलग कारणों से बात से इनकार कर दिया. लेकिन चीनी मिल किसानों के भगतान में इतना समय क्यों लगा रहा है? इसका कारण बताते हुए एक और गन्ना किसान अशोक बताते हैं कि

हमारे बाबूजी (पिता) बताते हैं कि गोपालगंज में एक समय में कई चीनी मिल हुआ करते थे. लेकिन कई मिल अब बंद हो चुके हैं. 1 साल पहले एक बड़ा चीनी मिल सासामुसा मिल भी बंद हो चुका है.

गन्ना उद्योग विभाग के मंत्री प्रमोद कुमार ने डेमोक्रेटिक चरखा को जानकारी देते हुए कहा कि

किपेराई सत्र 2020-21 में चीनी रिकवरी 10.04 प्रतिशत एवं बुआई क्षेत्र 02.70 लाख हेक्टर है. वर्ष 2021-22 में चीनी रिकवरी 10.50 प्रतिशत एवं बुआई क्षेत्र 03.00 लाख हेक्टेयर अनुमानित है. अच्छे और औसत प्रकार के गन्ने पर 20 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बढ़ोतरी की गई है. अच्छे क्वालिटी के गन्नो का मूल्य 335 रुपये प्रति क्विंटल और औसत प्रकार का मूल्य 315 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है. निम्न प्रकार पर भी 13 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बढ़ोतरी हुई है. इसकी दर 285 रुपये प्रति क्विंटल रखी गयी है.

(चीनी मिल की चमनी)

सरकार के इन तमाम दावों के बाद भी किसानों तक इन योजनाओं का लाभ पहुंच ही नहीं रहा है. इस वजह से पूर्वी चंपारण के किसानों ने 20 बीघे में अपने गन्ने की खेती को आग लगा दिया. एक समय में पूर्वी चंपारण में तीन सक्रिय चीनी मिल मौजूद थी लेकिन धीरे-धीरे ये सभी निष्क्रिय हो चुकी है. पिछले साल 2021 में सुगौली चीनी मिल में 31 लाख क्विंटल गन्ना पेराई का लक्ष्य निर्धारित हुआ था. लेकिन ये पेराई का लक्ष्य कभी पूरा ही नहीं हो सका. इसके वजह से कई किसानों की फसल पूरे तरह से खराब हो गयी.

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Amir Abbas

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