16 साल की लड़की से ‘गैंगरेप’ और हत्या का सच और नेशनल मीडिया क्यों है बेखबर?

दिल्ली के निर्भया का दर्द सबको पता चल जाता है। लेकिन छोटे शहर की लड़कियों की घुटन दिल्ली तक नहीं पहुंच पाता है। सिर्फ कटिहार नहीं बल्कि बिहार के प्रत्येक शहर में पीड़िता के लिए आवाज उठा। लेकिन एक भी सेलिब्रिटी या बड़े लोगों के द्वारा कोई पोस्ट सोशल मीडिया पर नहीं किया गया। पीड़िता को न्याय भी नहीं मिला और हमारा आंदोलन भी मर गया।

एलएन मिश्रा इंस्टिट्यूट पटना में पढ़ रहें रेहान खान बताते है। रेहान भी 30 मई को कॉमरेड अनंत कुमार शाश्वत के अगवाई में हो रहे कैंडल मार्च में शरीक होकर कटिहार में हुए दरिंदगी का विरोध किया था।

भारत की राजधानी दिल्ली से 1400 किलोमीटर दूर बिहार के छोटे से शहर कटिहार में 16 साल की छात्रा को अगवा किया, फिर गैंगरेप किया और उसके बाद हत्या कर दी। बिहार के प्रत्येक शहर में उसके लिए इंसाफ की मांग की जा रही है। लेकिन किसी भी बड़े मीडिया चैनल में इसकी कोई खबर भी नहीं है।

आजमनगर थाना अंतर्गत पीड़िता के गाँव नया टोला पस्तिया की सलमा (काल्पनिक नाम) 24 तारीख की शाम किराना सामान लेने घर के बगल वाली दुकान पर गई थी। फिर घर ही नहीं लौटीं। 26 मई के दिन नाबालिग का शव उसी गांव के पड़ोसी के घर से बरामद किया गया। वह पड़ोसी का घर सलमा की दोस्त नीतू का घर था। एफ आई आर के मुताबिक स्थानीय बघौरा पंचायत के मुखिया ललन विश्वास उर्फ़ लबानु के भाई कुसुम लाल विश्वास को मुख्य आरोपित बताते हुए उसपर अपरहण, गैंगरेप और हत्या के संगीन आरोप लगाये।

सलमा के पिता रहमान के मुताबिक पीड़िता को उसके गांव मुखिया ललन विश्वास उर्फ़ लबानु के भाई कुसुम लाल विश्वास ने बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया और पहले उसके साथ दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया और फिर गुनाह पर पर्दा डालने के लिए पीड़िता की गला दबाकर हत्या कर दी। रहमान की दो लड़कों में सलमा इकलौती बेटी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,पीड़िता और मुख्य आरोपी कुसुम लाल विश्वास एक-दूसरे को जानते थें। 26 अप्रैल 2022 से 23 मई 2022 के बीच शहज़ादी के नंबर से कुसुम के नंबर पर कई बार संपर्क किया गया था। साथ ही दोनों के परिवारों के बीच भी अच्छा संबंध था। कुसुम की बीवी हाल ही में वार्ड नंबर 7 से आंगनवाड़ी सेविका बनी थी और शहज़ादी की माँ पिछले 15 साल से वार्ड नंबर 6 में आंगनवाड़ी सेविका है।

पुलिस के अनुसार, मौत का कारण ‘फांसी के कारण दम घुटने’ था। इस बात की जानकारी कटिहार के पुलिस अधीक्षक (एसपी) जितेंद्र कुमार ने भी स्थानीय पत्रकार को दिया था। जिसके बाद परिवार के द्वारा भागलपुर में पीड़िता के दूसरे शव परीक्षण की मांग की थी। शहजादी के परिवार के मुताबिक पुलिस प्रशासन मामले को दबाने की कोशिश में इस जघन्य अपराध को हत्या नहीं, बल्कि आत्महत्या बता रहे हैं।

इंसाफ की लो शहर दर शहर जल ही रहीं थीं, कि प्रशासन के द्वारा मृत लड़की के मां, बाप, भाई और मामा समेत स्थानीय जिला परिषद, जन क्रांति के नेता, एक शिक्षक नेता, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव, सीमांचल संघर्ष मोर्चा के नेता और अन्य लोगों पर एफआईआर में इंडियन पीनल कोड की संगीन धाराएं लगाई गई हैं। कटिहार के स्थानीय वकील कुणाल झा फोन पर बताते हैं कि, “इस मुक़दमा में 53 लोगों पर नाम के साथ FIR किया गया है और 300-400 लोग अज्ञात बताया गया है।”

उस दिन आखिर हुआ क्या था कि 350 लोगों पर केस दर्ज करना पड़ा। स्थानीय पत्रकार शैलेश बताते हैं कि,

27 मई को पीड़िता के लाश को सड़क पर रखकर दोबारा पोस्टमार्टम की मांग करते हुए प्रदर्शन किया गया था। जिसमें 8 घंटे तक सड़क जाम रहा। फिर देर शाम डीएसपी प्रेमनाथ जगह पर पहुंचकर दोबारा पोस्टमार्टम करवाने का आश्वासन दिया। जिसके बाद प्रदर्शन को समाप्त कर दिया गया था। लेकिन इसी बीच कुछ लड़कों की टोली सालमारी ओ.पी. की तरफ बढ़ी और वहां पुलिस की गाड़ियों पर हमला कर गाड़ी के शीशे तोड़ दिए।

प्राथमिकी में शामिल नाम शाह फैसल बताते है

कुछ लोगों से गलती हुई है। इसके लिए पूरे निर्दोष को क्यों घसीटा जा रहा है। फुटेज से हमलावरों की पहचान कर उनपर कार्रवाई करे लेकिन कॉलेज चौक में बैठे प्रदर्शनकारियों का नाम एफआईआर से हटाया जाए।

कांग्रेस के नेता तौकीर आलम डेमोक्रेटिक चरखा को बताते हैं कि

कटिहार जिले के आज़मनगर थाना, सलमारी ओ.पी. द्वारा अपनी नाकामी और कमजोरी को छुपाने के लिए माहेनूर के हक़-इंसाफ की लड़ाई लड़ने वालों पर झूठा मुकदमा दर्ज कर दिया। क्या शांतिपूर्ण तरीके से इंसाफ मांगना जुर्म है ? अगर ये जुर्म है तो प्रशासन याद रखे ये एक बार नहीं हजार बार हमलोग जुर्म करते रहेंगे।

इन लोगों पर प्रशासन के द्वारा इन तमाम धाराएं को लगाया गया है।
147, 148, 149:- दंगा भड़काना।
341, 342:- किसी व्यक्ति के कार्य में बाधा डालना।
323:- जानबूझकर चोट पहुँचाना।
332:- सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालना।
333:- सरकारी कर्मचारी पर हमला करना या जानबूझकर चोट पहुँचाना।
352, 353:- हमला या आपराधिक बल का प्रयोग।
307:- हत्या का प्रयास।
427:- सरकारी सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाना।
188:- महामारी क़ानून का उल्लंघन।

इस कहानी की अंजाम जो भी हो लेकिन प्रकृति ने स्त्री को कितना खूबसूरत वरदान दिया है, जन्म देने का, लेकिन बलात्कार पी‍ड़‍िताओं के लिए यही वरदान अभिशाप बनकर उनकी सारी जिंदगी को डस लेता है। 

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Rahul Jha

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