क्या 90% कोरोना मृतक के परिजन को बिहार में मुआवजा मिल चुका है?

केस 1:- गोपालगंज जिले के सदर ब्लॉक के गौसिया गांव के निवासी सुरेंद्र त्रिपाठी की तबियत पिछले साल अप्रैल माह में खराब हुई। लक्षण कोरोना के थे। परिवार के लोगों ने सबसे पहले इलाज कराने के लिए नवीन रंजन श्रीवास्तव से संपर्क किया। नवीन उनको अपने एनजीओ संचालित एंबुलेंस से लेकर अस्प्ताल लेकर गए। जहां इलाज के क्रम में चार दिन बाद उनकी मौत हो गई। डॉक्टर और अस्पताल ने कोरोना की जांच नहीं की। हालांकि उस समय बिना जांच किए भर्ती लेना मना था। आज भी सुरेंद्र त्रिपाठी के परिवार वालों को इस बात की जानकारी नहीं है कि कोविड से मरने पर सरकार द्वारा अनुग्रह मुआवजा मिलता है।

(सुरेंद्र त्रिपाठी)

केस 2:- कलीमा ख़ातून की मौत बेतिया (पश्चिम चंपारण) के राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय सह अस्पताल में कोरोना से मृत्यु हुई। RT-PCR में रिपोर्ट नेगेटिव आई थी लेकिन CT-Scan में रिपोर्ट पॉजिटिव आई। 14 मई 2021 को उनकी मृत्यु इलाज के दौरान हुई। लेकिन आज तक उन्हें उनका मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिला है। कलीमा ख़ातून के बेटे अफसर अली ने बताया कि

जिस दिन मां की मौत हुई उस दिन हमें कुछ समझ में नहीं आया कि उनका मृत्यु प्रमाण पत्र भी लेना है. लेकिन दो दिन बाद जब हॉस्पिटल में अप्लाई करने गए तो बड़ा बाबू, उदय कुमार, ने मृत्यु प्रमाण पत्र देने से साफ़ इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि मृत्यु प्रमाण पत्र बनायेंगे तो वो सिर्फ़ नॉर्मल डेथ का बनायेंगे. 

(कलीमा खातून की रिपोर्ट)

केस 3:- गोपालगंज जिले के ही कुचायकोट ब्लॉक के बेदुआ गांव के निवासी राघव शरण प्रसाद पिछले साल कोरोना की लहर के चपेट में आ गए। सांस लेने में तकलीफ सामने आई। उनको भी इलाज के लिए पहले अस्पताल में एडमिट कराया गया। जहां दो-तीन दिन के इलाज के बाद उनकी मौत हो गई। आज तक इन्हें कोरोना से हुई मौत पर मुआवजा नहीं मिला है।

पिछले दो सालों से कोरोना के कारण पूरी दुनिया अस्त व्यस्त हो चुकी है। दुनिया भर में लाखों करोड़ों लोगों पर कोरोना ने सीधा असर डाला। अपने देश में भी इससे बड़े पैमाने पर जानमाल की हानि हुई। सबसे अहम यह कि सरकारी स्तर पर यह भी घोषणा की गई थी कि कोरोना के कारण असमय मृत्यु का शिकार बने लोगों को बीमा का लाभ मिलेगा। जोर-शोर से इस बात का प्रचार प्रसार किया गया। लेकिन तस्वीर से इतर कितने लोगों की जान गई और कितनों को बीमा के लाभ के तहत मुआवजा मिला, यह स्पष्ट तस्वीर किसी के पास नहीं है। कोरोना की दूसरी लहर में बिहार में बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु के साथ ही फ्रंट पर इस बीमारी से लड़ रहे डॉक्टरों की मौत हुई लेकिन इनमें से कितने डॉक्टरों के परिजनों को बीमा का मुआवजा मिला, यह अभी भी प्रश्न बना हुआ है।
राज्य सरकार की माने तो कोरोना काल में मरे हुए लोगों को सरकार की तरफ से पूरी तरह से सहायता की गई तथा मृतकों के आश्रितों को सरकार द्वारा जारी घोषणा के अनुरूप अनुदान दिया गया। राज्य सरकार की घोषणा के अनुसार हजारों ऐसे लोगों के आश्रितों को कोविड अनुग्रह अनुदान दिया गया है। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने कुछ दिन ही पहले विधानसभा में प्रश्नोत्तर काल में यह जानकारी दिया कि सूबे में अब तक 12,858 कोविड 19 संक्रमण से मौत की जानकारी मिली थी, जिसमें 11,625 मृतकों के मामले में अनुग्रह अनुदान के लिए आवेदन सरकार को प्राप्त हुए थे। इनमें 11,133 आश्रितों को चार लाख रूपये की दर से भुगतान किया जा चुका है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि 10,909 कोरोना मृतकों के आश्रितों को केंद्र सरकार द्वारा घोषणा के अनुसार 50 हजार रूपये की दर से भुगतान किया जा चुका है।

(विधानसभा में आंकड़े देते स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे)

पूरे कोविड काल में अपने एनजीओ शताक्षी सेवा संस्थान के माध्यम से मदद करने वाले मानिकपुर गांव के नवीन रंजन श्रीवास्तव कहते हैं,

कई ऐसे लोग हैं जिनकी मौत कोविड के कारण हो गयी थी लेकिन जानकारी या अभाव या फिर लोगों व समाज के डर के कारण उन्होंने आज तक कोविड के अनुदान के लिए आवेदन नहीं किया। जब कोविड अपने चरम पर था तब इससे संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई। हर तरफ लोग बस पहले चाहे जैसे भी इलाज हो यही सोचते थे। मरीजों की संख्या में जब बढोत्तरी होने लगी तो लोग टेस्ट की तरफ कम ध्यान देकर इलाज की तरफ भागने लगे।

(शताक्षी सेवा संस्थान मुफ्त एम्बुलेंस की सेवा देने का काम करती है)


नवीन बताते हैं, दरअसल कोविड का टेस्ट नहीं कराने का एक कारण समाज व आसपास के लोगों में व्याप्त दहशत भी थी। वह कहते हैं, उनके संज्ञान में ऐसे कई लोग हैं, जिनकी मौत कोविड के कारण हो गई थी लेकिन उन्होंने टेस्ट केवल इसलिए नहीं कराया कि आसपास या फिर समाज में लोग उनसे दूरी बना लेंगे।

कोरोना काल में राज्य सरकार के आदेश पर निजी क्लीनिकों को भी कोविड सेंटर खोलने को कहा गया था लेकिन जो डॉक्टर निजी क्लीनिकों में मरीजों के इलाज के दौरान कोरोना संक्रमित होकर असमय इस दुनिया को छोड़ गये, उनके परिजनों को मुआवजा देने का शायद कोई प्रावधान नहीं है। जैसे सामान्य व्यक्ति को चार लाख रूपये मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है, उसी प्रकार इन्हें भी सामान्य श्रेणी में रखा गया था।


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ग्रामीण इलाकों में सरकारी आंकड़ें फिर से धोखा खा जाते हैं। गांव में कई लोगों की मौत कोरोना के लक्षणों से हो रही है जिन्हें सरकार कोरोना गिन भी नहीं रही है। सीवान के अत्खम्बा गांव में सुगरा ख़ातून की मौत फेफड़े के इन्फेक्शन से हुई। घर पर इलाज भी कोरोना का हुआ, 4 दिन ऑक्सीजन में रहने के बाद उनकी मौत हो गयी। वारिस अहमद को बुखार और खांसी थी, पांच दिन ऑक्सीजन में रहने के बाद उनकी मौत हो गयी। अरशद अहमद को बुखार था और सांस लेने में काफ़ी तकलीफ़ थी, हॉस्पिटल ले जाने के दौरान में उनकी मौत हो गयी। आसमा ख़ातून को दो दिन बुखार रहा फिर उन्हें सांस लेने में तकलीफ़ हुई, डॉक्टर के पास ले जाने के दौरान उनकी मौत हो गयी। ये सभी घटनाएं सीवान के एक ही गांव की है। लेकिन सरकार के प्रोटोकॉल के अनुसार जिनके पास कोरोना पॉजिटिव होने की रिपोर्ट है उन्हें ही कोरोना से हुई मौत मानी जायेगी।

इस मामले पर सरकार का पक्ष जानने के लिए डेमोक्रेटिक चरखा की टीम ने स्वास्थ्य स्वास्थ्य मंत्रालय से बात किया लेकिन मंत्रालय की ओर से ये साफ कर दिया गया है कि वो जो आंकड़ें विधानसभा में रखे गए हैं वो सही हैं और आगे इसपर मीडिया में कोई बयान नहीं दिया जाएगा।

सरकार जहां से दावा कर रही है कि उसने अधिकांश लोगों को मुआवजा दिया है तस्वीर उससे थोड़ी अलग नजर आती है।

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