बिहार की हवा हो रही है खराब, वायु प्रदूषण से सांस के मरीजों की संख्या बढ़ी

सांस के रोगियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है और उनके पास ऐसे आने वाले मरीजों की संख्या में करीब 60 से 65 प्रतिशत मरीज बढ गए हैं। जिन्हें विभिन्न प्रकार के एलर्जी की शिकायत है। वह कहते हैं यह सब वायू प्रदूषण के कारण है। इसके अलावा बालों का झडना, रूखापन के मरीज भी बढ रहे हैं।

डॉक्टर राणा

दुनिया में किसी भी जीव के लिए सबसे जरूरी है सांस लेना। लेकिन जीवन के सबसे अहम जरूरतों में शुमार होने वाली सांसे, कम से कम बिहार के लिए जरूरत के साथ ही खतरनाक बन रही हैं। यह बातें खुद सरकार के आंकड़ों में सामने आ रही हैं। बिहार के कई शहर देश के उन प्रदूषित शहरों में शामिल हो गए हैं, जहां पर सांसे जीवन कम, मौत के ज्यादा नजदीक लेकर जा रही हैं।


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राज्य में अगर प्रदूषण के बदलते मिजाज पर नजर डाले तो सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे सूबे में वायू प्रदूषण का लेवल खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। जनवरी माह में राज्य के जितने भी शहर थे, उन सब में वायु प्रदूषण का लेवल अत्यंत खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था। जनवरी माह में छपरा की हवा देश की राजधानी दिल्ली से ज्यादा प्रदूषित मिली। तीन जनवरी को दिल्ली की एक्यूआई (Air Quality Index) जहां 387 थी वहीं छपरा की एक्यूआई 390 रहा। इसी प्रकार गया का एक्यूआई उत्तर प्रदेश के हापुड़ शहर से ज्यादा रहा। इस दिन गया का एक्यूआई जहां 357 रहा वहीं हापुड़ का एक्यूआई 321 रहा। प्रदूषण के इस खतरनाक स्तर से लोगों में कई बीमारियां विशेष रूप से सांस लेने की बीमारी ज्यादा देखने को मिली।

(खुले में कूड़ा जलाने की वजह से प्रदूषण काफी बढ़ रहा है)

प्रदूषण के क्षेत्र में पिछले बीस सालों से रिसर्च और कार्य कर रहे प्रोफेसर प्रधान पार्थसारथी कहते हैं, सूबे का प्राकृतिक रूप से लोकेट होना भी प्रदूषण का एक मुख्य कारण है। प्रो. पार्थसारथी सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार के स्कूल और अर्थ, बायोलॉजिकल एंड इनवायरमेंटल साइंस के डीन सह इंडियन मेट्रोलॉजिकल सोसाइटी के बिहार चैप्टर के प्रेसिडेंट सह बिहार स्टेट ऑफ एक्शन प्लान ऑफ क्लाइमेट चेंज के मेंबर भी हैं। वह कहते हैं, बिहार का जियोग्राफिकल स्टेटस एकदम अलग है। बिहार व ईस्टर्न यूपी के इलाके पड़ोसी देश नेपाल व हिमालय के तराई क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। रिसर्च में यह सामने आया है कि गर्मी के दिनों में इन क्षेत्रों में सूर्य का रेडिएशन ज्यादा होता है। जिससे हवा हल्की होकर उपर उठती है और अपने साथ प्रदूषण के कारकों व धूल कणों को ऊपर लेकर जाती है। जिसके बाद हवा में यह कण छितरा जाते हैं जिससे प्रदूषण का लेवल कुछ कम हो जाता है लेकिन बरसात जो आम तौर पर इसमें बदलाव हो जाता है और जाड़े के मौसम में यह बदलाव बड़े लेवल पर देखने को मिलता है।

(गांधी मैदान में फैला स्मॉग)

प्रदूषण के लगातार बढते दुष्प्रभाव के कारण ऐसे रोगियों की संख्या बढ गयी है। राजधानी के वरिष्ठ फिजिशयन डॉक्टर राणा एसपी सिंह कहते हैं, यह धीमा जहर है जो धीरे-धीरे लोगों को अपनी आगोश में ले रहा है। इससे समय रहते चेतने की जरूरत है। वह कहते हैं, वायु प्रदूषण का बढ़ता असर सीधे तौर पर लोगों के श्वसन तंत्र पर अपना असर डाल रहा है। इससे लोगों में एलर्जी की शिकायत तो बढ़ ही रही है साथ ही सीओपीडी यानि क्रॉनिक अब्सट्रैक्टिव पोलोमनरी डिजीज के रोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। इससे सांस लेने में दिक्कत होने के साथ ही त्वचा संबंधी बीमारी बढ़ रही है।

(वायु प्रदूषण की वजह से सांस के रोगियों की संख्या बढ़ी- डॉक्टर राणा)

वायु प्रदूषण के बढते दुष्प्रभाव के कारण सूबे में सांस के रोगियों की संख्या में आर्श्चयजनक रूप से वृद्धि देखने को मिल रही है। पिछले दस सालों में सांस से जुड़े रोगियों की संख्या में करीब पांच गुणा तक वृद्धि हो गई है। राज्य स्वास्थ्य समिति के एक आंकड़े के अनुसार 2009 में पूरे सूबे में जहां सांस के रोगियों की संख्या दो लाख के करीब थी वहीं 2018 में यह आंकड़ा 10 लाख के ऊपर पहुंच गयी है। अहम यह कि ऐसे रोगियों की संख्या बेगूसराय, वैशाली व जमुई जैसे छोटे जिलों में बढ़ रही है। ये आंकड़े सरकारी व निजी अस्पतालों से एकत्र किए गए हैं। इन आंकड़ों से इतेफाक रखते हुए डॉक्टर राणा बताते हैं, वायु प्रदूषण खतरनाक तरीके से कार्डियो वेस्कुलर सिस्टम पर असर डाल रहा है। इससे फेफड़े के कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

(गोयठा से खाना बनाने की वजह से भी वायु प्रदूषण बढ़ता है)

प्रोफेसर पार्थसारथी कहते हैं, जाड़े के मौसम में यह पूरी तरह से बदल जाता है। इस दौरान टेम्परेचर वर्टीकली बढ़ जाता है। जिसके कारण नीचे के वातावरण में लेवल स्टेबल हो जाता है। इससे लोवर वातावरण प्रदूषण रहता है। इसका मुख्य कारण नेपाल का तराई इलाका भी होना है। यह विंटर में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। इसे विंटर पॉल्यूशन पूल ऑफ बिहार भी कहते हैं।

(प्रदूषण के क्षेत्र में काम कर रही अंकिता)

वायु प्रदूषण के क्षेत्र में कार्य कर रही सेंटर फॉर इन्वायरमेंट एंड इनर्जी डेवलपमेंट की सीनियर प्रोग्राम ऑफिसर अंकिता ज्योति बताती हैं, पिछले पांच सालों से राजधानी पटना समेत पूरे बिहार में वायु प्रदूषण को लेकर एक ही ट्रेंड रहा है। सभी जगहों पर एक्यूआई करीब करीब खराब श्रेणी में ही रहा है, सटिस्फैक्टरी या गुड कभी नहीं रहा है। वह बताती हैं, वायू प्रदूषण के कारण सूबे में सांस के रोगियों की संख्या में वाकई में वृद्धि आई है।

दरअसल जाड़े के मौसम में हवा की गति पर बहुत कुछ निर्भर होता है। इसमें पॉल्यूशन के तत्व हवा के साथ एक से दूसरे जगह पर चले जाते हैं। और जब यह फॉग के साथ मिलते हैं तो स्मॉग का रूप ले लेते हैं। यह वातावरण में निचले लेवल तक होते हैं, जो मानव शरीर पर सीधा असर डालते हैं। यह सारी चीजें मेट्रोलॉजिकल इफेक्ट पर डिपेंड करती हैं। अरब सागर की ओर से आने वाले धूल भी इस इलाके में वायु प्रदूषण के लेवल को बढ़ाते हैं।

(वाहनों की बढ़ती संख्या भी प्रदूषण का एक कारण)

बिहार में वायु प्रदूषण बढ़ने की एक मुख्य वजह वाहनों का लगातार बढ़ना भी है। इससे निकलने वाले तत्व सीधे तौर पर प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। डीजल व पेट्रोल ईंधन से चलित वाहन पर नकेल कसने के लिए सरकारी लेवल पर भी अहम कदमों को उठाने की जरूरत है। वाहनों में बीएस के विभिन्न मानकों को लेकर सरकार कदम उठाती रहती है। एक तय वक्त के बाद ऐसे वाहनों को चलाने की अनुमति नहीं होती है। हालांकि फिर भी बिहार में ऐसे वाहनों की संख्या काफी है जो तय मानकों पर खरी नहीं उतरती है। ऐसे में सीएनजी या फिर इलेक्ट्रिक वाहनों को चलाने और जागरूकता फैलाने की जरूरत है। जरूरत पड़े तो सरकार दिल्ली की तर्ज पर बिहार में ऑड इवेन फॉमूले को भी लागू कर सकती है।

बिहार स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के पीआरओ वीरेंद्र प्रसाद यादव कहते हैं, प्रदूषण को लेकर बोर्ड काफी गंभीर है और लगातार कदम भी उठाते रहता है। बोर्ड ना केवल लोगों को जागरूक करता है बल्कि स्पेशल ड्राइव भी ऑपरेट करता है। बोर्ड ने राज्य के 24 शहरों में एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम को लगाने का निर्णय लिया था। इसमें से कई शहरों में यह सिस्टम लग भी गए है। केवल राजधानी पटना में ही छह जगहों पर ऐसे सिस्टम को लगाया गया है।

वायु प्रदूषण
(पटना के गांधी मैदान के पास लगा प्रदूषण डिस्प्ले)

इस साल जनवरी माह में बक्सर देश का सबसे प्रदूषित शहर काउंट किया गया था। जब यहां की एक्यूआई 456 दर्ज की गई थी। इसके अलावा राज्य के मुंगेर में एक्यूआई 444, छपरा में 412, सिवान में 401, मुजफ्फरपुर में 401, सासाराम में 395, गया में 383 व दरभंगा में 363 एक्यूआई रिकॉर्ड किया गया था। पिछले साल दिसंबर माह में चार बार ऐसे मौके भी आए जब राजधानी पटना का एक्यूआई 300 के उपर रहा। दो दिसंबर को एक्यूआई 306 रहा तो तीन दिसंबर को 331, चार दिसंबर को 333 तथा 12 दिसंबर को 304 दर्ज किया गया।

बिहार की हवा खराब हो रही है उसे सरकार भी मान रही है लेकिन इसके बाद भी बिहार सरकार प्रदूषण को रोकने के लिए जो कदम उठा रही है वो नाकाफी है।

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