बिहार की 543 शिक्षिकाओं ने ट्रांसफर नहीं होने की वजह से छोड़ी नौकरी

अनीता कुमारी जिनका साल 2007 में शिक्षिका के पद पर नियुक्ति हुई थी. अनीता पटना जिला के डुमरांव गांव की रहने वाली हैं. उनकी पहली पोस्टिंग जैतपुर गांव में हुई जो उनके घर से एक-डेढ़ घंटे की दूरी पर है. ट्रांसफर का इंतज़ार करते हुए अनीता बताती हैं कि

शुरुआत में लगा था कुछ सालों बाद ट्रांसफर अपने गांव में हो जाएगा लेकिन आज नौकरी के 15 सालों बाद भी मेरा ट्रांसफर मेरे गांव के स्कूल में नहीं हो पाया. आने-जाने में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं. ऑटो के लिए बहुत देर रोड पर खड़े  रहना पड़ता है. कभी-कभी देर होने की वजह से स्कूल में प्राचार्य से बातें भी सुनने को मिल जातीं हैं. एक समय मन में आया कि नौकरी ही छोड़ दूं.

अभी हाल ही में एक रिपोर्ट आयी जिसके मुताबिक 543 शिक्षिकाओं को नौकरी छोड़नी पड़ी है. बिहार सरकार के उदासीन रवैये की वजह से इन शिक्षिकाओं को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी है. पिछले 12 सालों से शिक्षकों का स्थानांतरण नहीं हुआ है. जिसके कारण शिक्षकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. अभी कुछ दिनों पहले शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षिकाओं और दिव्यांग शिक्षकों को अंतर जिला स्थानांतरण करने की घोषणा फिर से की गयी है. लेकिन यह घोषणा पिछले साल भी की गयी थी. लेकिन एक साल बीत जाने के बाद आज भी शिक्षकों को अपने तबादले की आस लगी है.


और पढ़ें:- “हमें दिन के सिर्फ़ 60 रूपए मिलते हैं, हम डॉक्टर हैं लेकिन पैसे मज़दूरों से भी कम है”


अनीता आगे बताती हैं कि

मैं इतने साल नौकरी कर पाई क्योंकि मेरे दोनों बच्चे बड़े हो चुके थे और पढ़ने के लिए शहर जा चुके थे. मेरा चार लोगों का छोटा परिवार है इसलिए बच्चों के जाने के बाद मै घर में अकेले नहीं रहना चाहती थी इसलिए मैंने नौकरी करते रहने का फैसला किया.

और ये सिर्फ एक महिला शिक्षक की कहानी नहीं है ऐसी कई महिलाएं हैं जिन्हें रोज अपने कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए घंटो का सफर तय करना पड़ता है. ऐसे में कई महिलाओं को या तो काम छोड़ना पड़ता  है या फिर उन्हें रोज कई समझौते कर कार्यस्थल पर पहुंचना पड़ता है.

एक बार फिर शिक्षा विभाग ने ट्रांसफर की राह देख रहे शिक्षकों का ट्रांसफर टाल दिया गया है. अब सातवें चरण के नियोजन के बाद ही ट्रांसफर की प्रक्रिया शुरू हो पाएगी. शिक्षा विभाग दो साल से शिक्षकों की ट्रांसफर नीतियों पर काम कर रहा है. शिक्षक 2012-15 से ही ट्रांसफर की बाट जोह रहे हैं. इस बीच महिलाओं और दिव्यांगों को सबसे ज्यादा कठिनाई झेलनी पड़ रही है.

जिन लड़कियों ने उस समय ज्वाइनिंग ली उनकी शादियां भी हो गईं और बच्चे भी. इनमें से ज्यादातर अपने मायके में ही रहकर पढ़ाने के लिए स्कूल जा रही हैं. शिक्षक की नौकरी ने उन्हें ठीक से ससुराल में बसने ही नहीं दिया. दिव्यांगों की स्थिति तो सबसे ज्यादा खराब है. कमोबेश दो लाख से ज्यादा शिक्षक ट्रांसफर की बाट जोह रहे हैं. उन्हें एक बार फिर से निराशा हाथ लगी है. दूसरी तरफ शिक्षा विभाग ट्रांसफर के लिए महीनों से सॉफ्टवेयर तैयार करने में ही लगा है. विभाग कि तरफ से बताया जा रहा है कि सॉफ्टवेयर की तैयारी अंतिम चरण में है.

ट्रांसफर ना होने से सबसे ज्यादा महिलाओं और दिव्यांगों को परेशानी

नौकरी छोड़ने वाली अधिकतर महिलाओं का कहना है कि उनकी नौकरी शादी से पहले लगी थी और पोस्टिंग अपने घर के पास के स्कूल में या पास के गांव के स्कूल में हो गया था. नौकरी के बाद जब उनकी शादी किसी दूसरे जिले में हो गयी तब से उनकी परेशानी बढ़ गयी है. उन्होंने कई बार प्रयास किया कि उनका ट्रांसफर उनके ससुराल के जिले में हो जाए लेकिन ऐसा संभव नही हो पाया है. ससुराल और मायके में सामंजस्य बैठाते हुए नौकरी करना अब उनके लिए आसान नही हो पा रहा है. इसलिए कई महिला शिक्षक अपनी नौकरी छोड़ने को मजबूर हो गयी हैं.

शिक्षिका रूबी शर्मा मध्य विद्यालय पुनपुन में कार्यरत हैं. रूबी शर्मा का नियोजन साल 2014 में हुआ था और उनकी शादी साल 2015 में सारण जिला में हुई. ससुराल में स्थानांतरण के लिए पटना डीईओ में कई बार आवेदन दिया, लेकिन सात साल से इंतजार में ही हैं. रूबी शर्मा ने बताया कि ट्रांसफर नहीं होने के कारण उन्हें मायके में रहना पड़ रहा है. वहीं दूसरी महिला शिक्षक नूतन कुमारी दानापुर में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं. उनका नियोजन 2014 में हुआ था. साल 2015 में शादी भागलपुर में हो गयी जिसके बाद 7 सालों से ट्रांसफर का इंतजार कर रहीं हैं.

इस मुद्दे के पीछे छुपे जेंडर के सवालों को समझने के लिए डेमोक्रेटिक चरखा की टीम ने पटना की लेखिका और स्वतंत्र पत्रकार निवेदिता झा से बातचीत की. उन्होंने डेमोक्रेटिक चरखा से बात करते हुए कहा कि

महिलाओं को बाहर निकलकर काम करने के लिय कई बाधाओं को पार करके आना पड़ता है. उन्हें घर के कामों को करने के बाद अपने कार्यस्थल पर पहुंचना होता है. उसके बाद काम से लौटने के बाद भी उन्हें घर के कामों को करना होता है. ऐसी स्थिति में जब सरकार भी महिला शिक्षकों को सहयोग नहीं करेगी तो महिला शिक्षिका के लिए परेशान होना वाजिब है. भारत में ऐसे ही महिलाओं की भागीदारी कार्यक्षेत्र में कम है और इस तरह की लापरवाही उनकी संख्या को और घटाएगी. महिलाओं की कार्यक्षेत्र में कम संख्या का एक बड़ा कारण पितृसत्तात्मक सोच भी है. लेकिन अब इसमें धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है.

महिला शिक्षकों की तरह ही दिव्यांग शिक्षकों को भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. कई केस में तो ऐसे शिक्षकों को दूसरों पर आश्रित होकर अपने स्कूल पर पहुंचना पड़ता है. दिव्यांगजनों को दूर आने-जाने में काफी परेशानी होती है. दिव्यांग शिक्षक अपने घर के नजदीक के स्कूल में अपना ट्रांसफर चाहते हैं. लेकिन उनका भी ट्रांसफर नही हो पा रहा है. नई शिक्षा नीति के अनुसार महिला और दिव्यांग शिक्षकों को अपने सेवाकाल में एक बार अंतर जिला और अंतर नियोजन इकाई ट्रांसफर किया जाएगा.

राज्य के सरकारी स्कूलों में शिक्षक नियोजन नियमावली 2006 के तहत नियोजित शिक्षक-शिक्षिका वर्षों से मनचाही जगह पर काम करने के इंतजार में हैं. उनकी इस मांग पर शिक्षा विभाग ने 2020 में मुहर लगाई थी. नियोजन नियमावली में संशोधन करते हुए ऐच्छिक स्थानांतरण का अवसर प्रदान किया गया. करीब सवा से डेढ़ लाख महिला व दिव्यांग शिक्षकों को इसका लाभ मिलना है. इसके अलावा पुरुष शिक्षकों के लिए भी पारस्परिक ट्रांसफर दिया जाना है.

इस मामले पर सरकारी महकमे से बात करते हुए डेमोक्रेटिक चरखा को शिक्षा विभाग से जानकारी मिली कि जल्द ही इस ट्रांसफर की प्रक्रिया को पूरा करने की तैयारी की जा रही है.  

निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता ज़रूरी है

आपके लिए डेमोक्रेटिक चरखा आपके लिए ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स पब्लिश करता है जिससे आपको फ़र्क पड़ता है
हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.