सरिता-महेश का मॉडल गांव 'सब्दो' कैसे विकास से हुआ दूर?

साल 2004 में इस गांव में साफ-सफाई का स्तर भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के सपनों से कोसो आगे था. सब्दो गांव के प्रत्येक घर में शौचालय बने हुए थे जिससे यह गांव ‘खुले में शौच’ करने की कुरीति से मुक्त हो गया था.

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सरिता-महेश का मॉडल गांव 'सब्दो' कैसे विकास से हुआ दूर?

ग्रामीणों के साथ सरिता और महेश (फाइल फोटो)

आज से 20 साल पहले दो युवा कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम के कारण गांव में ग्रामीणों द्वारा सामूहिक खेती, सिंचाई के लिए आहर-पईन का जीर्णोधार, युवा और बाल शिक्षा, महिला-सशक्तिकरण और नशामुक्ति समेत कई बेहतरीन काम किये गये थे.

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लेकिन आज से 20 वर्ष पहले गणतंत्र दिवस से दो दिन पहले 24 जनवरी की रात सरिता और महेश की हत्या अज्ञात अपराधियों द्वारा कर दी जाती है. जिसके बाद मॉडल गांव के तौर पर विकसित हो रहे गांव की छवि वापस एक सामान्य गांव की तरह हो जाती है. इस हत्या में राजनीतिक और प्रशासनिक महकमे के गठजोड़ होने के कयास भी लगाए गए थे. 

सरिता और महेश सब्दो गांव को एक मॉडल गांव के रूप में विकसित कर रहे थें. उन्होंने साल 2000 में फतेहपुर के तकरीबन चालीस गांवों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया था. उनके प्रयासों से करीब पैतालीस किलोमीटर में फैले, लेकिन मृतप्राय हो चुके, हदहदवा पईन और उससे जुड़े 170 आहरों का जीर्णोद्धार महज जनता के श्रमदान से हुआ. इस श्रमदान में बिना किसी धार्मिक और जातीय भेदभाव के लोगों ने समान रूप से भाग लिया.

हदहदवा पाइन में श्रमदान देते ग्रामीण

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करीब 28 गांवों में बिजलीकरण हुआ और साथ-साथ भूमिहीन भूइयां परिवारों को जमीन पर कब्जा दिलाने और विकलांगों के पुनर्वास का काम भी हुआ. कुछ काम अधूरे भी रह गये, जैसे सामूहिक पशुपालन और सामूहिक डेयरी का काम, युवाओं में हुनर बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण केंद्र का निर्माण, आसपास की दूसरी कई मृतप्राय पइनों और आहरों के जीर्णोद्धार का काम और सब्दो के मॉडल का अन्य गांवों और इलाकों में विस्तार.

इस कामों के लिए सरिता और महेश ने श्रमदान, ग्राम समिति का गठन और सामूहिकता को बढ़ावा देने को अपना बुनियादी उसूल बनाया था. उन्होंने विकास मद के सरकारी पैसे को सीधे ग्राम समिति को स्थानांतरित कराकर सरकारी स्कीमों में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म कराने का भी प्रयास किया. परिणाम स्वरूप, सरकारी पैसों का बंदरबांट करनेवालों, गांव के आपसी झगड़ों एवं वैमनस्य का लाभ उठाने वाले अपराधिओं तथा राजनीति एवं प्रशासन में बैठे कुछ स्वार्थी तत्वों के हितों पर चोट पहुंची और उन्होंने साजिश करके उनकी हत्या करा दी. उस वक्त सरिता की उम्र महज 34 वर्ष और महेश की 36 वर्ष थी.

महेशकांत और सरिता

सामूहिक खेती कर किया आदर्श स्थापित

सरिता और महेश के सामूहिक प्रयास के कारण सब्दो गांव में सामूहिक खेती संभव हो सकी थी. भारत में जमीन से जुड़े विवाद सबसे ज्यादा होते हैं. लोग जमीन के थोड़े से टुकड़े के लिए मारपीट और हत्या पर उतर आते हैं. ऐसे में सब्दो गांव में सामूहिक खेती(collective farming) एक आदर्श स्थापित करती है.

गांव में खेतों को अलग-अलग हिस्सों में बांटने के लिए मेड़ का उपयोग किया जाता है. मेड़ मुख्य रूप से मिट्टी के छोटे टीले होते हैं जो दो खेत को अलग करते हैं. इसतरह भूमि का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी उपयोग के पड़ा रहता है. यह पूरे भारत की एक बड़ी समस्या है. अगर इन मेड़ों को हटाकर उस भूमि को मिला दिया जाये तो लाखों-करोड़ों एकड़ जमीन अन्न उपजाने के लिए इस्तेमाल किये जा सकते हैं. सरिता-महेश ने लोगों को सामूहिक खेती के लिए राजी किया था.

वहीं उस समय ग्रामीणों द्वारा वहां सामूहिक मछलीपालन की शुरुआत भी उनके प्रयासों द्वारा ही संभव हुआ था. साथ ही उनलोगों ने अपनी संस्था इरा (IRA) के माध्यम से आसपास के 40 गांवो में पानी की समस्याओं को दूर करने के लिए आहर-पईन का जीर्णोधार भी करवाया था. हदहदवा पईन के जीर्णोधार के लिए ग्रामीणों ने उनके कहने पर सामूहिक श्रमदान किया था. 

इरा के प्रखंड सम्मलेन में सरिता

सब्दो गांव के रहने वाले पप्पू यादव बताते हैं “दीदी-भैया (सरिता-महेश) के कहने पर हम लोगों ने पईन बनाने में काम किया था. उनके एक बार कहने पर रात के 12 बजे भी लोग जमा हो जाते थे लेकिन उनकी मौत के बाद स्थिति बदल गयी. गांव वालों ने उनकी मौत के बाद चार-पांच साल इंतजार किया था कि कोई उनकी तरह सबको साथ लेकर चलने वाला आ जाएगा. लेकिन कोई नहीं आया. उसके बाद सबकुछ खत्म हो गया और सामूहिक खेती भी बंद हो गया.” 

सफाई के लिए बनाई बच्चों की टोली

स्वच्छता विकास की पहली सीढ़ी होती है इसे ध्यान में रखते हुए सब्दो गांव (sabdo village) में उस समय सफाई टोली का निर्माण किया गया था. सार्वजनिक स्थानों की सफाई के लिए गांव में बच्चों की टोलियां बनाई गई थी. बच्चों की टोली सुबह-सुबह गांव में सफाई के लिए निकल जाया करती थीं. वहीं गांव साफ और सुंदर दिखे इसके लिए गलियों में जगह-जगह पर मवेशी बांधने पर रोक थी. वहीं दीवारों पर गोबर के उपले सुखाए जाने पर भी रोक लगाई गयी थी.

खुले नालों और सार्वजनिक स्थानों पर फेंके जाने वाले कचरे से खाद बनाए जाने की योजना सरिता और महेश ने बनाई थी. लेकिन उनकी मौत के बाद यह योजना भी अधर में चली गयी और गांव में पहले की तरह ही गंदगी और बदरंगी ने अपना डेरा जमा लिया है.

ग्रामीण कहते हैं आज गांव में जगह-जगह गंदगी जमा रहता है जिसे साफ़ करने की पहल अब किसी के द्वारा नहीं की जाती है.

पशुपालन और डेयरी प्रोजेक्ट समेत कई योजनाएं रह गयी अधूरी

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल देने के लिए सरिता-महेश ने सब्दो गांव (Sarita Mahesh sabdo village) में 100 पशुओं को पालने के लिए एक शेड का निर्माण शुरू करवाया था. साथ ही गांव में ही एक डेयरी का निर्माण भी किया जाना था. लेकिन उनकी मौत के बाद यह योजना अधूरी रह गई.

सामूहिक खेत होने के कारण सरिता-महेश एक ट्रैक्टर खरीदना चाहते थे. ताकि मानवीय श्रम बल को कम किया जा सके और उत्पादन ज्यादा प्राप्त हो.

महिलाओं के घरेलू कार्यों को दिलाई थी पहचान

आज के समय में भी घरेलू कामों में व्यस्त रहने वाली महिलाओं के कार्य को काम की श्रेणी में नहीं गिना जाता है. लोग उनके द्वारा किये गए काम को उनका दायित्व या जिम्मेदारी भर बताते हैं. लेकिन सरिता और महेश ने घरेलू कामों में अपना समय देने वाली महिलाओं को भी कामगार का दर्जा दिया था. 

गांव की महिलाओं के लिए नियम बनाया गया था की महिलाएं घर या बाहर का काम करते समय एक यूनिफार्म पहनेंगी ताकि लोग घरेलू कामों में महिलाओं की महत्ता को समझ सकें. साथ ही स्कूल जाने वाले बच्चों और श्रमिकों के लिए यूनिफॉर्म का नियम बनाया था. 

महिलाएं अपनी बात समाज में रखे या अपने विचार साझा कर सके इसके लिए गांव में एक सेंटर खोला जाना था जिसका नाम जगजननी केंद्र रखा जाना था. साथ ही महिलाओं को रोजगार परक प्रशिक्षण देने के लिए भी सेंटर खोला जाना था लेकिन उनकी मौत ने इन सभी योजनाओं को धरातल पर आने का अवसर नहीं दिया.

ग्रामीणों के साथ महेशकान्त और सरिता

'सब्दो' के सन्नाटे में गूंजते हैं सरिता-महेश के काम

सब्दो गांव में आज भी सुना पड़ा जगजननी भवन और जंगली झाड़ों से दबा अधूरा पशुपालन भवन सरिता और महेश की कमी को दर्शाते हैं.

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के प्रोफेसर पुष्पेन्द्र कुमार बताते है “सरिता और महेश के प्रयासों के कारण ही उस समय सब्दों गांव की ग्राम सभा को पंजीकृत बॉडी का दर्जा मिला था. जिसके बाद कैटल शेड, डेयरी फर्म, स्किल ट्रेनिंग सेंटर खोलने के लिए जिला परिषद ने ग्राम सभा को 32 लाख रुपए दिए थे जो बिहार में शायद पहला उदाहरण था. लेकिन उनकी मौत के बाद सारी योजनाएं वही रुक गयीं.”

इस तरह हम देखते हैं कैसे आदर्श गांव का उदाहरण बनने जा रहा है एक गांव सत्ता और संपत्ति की चाह रखने वाले लोगों के कुलसित मानसिकता का शिकार हो गया.

सरकार की कई कल्याणकारी योजनाएं, जो आज से सालों पहले सब्दों गांव की हकीकत थी, सरिता-महेश की हत्या के बाद अंधकार मे डूब गई. 

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