वर्किंग हस्बैंड के साथ किचन वर्किंग दामाद ढूंढने का चलन कब आएगा?

एक पढ़ी-लिखी, घर के सारे काम जानने वाली लड़की की डिमांड सास मार्केट में बढ़ती जा रही है. वर्किंग वुमन के साथ वर्किंग हाउसवाइफ भी अब चलन में बन रहा है. हालांकि अब भी उस दिन का इन्तेजार है जब वर्किंग हस्बैंड के साथ किचन वर्किंग दामाद भी ढूंढे जाएंगे.

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किचन वर्किंग दामाद का चलन

किचन वर्किंग दामाद का चलन

अगर आप गूगल पर सर्च करते हैं- देश का नंबर वन शेफ तो आपको ज्यादातर पुरुषों के नाम और चेहरे दिखेंगे, जिसमें गिनचुन कर आपको कुछ महिलाएं नजर आएंगी. जिन पुरुष शेफ के नाम आपको नजर आएंगे उनमें विकास खन्ना, संजीव कपूर, रणवीर बरार,सारांश गोइला, हरपाल सिंह सोखी, कुणाल कपूर जैसे लोग शामिल होंगे. वहीं इसमें गिनीचुनी पंकज भदौरिया, शिप्रा खन्ना, नीता मेहता, निशा मधुलिका जैसी महिला शेफ भी आपको नजर आएंगी.

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अमूमन हम यह मानते हैं कि महिलाएं खाना बनाने का काम करती हैं, यह काम उनके जिम्मे शुरुआत से ही चला रहा है. आज भी हमारे समाज में किचन का सारा जिम्मा महिलाओं के कंधों पर डाल दिया जाता है. सुबह, दोपहर और रात को खाने में क्या बनेगा, इसकी जिम्मेदारी महिलाएं ही संभालती हैं. एक दिन पहले से ही घर की महिलाएं इसकी तैयारी में जुटी रहती हैं कि कल जो बनेगा उसके सामान की लिस्ट आज बन जाए और बाजार से सामान भी आ जाए. कई बार बाजार वाले काम पुरुष संभाल लेते हैं, लेकिन यह काम भी महिलाओं के खाते में ही डाला गया है.

समाज में लोगों की सोच

समाज में किसी के घर की लड़की को एक समय के बाद गोल रोटी बेलने, खाना पकाने, किचन संभालने का काम सिखाया जाता है. अगर बनाने से इनकार करे तो उससे कहा जाता है कि ससुराल जाकर क्या करोगी? आप भी सोचिए कि एक लड़की ससुराल जाकर क्या करेगी, क्या लड़के को हम कभी कहते है कि रोटी बनाना सीख जाओ, वरना ससुराल जाकर क्या करोगे? लड़के भी तो शादी के बाद ससुराल जाते हैं, तो क्या वह ससुराल जाकर खाना बनाते हैं.... जी नहीं यह लाखों में एक जैसे घटना होगी. उल्टा जब लड़के अपने ससुराल जाते हैं तो वह दामाद रहते हैं, उनकी आवभगत, सेवा-सत्कार में पूरा ससुराल लग जाता है, तरह-तरह के पकवान दामाद के सामने भोग के लिए हाजिर कर दिए जाते हैं. लेकिन महिला जब अपने ससुराल जाती है तब उसे हर चीज भले ही वह अपने लिए हो या दूसरों के लिए खुद ही बनानी पड़ती है. 

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मुझे भी यह चीज सीखाने की कोशिश की जा रही है. मुझे भी मेरी मां हर दिन कहती है कि रोटी बेलना सीख जाओ, नहीं तो खुद का भी पेट कैसे भरोगी. हां मेरी मां ससुराल का नाम नहीं लेती क्योंकि इसपर मैं भड़क जाती हूं. मैं सवाल खड़े करने लगती हूं कि भाई को क्यों नहीं सिखाती. वह ससुराल में जा कर बस खाएगा? इस पर मां मुस्कुराती है और कहती है वह भी सीख जाएगा, एक दिन. लेकिन उसका एक दिन मेरे मौजूदा दिन से दूर क्यों है? उसे पहले रोटी बनाना, सब्जी बनाना, खाना परोसना, खिलाना यह सब क्यों नहीं सिखाते? अगर कोई मेहमान भी आए तो बेटियों को ही क्यों कहते हैं कि पानी दो, नाश्ता दो, सेवा-सत्कार करो, चाय बनाओ. यह सारी जिम्मेदारी, यह सारी बातें मुझे अंदर से कचोटती है.

लड़के किचन में काम नहीं करते

मैंने अपने आसपास देखा है कि लड़के ना खाना बनाते हैं और ना बनाने में मदद करते हैं, ना ही बर्तन धोने का ही काम करते हैं. वह तो बस खाना खाते हैं, हाथ धोते और बेसिन या कई बार टेबल पर ही बर्तन छोड़ चले जाते हैं. वह यह मान लेते हैं कि यह सारी जिम्मेदारी उनकी नहीं है. घर और बाहर की जिम्मेदारियों का बंटवारा वह मन में कर चुके होते हैं. रात के 9-10 बजे तक बाहर के काम करना ज़िम्मे बंद गया है और घर में सुबह 5 से रात 12 बजे तक काम संभालना औरत और लड़कियों के लिए है. हालांकि यह रात 12 बजे तक बिना थकान वाली ड्यूटी का भी समय फिक्स नहीं है.

मैं पढ़ाई के लिए घर से बाहर रहती हूं. बाहर से मैं लंच बॉक्स मंगा कर खाती हूं, लेकिन वह स्वाद नहीं रहता जो मन भर दे. पेट भरने के लिए खा तो लेती हूं, लेकिन कई बार हलवा, खीर, सेवई ऐसी छोटी-मोटी चीज इंटरनेट से देखकर बनाती हूं. लेकिन अब तक मैंने रोटी बनाने की हिम्मत नहीं जुटाई. मैं कई बार मैं सोचती हूं कि अगर मैं खाना बनाना सीख जाऊंगी तो घर वाले मेरी शादी करा देंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि एक पढ़ी-लिखी, घर के सारे काम जानने वाली लड़की की डिमांड सास मार्केट में बढ़ती जा रही है. वर्किंग वुमन के साथ वर्किंग हाउसवाइफ भी अब चलन में बन रहा है. हालांकि अब भी उस दिन का इन्तेजार है जब वर्किंग हस्बैंड के साथ किचन वर्किंग दामाद भी ढूंढे जाएंगे.

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