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डिजिटल शिक्षा में जेंडर गैप: आज भी 20% महिलायें इन्टरनेट उपभोक्ता

एनएफएचएस-5 द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में महिलाओं द्वारा इंटरनेट उपयोग का प्रतिशत काफ़ी कम हैं. यहां मात्र 20.6% महिला ही इंटरनेट का उपयोग कर रहीं हैं. वहीं पुरुष द्वारा इंटरनेट उपयोग करने का प्रतिशत भी मात्र 43.6% है.

एम इंटरप्राइजर के नाम से मारुफगंज में ड्राईफ्रूट्स और चीट पेपर की दुकान चलाने वाली मीरा गुप्ता डिजिटल पेमेंट या ऑनलाइन पेमेंट नहीं लेती हैं. उनकी दुकान लगभग 70 वर्ष पुरानी है. लेकिन कोरोना महामारी के बाद हर तरफ ऑनलाइन पेमेंट और डिजिटल पेमेंट के चलन के कारण अब उन्हें दुकानदारी करने में परेशानी आने लगी है.

मीरा बताती हैं

“मेरी दुकान बहुत पुरानी है. इसे मेरे ससुर ने ही शुरू किया था, फिर मेरे पति और उनके भाई मिलकर चलाने लगे. मैं भी अपने पति के साथ दुकान पर जाती थी लेकिन उनके गुजर जाने (मौत) के बाद से पिछले तीन साल से मैं अकेले ही दुकान चला रही हूं.”

डिजिटलाइजेशन के इस दौर में ऑनलाइन पेमेंट नही लेने के कारण उन्हें कई बार परेशानी भी उठानी पड़ी है. मीरा बताती हैं

“मैं स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल नही करती हूं. जब कोई ग्राहक ऑनलाइन पेमेंट देने की बात करता है तो हम मना कर देते हैं. इस कारण कभी ग्राहक चला भी जाता है तो कभी अगल-बगल से कैश का इंतजाम करके लाते हैं.”  

डिजिटलाइजेशन का दौर तो लगभग 10 साल पहले ही शुरू हो गया था लेकिन कोविड ने इस बात पर और बल दिया है कि सूचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, ई-कॉमर्स और वित्तीय सेवाओं के लिए मोबाइल और इंटरनेट तक पहुंच बहुत जरूरी है.

महिलाओं की पहुंच से इन्टरनेट काफी दूर: रिपोर्ट 

सेंटर फॉर कैटेलाईजिंग चेंज (Centre for Catalyzing Change) द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट में ‘बिहार में महिलाओं की इन्टरनेट’ पहुंच में न्यूनतम भागीदारी को लेकर चिंता जताई गई है. इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि कैसे महिलाएं इंटरनेट और मोबाइल के पहुंच से आज भी कोसो दूर हैं. 

जहां शहरी क्षेत्र की 38.4% महिलाएं और 58.4% पुरुष इंटरनेट का उपयोग करते हैं. जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 17% महिलाएं और 39.4% पुरुष इंटरनेट का उपयोग करते हैं.

एनएफएचएस-5 (NFHS-5) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में महिलाओं द्वारा इंटरनेट उपयोग का प्रतिशत काफ़ी कम हैं. यहां मात्र 20.6% महिला ही इंटरनेट का उपयोग कर रहीं हैं. वहीं पुरुष द्वारा इंटरनेट उपयोग करने का प्रतिशत भी मात्र 43.6% है.

डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देने वाली यूके स्थित वैश्विक संस्था GSMA द्वारा हाल ही में जारी ‘मोबाइल जेंडर गैप 2022’  नाम के रिपोर्ट से पता चलता है कि कोरोना महामारी ने एक बड़े डिजिटल विभाजन को भी उजागर किया है. यह रिपोर्ट कहता है कि मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल नही करने वाले लोग आने वाले समय में और पीछे छूट सकते हैं.

मीरा जैसी लाखों महिलाएं आज पुरुषों के बराबर बाजार में अपनी हिस्सेदारी दर्ज करा रहीं हैं. लेकिन इस हिस्सेदारी में आगे बढ़ने और टिके रहने के लिए उन्हें डिजिटली रूप से सक्षम बनना होगा.

इंटरनेट की पहुंच महिलाओं से कोसों दूर

एनएफएचएस-5 (National Family Health Survey-5) के रिपोर्ट के अनुसार, देश के शहरी क्षेत्रों में 51.8% महिलाएं और 72.5% पुरूष इंटरनेट का उपयोग कर रहें हैं. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में 24.6% महिलाएं और 48.7% पुरूष ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं.

एनएफएचएस-5 (NFHS-5, Bihar) के आंकड़ों के अनुसार बारहवीं से अधिक की शिक्षा पाने वाली 72% से अधिक महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं, वहीं पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई करने वाली महिलाओं में यह आंकड़ा सिर्फ 8% है. बड़ी उम्र की महिलाओं की तुलना में युवा महिलाओं/लड़कियों के इंटरनेट उपयोग की संभावना अधिक होती है. इसमें भी जिनके पास पैसा और संसाधन अधिक है, उनके इंटरनेट प्रयोग करने की संभावना भी अधिक है.

हनुमान नगर में अपना ब्यूटी पार्लर चलाने वाली सुनीता आज भी स्मार्ट फ़ोन का उपयोग नहीं करती हैं. लेकिन कोविड के बाद से ऑनलाइन पेमेंट लेना उनकी मजबूरी बन गई थी. सुनीता बताती हैं

“कोविड के बाद जब दुकान खोलने का आदेश आया तो मैं खुश हो गई, चलो अब तो मुसीबत से छुटकारा मिला. लेकिन दुकान खुलने के बाद जो पहली कस्टमर मेरे पास आयीं उन्होंने मुझे कैश के बजाय ऑनलाइन पेमेंट लेने को कहा.”

वे आगे कहती हैं

“चूंकि मैं ऑनलाइन पेमेंट नही लेती थी तो उस दिन मुझे बहुत दिक्कत हुआ. आगे भी कई बार मुझे पेमेंट लेने में दिक्कत हुई. जिसके बाद मेरे बेटे ने पेटीएम (Paytm) का स्कैनर लगवा दिया. चूंकि इसके लिए भी स्मार्टफ़ोन चाहिए था. इसलिए मेरे बेटे ने अपने फ़ोन का इस्तेमाल किया. अब हर पेमेंट के बाद मुझे अपने बेटे को फ़ोन कर पूछना पड़ता है की पेमेंट पहुंचा या नहीं.”

मीरा और सुनीता जो राजधानी पटना में अपना खुद का व्यवसाय कर रही हैं लेकिन इसके बाद भी स्मार्टफोन इस्तेमाल करने और उसके द्वारा पेमेंट लेने में असमर्थ हैं. तब ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली वैसी महिलाएं जो घरेलू कार्यों के आलावा कोई कार्य नहीं करती हैं, उनके द्वारा स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करने में असमर्थ होने का अंदाजा लगाया जा सकता है. 

देश की 33 प्रतिशत महिलाओं के पास ही मोबाइल

एनएफएचएस-5 के अनुसार देश में आधे से अधिक महिलाओं (53.9%) के पास मोबाइल फोन तो है, लेकिन इनमें से केवल 22.5% महिलाएं ही वित्तीय लेनदेन के लिए मोबाइल का उपयोग करती हैं. वहीं मोबाइल फोन रखने की बात है तो, यह व्यक्ति के वित्तीय समर्थता के ऊपर भी निर्भर करता है. एक आंकड़े के अनुसार कम आयवर्ग की केवल 33% महिलाओं के पास मोबाइल फ़ोन उपलब्ध है जिसका इस्तेमाल वे स्वयं करती है. वहीं उच्च आयवर्ग में देखा जाए तो यहां 79% महिलाओं के पास मोबाइल फोन उपलब्ध है.

खुद का मोबाइल फ़ोन रखने और उसका इस्तेमाल करने के मामले में देश में गोवा की स्थिति सबसे बेहतर है. यहां 91% महिलाओं के पास मोबाइल फ़ोन उपलब्ध है. उकसे बाद सिक्किम (89%) और केरला (87%) का स्थान आता है.

51.4% महीला के पास मोबाइल है जबकि 49.3% महिला ही फ़ोन में मैसेज पढ़ने और भेज पाने में सक्षम हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक राज्य में तीन से पांच फीसद महिलाएं जिनके पास मोबाइल है मैसेज पढ़ पाने में सक्षम हैं, बिहार को छोड़कर. 

जीएसएमए (GSMA) द्वारा जारी मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट 2022 के अनुसार, भारत में 2019 में 36% पुरुषों के पास खुद का स्मार्टफोन, 2020 में 41% और 2021 में 49% के पास स्मार्टफोन था. वहीं महिलाओं द्वारा स्मार्टफोन का उपयोग अभी तक इस गति से नहीं बढ़ा है. 2019 में 14% महिलाओं के पास खुद का मोबाइल उपलब्ध था, 2020 में 25% और 2021 में 26% महिलाओं के पास मोबाइल था.

GSMA के रिपोर्ट के अनुसार 2020 में केवल 30% वयस्क महिलाओं ने मोबाइल इंटरनेट का उपयोग किया. रिपोर्ट के अनुसार, मोबाइल इंटरनेट के पुरुष उपयोगकर्ता 2020 में 45% से बढ़कर 2021 में 51% हो गए.

बिहार में डिजिटल गैप का कारण क्या?

बिहार में महिलाओं या किशोरियों के इंटरनेट का उपयोग करने में पिछड़ने का मुख्य कारण  गरीबी, अशिक्षा और प्रचलित समाजिक मानदंड को दिया जा सकता है. बिहार में शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं की पहुंच इंटरनेट तक बहुत कम है. हालांकि, शहरी महिलाओं की तुलना में ग्रामीण महिलाओं के पास अपना खुद का मोबाइल फोन कम होता है.

वहीं शहरी महिलाओं में भी असंगठित महिला कर्मियों की तुलना में संगठित क्षेत्र की महिलाओं में ही डिजिटल लेनदेन की प्रक्रिया अधिक होती है.  

बिहार में वार्षिक प्रति व्यक्ति आय 3,650 रूपए है जो देश के प्रति व्यक्ति आय 11,625 रूपए का करीब एक तिहाई है. ऐसे में किसी भी कम आय के परिवार के लिए मोबाइल और इंटरनेट दूसरे दर्जे के जरूरतों में आते हैं. क्योंकि अगर कोई परिवार मोबाइल इंटरनेट का उपयोग करता है तो उसे कम से कम अपनी मासिक आय का 2% से 3% खर्च करना पड़ सकता है, जो कि किसी भी कम आय वाले परिवार के लिए बहुत अधिक है.

अभय कुमार पटना हाईकोर्ट के बाहर टाइपिस्ट का काम करते हैं. उनके परिवार में उनके पत्नी के आलावे दो बच्चे हैं. परिवार चलाने की जिम्मेवारी पूरी तरह से अभय के ऊपर है. अभय बताते हैं

“इतनी महंगाई है की एक-एक खर्च सोच समझकर करना पड़ता है. बेटी ग्रेजुएशन और बेटा 12वी में पढ़ता है. दोनों को मोबाइल फ़ोन देना आज की जरूरत है. साथ ही मेरा काम ऐसा है कि मुझे भी स्मार्टफोन और इंटरनेट चाहिए ही. ऐसे में घर में तीन स्मार्टफ़ोन हैं औए तीनों को हर महीने रिचार्ज करने में हजार रूपए खर्च  करने पड़ते हैं. लेकिन इस सबके बीच मजाक में मेरी पत्नी हमेशा शिकायत करती हैं कि मैं ही इस घर में बेकार हूं जिसके पास एक स्मार्टफोन भी नहीं है.”

स्मार्टफ़ोन उपयोग करने में महिलाओं के पिछड़ने का एक कारण सामाजिक रोकटोक भी है. आज भी ग्रामीण भारत या बिहार में लड़कियों के स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल करना सामजिक तौर पर अच्छा नहीं माना जाता है.

स्लम क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं और बच्चियों के लिए काम करने वाली निवेदिता जी का मानना है ग्रामीण महिलाओं द्वारा स्मार्टफोन उपयोग नहीं करना पिछड़ापन नहीं है. बल्कि उस वस्तु का उपयोग उनके लिए कम है इसलिए महिलाएं उसका उपयोग कम कर रहीं हैं.

वे कहती हैं

“ग्रामीण परिवेश की महिलाओं के स्मार्टफ़ोन उपयोग नहीं करने का पहला कारण एक तो उपयोगिता का है. उनके लिए मोबाइल का उतना कोई उपयोग नहीं है. दूसरा कारण आर्थिक कमजोरी है. ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं आर्थिक तौर पर सशक्त नहीं होती है जिस कारण उनके लिए खुद का फ़ोन रखना संभव नहीं है. तीसरा कारण तकनीकी कमजोरी भी है. कई बार फ़ोन मौजूद होने के बाद भी महिलाएं तकनीकी समझ नहीं होने के कारण उसका इस्तेमाल बहुत कम करती हैं. लेकिन व्हाट्सएप, यूट्यूब और फेसबुक चलाना अब ग्रामीण महिलाओं और कम पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी आता है.”

किफायती और सुलभ होने के बाद भी स्मार्टफोन से दूर हैं महिलाएं

इंडिया इंटरनेट 2019 के रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर लोग इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए स्मार्टफोन पर निर्भर करते हैं, क्योंकि स्मार्टफ़ोन किफायती और सुलभ होते हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार देश में 258 मिलियन पुरुष स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. जबकि पुरुषों की संख्या के लगभग आधे से कम ही महिला स्मार्टफोन का उपयोग कर रही हैं.

इस रिपोर्ट में बताया गया है बिहार में केवल 28% लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और जबकि देश में 36% लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं.

बिहार देश में तीसरा सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला राज्य होने के साथ ही महिलाओं में कम साक्षरता दर वाला राज्य भी है. एनएफएचएस-5 के रिपोर्ट के अनुसार बिहार में पुरुष साक्षरता दर 78.5% और महिलाओं में साक्षरता दर 57.8% यानि पांच में से दो महिला ही पढ़ी लिखीं हैं. 

साक्षरता दर का सीधा प्रभाव डिजिटल साक्षरता पर भी देखा जा सकता है. एनएफएचएस-5 ने बिहार में डिजिटल साक्षरता को दिए आंकड़ों के अनुसार केवल 20% महिलाएं ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर पा रही हैं. वहीं 18% में बच्चियां या किशोरियां इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही हैं. वहीं लड़कियों के मुकाबले 80% लड़कों के पास इंटरनेट की सुविधा मौजूद है.

निवेदिता कहती हैं

“हमारा समाज पुरुष प्रधान है. यहां बहुत सारी सुविधाएं पुरुषों तक ही सीमित होती हैं. अगर पांच लोगों के कम आयवर्ग का परिवार है और घर में दो फ़ोन ही है तो वो घर के पुरुष के पास ही होते हैं. क्योंकि पुरुष को काम के लिए बाहर जाना होता है. वहीं इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि “घर में लड़के और लड़की में अगर किसी एक को फ़ोन देने की बात आती है तो प्रायोरिटी (प्राथमिकता) लड़कों को ही मिलती है.”   

बिहार की महिलाएं जब तक मौजूदा अंतर को पाटने और तेजी से आगे बढ़ने में सक्षम नहीं होंगी, तब तक यह उद्यमिता के लिए उनकी संभावनाओं को भी प्रभावित करता रहेगा. यह डिजिटल जेंडर गैप महिलाओं द्वारा संचालित व्यवसायों को निम्न-तकनीक और कम राजस्व पैदा करने वाले क्षेत्रों जैसे- खाद्य, हस्तशिल्प, सिलाई और ब्यूटी पार्लर तक ही सीमित कर देता है, जहां पर भविष्य में प्रगति करने के बहुत ही कम अवसर होते हैं.

डिजिटल कार्यक्रमों का लाभ ज्यादातर पुरुषों कों

प्रधानमंत्री मोदी का कहना है

“भारत को डिजिटल बनना मेरा सपना है. जब मैं ‘डिजिटल भारत’ बोलता हूं तो इसका संबंध देश के अमीर नहीं बल्कि गरीब लोगों को डिजिटल बनाने से हैं.”

अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने सरकार ने साल 2015  में प्रधानमंत्री डिजिटल साक्षरता अभियान (पीएम-दिशा) और 2017 में प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (पीएम-जीदिशा) शुरू किया. इन कार्यक्रमों का उद्देश्य देश के मध्यम वर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार के एक सदस्य को बुनियादी डिजिटल साक्षरता प्रदान करना है.

पीएम जीदिशा के तहत देश में अभी तक 5.69 करोड़ लोगों को डिजिटल साक्षर बनाया गया है जिसमें 4.23 करोड़ लोगों को प्रमाणित भी किया गया है. वहीं बिहार में पीएम जीदिशा के तहत 8 हजार 361 पंचायत के 66 लाख 30 हजार लोग को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें 46 लाख 72 हजार लोग को प्रशिक्षित किया गया है.

वहीं देश के 1.1 करोड़ से अधिक लोग को राष्ट्रिय डिजिटल साक्षरता अभियान के तहत साक्षर किया गया है. लेकिन इन योजनाओं का लाभ भी ज्यादातर पुरुषों/लड़कों द्वारा ही उठाया जा रहा है. 

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