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पटना: क्या बस्तियों तक शिक्षा पहुंच पा रही है?

आज के दौर में शिक्षा बाजारवाद और निजीकरण की भेंट चढ़ चुका है. सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर निचे गिरता जा रहा है. ज्यादातर लोग अच्छी शिक्षा के लिए निजी स्कूलों का सहारा ले रहे हैं. लेकिन बेहतर शिक्षा का पर्याय बन चुके प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा दिलवाना आम आदमी के पहुंच से बाहर है. 

शहर की चकाचौंध का हिस्सा होने के बाद भी शहरों के अंदर बसे बस्ती आज भी अंधेरे में डूबे हैं. आंकड़ों की माने तो देश में हर 10 में से छह झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग गन्दी और बदबूदार नालियों के करीब रहते हैं. वहीं हर 10 में से चार लोग को आज भी साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधा से दूर हैं.

इन गंदी बस्तियों में रहने वाले लोग विकसित समाज, राजनैतिक गलियारों और प्रशासन की बेरुखी का शिकार हैं. बिहार की राजधानी पटना जिसे हर रोज स्मार्ट सिटी की कतार में लाए जाने के लिए सरकार आए दिन नई योजनाए बनाने का प्रयास कर रही है. लेकिन उससे पहले सरकार उन बस्तियों या स्लम में रह रहे लोगों तक अपनी योजनाए पहुंचाने में विफल रही है. 

साल 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार भारत में स्लम बस्ती में जनसंख्या के आधार पर बिहार 15वें स्थान पर आता है. बिहार के स्लम बस्तियों में 2 लाख 16 हजार 496 घर हैं जिनमें बिहार की कुल जनसंख्या की 1.19% आबादी रहती हैं. वहीं 2011 की जनगणना के अनुसार राजधानी पटना की बस्तियों में 13 हजार 496 (13,496) घर हैं जिसमें पटना की कुल आबादी की 4.57% (77,034) लोग रहते हैं.   

पटना में 110 स्लम बस्तियां मौजूद हैं. जहां बुनियादी सुविधाओं जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, शौचालय, साफ-सफाई और पक्के घर की कमी है. उसे दुरुस्त करने के बजाय सरकार शहर को केवल बाहरी तौर पर चमकाने का प्रयास करती रहती है.

बस्ती के बच्चे शिक्षा से दूर

‘स्लम्स ऑफ पटना’ नाम की किताब में पटना के 38 स्लम बस्तियों में रह रहे बच्चों के शैक्षणिक स्तर का अध्ययन किया गया है. इसमें उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन बस्तियों में 2,053 घर मौजूद हैं जिनमें 6,501 बच्चे रहते हैं.

जिसमें से 4,216 बच्चे स्कूल जाने के उम्र के हैं लेकिन उनमें से भी केवल 3,110 बच्चे ही स्कूल जाते हैं और बाकी के 1,026 बच्चे का भविष्य मूलभूत सुविधाओं की कमी की वजह से संकट में है.

पटना के बुद्धमूर्ति कदमकुआं आयुर्वेदिक कॉलेज के सामने स्थित बस्ती इनमें से एक है. इस बस्ती में लगभग 40 घर मौजूद हैं जिसमें 150 से 200 के आसपास लोग रहते हैं. ज्यादातर लोग कचड़ा बीनकर, सफाई कर्मचारी के तौर पर या रोड पर सामान बेचकर अपना गुजारा करते हैं.

इन बस्तियों में रहने वाले लोगों का जीवन केवल ‘कमाने और खाने’ में ही समाप्त हो जाता है. वर्तमान और भविष्य को लेकर उनके पास न तो कोई योजना है और न ही उतनी चिंता नज़र आती है.

इस बस्ती में स्कूल जाने की उम्र के बच्चों की संख्या 100 के आसपास होगी. लेकिन इसपर कोई हैरानी नहीं है कि यहां के ज्यादातर बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं. जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं वो केवल आंगनबाड़ी या कुछ सालों तक प्राथमिक स्कूलों में जाकर इसकी खानापूर्ति भर करते हैं.

हर बस्ती की तरह इस बस्ती के बच्चे भी जब मन होता है तो स्कूल जाते हैं नहीं तो घर के दूसरे काम या इधर-उधर घूमने में लग जाते हैं. स्कूल से आकर पढ़ाई करने के बारे में सोचना तो शायद यहां संभव भी नहीं है.

इसी बस्ती में रवि भी रहते हैं. रवि की उम्र केवल 16 से 17 वर्ष के बीच है. इस उम्र के बच्चे अपना ज्यादातर समय पढ़ाई और खेल को देते हैं. लेकिन रवि के ऊपर इस उम्र में माता-पिता, पत्नी और उनके भाई-बहनों की जिम्मेदारी है.

रवि की शादी पिछले वर्ष हो गई है. रवि अब एक दुकान में सफाई कर्मी के तौर पर काम करते हैं. रवि से हमने उनके पढ़ाई के विषय में पूछा तो रवि का कहना है

“हमको पढ़ाई में मन लगता था लेकिन मम्मी-पापा शादी कर दिए. अब शादी हो गयी है तो घर चलाना पड़ता है. लेकिन हम अपने भाई-बहन को पढ़ा रहे हैं.”

रवि की बहन राधा पढ़ कर डॉक्टर बनना चाहती हैं. राधा अभी आधुनिक शिक्षा मध्य विद्यालय में पढ़ती हैं. राधा कहती है

“स्कूल में पढ़ने जाना अच्छा लगता है. मैं पढकर डॉक्टर बनना चाहती हूं.” 

अशिक्षा बन रही पिछड़ेपन का कारण

बच्चों के विकास पर पारिवारिक पृष्ठभूमि का गहरा असर पड़ता है. समाज में यह अक्सर देखा जाता है कि अभिभावकों का शैक्षिक स्तर जितना अधिक होता है उनकी बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूकता भी उतनी ही ज्यादा होती है. 

वहीं जिस परिवार में माता-पिता निरक्षर होने के साथ-साथ आर्थिक तौर पर कमजोर होते हैं वो अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति कम जागरूक होते हैं. हालांकि समाज में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है. ज्यादातर निरक्षर अभिभावकों का भी बच्चों की शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण होता है.

स्लम्स ऑफ़ पटना’ किताब में 2,008 परिवारों के मुखिया के शैक्षणिक स्तर का अध्ययन किया गया है. जिसमें पाया गया की 76% परिवारों के मुखिया अशिक्षित हैं जबकि मात्र एक व्यक्ति ऐसे हैं जो स्नातकोत्तर (Post Graduation) तक शिक्षित हैं. इन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर अभिभावक कभी स्कूल नहीं गए हैं.

वहीं इन आंकड़ों से पता चलता है कि इन बस्तियों के 70.8% पुरुष मुखिया निरक्षर हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 89% तक है. परिवार की महिला मुखिया का मुकाबले पुरुषों में उच्चतम योग्यता स्नातकोत्तर है जबकि महिला में यह केवल मैट्रिक है.

निरक्षरता की उच्च दर चिंता का विषय है. अशिक्षित होने के कारण अकसर उनका सरकारी अधिकारियों या स्थानीय राजनेताओं द्वारा शोषण किया जाता है. शिक्षा लोगों को जागरूक और जीवन जीने के कौशल सीखने की ओर ले जाती है. लेकिन जब परिवार के मुखिया ही शिक्षित नहीं होंगें तो बच्चों की शिक्षा प्रभावित होना स्वाभाविक है.  

रवि के तरह सुमित भी इसी बस्ती में रहते हैं. सुमित स्लम और पारिवारिक माहौल के कारण पढ़ाई छोड़ चुके हैं. सुमित का कहना है

“पढ़ने जाते तो रात को खाने के लिए पैसा कहां से आता. मेरे घर में मेरे आलावे दो बहन एक मां और एक मेरी पत्नी है. घर में केवल मां और हम कमाते हैं. मेरी एक बहन पढ़ती है. अगले साल वो दसवीं की परीक्षा देगी. हमलोग उसको आगे भी पढ़ाएंगे.”   

वहीं सुमित की मां अपनी बेटी के दसवीं करने पर खुश हैं और कहती हैं

“इस बस्ती में पढ़ाई का बिल्कुल माहौल नहीं है. यहां का कोई बच्चा पढ़ने नहीं जाता है. जो जा भी रहा है वह भी  केवल पहला दूसरा तक पढ़ेगा फिर छोड़ देगा. मेरी बेटी के अलावे बस्ती से एक और लड़की हॉस्टल में रह कर पढ़ाई कर रही है.” 

सुमित की मां आगे कहती हैं

“यहां का बच्चा कहां से पढ़ेगा स्कूल में छह घंटा पढ़कर आ जाएगा लेकिन उसके बाद तो वही कचड़ा, खेल, गाली-गलौज में रहेगा. आगे पढ़ने-लिखने का माहौल ही नहीं है कि बच्चा सब पढ़ सके.”

आज के दौर में शिक्षा बाजारवाद और निजीकरण की भेंट चढ़ चुका है. सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर निचे गिरता जा रहा है. ज्यादातर लोग अच्छी शिक्षा के लिए निजी स्कूलों का सहारा ले रहे हैं. लेकिन बेहतर शिक्षा का पर्याय बन चुके प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा दिलवाना आम आदमी के पहुंच से बाहर है.  

गरीब मजदूर और मलीन बस्तियों में रहने वाले परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना एक सपना बन गया है. इन बस्तियों के बच्चे आज भी शिक्षा से काफी हद तक वंचित हैं. इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों के अभिभावकों की शैक्षणिक, आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति से साफ पता चलता है कि यहां रहने वाले बच्चों का भविष्य कैसा होगा?

करोड़ों की शिक्षा योजना स्लम तक नहीं पहुंची

स्लम बस्तियों में रहना ही काफी चुनौतीपूर्ण है. उसपर यहां के बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा की उम्मीद रखना बेमानी है.

आजादी के सात दशक से ज्यादा होने के बाद भी भारत के प्रत्येक बच्चों तक शिक्षा नहीं पहुंच सकी है. जबकि शिक्षा के नाम पर हर साल हजारों करोड़ रुपए की योजनाएं बनती रही हैं. इस साल बिहार सरकार ने अबतक का सबसे बड़ा शिक्षा बजट जारी किया गया था. लेकिन फिर भी बिहार के सरकारी स्कूलों और विश्विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हो सका है.

प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा मिला हुआ है. शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने वाले 86वें संविधान संशोधन को संसद ने साल 2002 में पारित किया था. शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए संविधान में संशोधन किए जाने के करीब आठ साल बाद सरकार ने छह से 14 साल के हर बच्चे को मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करने संबंधी कानून को लागू किया था. लेकिन हकीकत यह है कि यह कानून भी संविधान के पन्नों में ही कैद होकर रह गया है.

‘स्लम्स ऑफ़ पटना’ में जिन 38 बस्तियों का अध्यन किया गया है उसमें 1,644 परिवार में स्कूल भेजने की उम्र के बच्चे रहते हैं जिनमें से 1,444 (87.8%) परिवार अपने बच्चों कों स्कूल भेजते हैं. वहीं 12.2% परिवार ऐसे हैं जो अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते.  

लेकिन स्लम जैसे जगहों पर रह रहे बच्चों के लिए निजी स्कूल में शिक्षा पाना ‘दूर की कौड़ी’ है. स्लम में रहने वाले 1,273 (88.1%) परिवार सरकारी स्कूल में अपने बच्चों को भेजते हैं. वहीं 117 (8.1%) परिवार ऐसे भी हैं जो अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं. 50 (3.4%) परिवार ऐसे भी हैं जो अपने एक बच्चे को सरकारी और एक को निजी स्कूल में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं.

बुद्धमूर्ति स्थित स्लम बस्ती में रहने वाली शांति देवी के दो बच्चे हैं और दोनों बच्चे निजी स्कूल में पढ़ाई करते हैं. शांति देवी और उनके पति कचड़ा बीनकर और उसे बेचकर घर चलाते हैं. शांति देवी कहती हैं

“पहले दोनों बच्चा सरकारी स्कूल में ही जाता था. लेकिन फिर बच्चा बोला पढ़ाई अच्छी नहीं होती है प्राइवेट स्कूल में जाना है. फिर दो साल पहले प्राइवेट में नाम लिखवा (लिखा) दिए. हर महीने एक हजार फीस पर खर्च होता है लेकिन सोचते हैं पढ़ लिख लेगा तो हमरे (मेरे) जैसा कचड़ा नहीं चुनना पड़ेगा.”

आंकड़ें क्या कहते हैं?

स्लम में रहने वाले परिवार शिक्षा के ऊपर पैसे खर्च करने के लिए ज्यादा उत्साहित या सक्षम नहीं होते हैं. अध्ययन में शामिल 1,250 परिवारों में से 66.4% (831) परिवारों ने शिक्षा पर कोई पैसा खर्च नहीं किया. जबकि कुछ परिवार हर महीने 200 से 500 रूपए के बीच शिक्षा के ऊपर खर्च कर रहे हैं. वहीं 1,250 में से केवल 17 (1.4%) परिवार हीं ऐसे हैं जो 1500 रुपये प्रति माह से अधिक खर्च करते हैं.

आरटीई 2009 के अनुसार हर बच्चे को स्कूल जाने का मौलिक अधिकार प्राप्त है लेकिन यह अधिनियम केवल कानूनन तौर पर है. स्लम बस्तियों में रहने वाले अधिकांश परिवारों का कहना है कि वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं. जिसका पहला कारण परिवार की ख़राब आर्थिक स्थिति है और दूसरा कारण यह है की दलित अभी भी भारत का सबसे उत्पीड़ित समुदाय है. बस्तियों में रहने वाले लोगों में दलित समुदाय के 70% लोग अपने बच्चों को स्कूल में नही भेजते हैं. यह दर्शाता है कि दलित समुदाय आज भी समाज कि मुख्यधारा से बहुत दूर हैं.बुद्धमूर्ति स्लम के नजदीक ही सेंट सेवेरिन स्कूल और राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल स्थित है. शिक्षा के बड़े संस्थानों के नजदीक बसे इस बस्ती में शिक्षा की स्थिति बेहद गंभीर है. क्या इस बस्ती में रहने वाले बच्चों को भविष्य में डॉक्टर, टीचर या इंजिनीयर बनने का अधिकार नहीं है.

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