क्यों 1977 के बाद से बिहार में प्रोफेसरों की नियुक्ति नहीं हुई?

इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार में हर साल 100 एसोसिएट प्रोफेसर और रीडर की संख्या कम हो रही है. साल 2018-19 में इनकी संख्या 4134 थी. साल 2021-22 इनकी संख्या घट कर 3691 रह गयी.

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आमिर अब्बास
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कॉलेज में पढ़ाते हुए प्रोफेसर

बिहार में प्रोफेसरों की नियुक्ति

बिहार में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली कोई अजूबी या नयी बात नहीं है. सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की बदहाली की लोगों को आदत हो चुकी है. अगर कोई सरकारी स्कूल या कॉलेज में सभी सुविधाएं होती हैं, तो उस पर खबरें बन जाती हैं. सभी लोगों को ताज्जुब होता है कि आखिर सरकारी स्कूल में सभी सुविधाएं कैसे मौजूद हैं. लेकिन ये स्थिति हमेशा से नहीं थी. पहले प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों का चलन बिल्कुल भी नहीं था. पहले सरकारी अधिकारी हो या फिर चपरासी के बच्चे, सभी सरकारी स्कूल और कॉलेज में ही पढ़ा करते थें. ये बात लगभग 40-50 साल पहले की है.

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उस समय की स्थिति ये हुआ करती थी कि सरकारी कॉलेज में दाखिला मुश्किल से मिलता था. उस दौर के सभी बड़े अधिकारी, वैज्ञानिक, कलाकार और सभी क्षेत्रों में अपने हुनर का सिक्का जमाने वाले सरकारी शैक्षणिक संस्थान से ही पढ़े हुए होते थें. लेकिन उसके बाद सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति बदतर होती गयी. प्राइवेट संस्थानों को इससे सबसे अधिक मुनाफा हुआ.

कॉलेज में बैठे हुए छात्र

आज के समय में सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति इतनी बदहाल हो चुकी है कि बिहार में साल 1977 के बाद से किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति ही नहीं हुई है. इसकी वजह से बिहार के विश्वविद्यालयों में हर साल शिक्षकों की संख्या कम होती जा रही है. इसका सीधा असर स्टूडेंट्स के उच्च शिक्षा पर पड़ रहा है.

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हालिया रिपोर्ट में दिखी शिक्षकों की कमी

ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन की हालिया रिपोर्ट में शिक्षकों की कमी की सही तस्वीर दिखाई देती है. इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार में हर साल 100 एसोसिएट प्रोफेसर और रीडर की संख्या कम हो रही है. साल 2018-19 में इनकी संख्या 4134 थी. साल 2021-22 इनकी संख्या घट कर 3691 रह गयी. साल 2022-23 और 23-24 इनकी संख्या और भी कम हुई है. वहीं बिहार के विश्वविद्यालयों में 4000 असिस्टेंट प्रोफेसर की कमी है. 

अस्थायी शिक्षकों के भरोसे चल रही है बिहार की शिक्षा 

बिहार में विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर की सीधी नियुक्ति को 47 साल हो चुके हैं. उसके बाद भी अभी तक सरकार या विभाग के द्वारा भर्ती के कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए हैं. पिछले साल प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए पत्राचार जरूर हुए हैं, लेकिन इसको लेकर नियमावली ही जारी नहीं की गयी. इसके बाद से ये कोशिश भी विफल हो गयी. प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और रीडर की भारी कमी की वजह से बिहार के विश्वविद्यालयों में अस्थायी शिक्षकों की संख्या तीन गुनी बढ़ी है. इन्हीं शिक्षकों के भरोसे बिहार की शिक्षा व्यवस्था किसी तरह चल रही है.

बीएन कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर राजकिशोर प्रसाद कॉलेजों में फैकल्टी की कमी पर चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं “यहां रिटायरमेंट की प्रक्रिया फास्ट (तेज) और अपॉइंटमेंट (नियुक्ति) की प्रक्रिया धीमी चल रही है. ऐसे में फैकल्टी की कमी के कारण क्वालिटी एजुकेशन पर स्वाभाविक तौर पर असर पड़ता है. साथ ही न्यू एजुकेशन पॉलिसी के तहत लाया गया चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम लागू करने में समस्या होती है."

कॉलेज में पढ़ते हुए बच्चे

चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम में विषयों के चुनाव को लचीला बनाया गया है जिसका अर्थ है स्टूडेंट अलग-अलग कॉन्बिनेशन में अलग-अलग सब्जेक्ट पढ़ सकते हैं. जैसे कोई छात्र चाहे तो पारंपरिक विषयों के साथ-साथ वोकेशनल विषय का भी चयन कर सकता है. लेकिन अगर कॉलेज में संबंधित विषय के फैकल्टी ना हो तो कॉलेज को उस विषय पर रिस्ट्रिक्शन (रोक) लगाना पड़ता है. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर स्टूडेंट्स को जो लाभ मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पाता है. ऐसे मैं न्यू एजुकेशन पॉलिसी की बात करना बेमानी लगता है. 

विषयों के चुनाव पर रोक लगाए जाने के संबंध में प्रिंसिपल राजकिशोर प्रसाद कहते हैं "मान लीजिए कोई छात्र योग विषय पढ़ना चाहता हो, वैदिक मैथमेटिक्स, योग फिलासफी या स्किल डेवलपमेंट से संबंधित कोई कोर्स पढ़ना चाहता हो तो ऐसे मामलों में हमें रिस्ट्रिक्शन लगाना पड़ जाता है. ह्यूमन रिसोर्स की कमी के कारण हम इन विषयों को नहीं पढ़ा सकते हैं."

बीएन कॉलेज में तत्काल गेस्ट फैकल्टी और परमानेंट फैकल्टी मिलाकर कुल 69 शिक्षक प्रोफेसर पढ़ा रहे हैं, जिसमें 38 प्रोफेसर स्थायी है. बीएन कॉलेज के प्रिंसिपल बताते हैं कि कॉलेज में 100 से अधिक प्रोफेसर की आवश्यकता है लेकिन फिलहाल लगभग आधे पद खाली पड़े हैं.

बिहार के लगभग सभी विश्वविद्यालय में शिक्षकों की कमी है. हालांकि अन्य विश्वविद्यालयों की अपेक्षा पटना विश्वविद्यालय में आज भी रूटीन के मुताबिक क्लासेस चलाई जा रही हैं. 

सिलेबस के साथ फैकल्टी की संख्या में सुधार आवश्यक

हायर एजुकेशन में सुधार लाने के लिए सिलेबस के साथ-साथ फैकल्टी की व्यवस्था में भी सुधार करने की आवश्यकता है. राजकिशोर प्रसाद कहते हैं "सरकार के पास सभी विश्वविद्यालयों के डाटा मौजूद है. कहां कितने छात्र आ रहे हैं, कितने छात्र परीक्षा में सम्मिलित हो रहे हैं और कहां किन विषयों के शिक्षक मौजूद नहीं है. जब हम सिलेबस में बदलाव की बात करते हैं तो यहां हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि सिलेबस में बदलाव के साथ-साथ उसके अनुसार फैकल्टी में भी बदलाव लाना होगा." 

प्रसाद कहते हैं "हायर एजुकेशन में एसोसिएट प्रोफेसर का पद टीचिंग का फर्स्ट लेवल है. मान लीजिए अभी हमारे यहां प्रोफेसर के पद रिक्त हैं लेकिन उन पदों पर गेस्ट फैकल्टी के तौर पर एसोसिएट प्रोफेसर की बहाली की जाती है. ऐसे में जो क्वालिटी एजुकेशन प्रोफेसर बच्चों को दे सकते हैं वह एसोसिएट प्रोफेसर से नहीं आ सकती है." 

कॉलेज के बच्चें

पटना विश्वविद्यालय में वोकेशनल कोर्स की पढ़ाई लंबे समय से गेस्ट फैकल्टी और विजिटिंग फैकल्टी के भरोसे चलाई जा रही है. वोकेशनल कोर्स की पढ़ाई भविष्य की मांग है. ऐसे में इन विषयों की पढ़ाई के लिए कॉलेज में परमानेंट फैकल्टी होने चाहिए. साथ ही सिलेबस में जो पाठ्यक्रम सुझाए गए हैं उसके अनुसार फैकल्टी नियुक्ति किए जाने चाहिए.

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