कुंवर सिंह और सम्राट अशोक के बहाने बीजेपी की नज़र कहीं जातिगत वोट पर तो नहीं?

‘वीर कुंवर सिंह’ और ‘सम्राट अशोक’ इस नाम से तो बिहार का बच्चा-बच्चा वाकिफ हैं। लेकिन हाल के कुछ दिनों में इन नाम के सहारे जन-जन के मन में पिरोने का प्रयोग बिहार के गलियारों में सत्ता पर काबिज पार्टी बीजेपी के द्वारा किया जा रहा है। 8 अप्रैल के दिन पटना के बापू सभागार में केंद्रीय श्रम मंत्री और बिहार प्रदेश के प्रभारी भूपेंद्र यादव और उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की उपस्थिति में भारतीय जनता पार्टी ने सम्राट अशोक की जयंती मनाई फिर ठीक दो सप्ताह बाद 23 अप्रैल को गृह मंत्री अमित शाह के मौजूदगी में क्रांतिकारी वीर कुंवर सिंह का विजयोत्सव मनाया गया। 

हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक कुंवर सिंह को एक जाति तक सीमित कर रही है बीजेपी

वीर कुंवर सिंह विजयोत्सव’ कार्यक्रम में 77 हज़ार से भी अधिक संख्या में तिरंगा झंडा लहराकर नया विश्व रिकार्ड बनाते हुए झंडा फहराने के पकिस्तान का रिकार्ड तोड़ दिया गया।   

भाकपा माले के राज्य सचिव कुनाल मीडिया कांफ्रेंस के दौरान बताते हैं-

एक जननेता जिसने मस्जिद का भी निर्माण करवाया था। उनके साथ दलित समाज के राजवंशी और मुसलमान सभी थे। जब अपने रिश्तेदारों ने बाबू वीर कुंवर सिंह से गद्दारी की, तब उनके मुसलमान साथी उनके साथ डटे रहे। उनके विजयोत्सव’ कार्यक्रम को भी बीजेपी ने ‘हिन्दुस्तान बनाम पाकिस्तान’ की राजनीती में तब्दील कर दिया है। अमित शाह ने बड़ी चालाकी से कुंवर सिंह की इस बात के लिए तारीफ की कि हिन्दू समुदाय के विभिन्न जातियों के लोगों को उन्होंने आंदोलन में साथ जोड़ा , लेकिन वे उसमें उनके मुस्लिम सहयोगियों का जिक्र करना भूल गए। वीर कुंवर सिंह के नाम पर एक विशेष जाति की राजनीति बीजेपी शुरू कर रही है। जिसे हम लोग नहीं होने देंगे। ये विजयोत्सव भाजपा व आरएसएस का नकली राष्ट्रवाद का प्रारूप है।

राजद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मदन मोहन झा ‘डेमोक्रेटिक चरखा’ को बताते हैं कि

1992 में लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री रहते आरा में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। साथ ही यूपीए सरकार के वक्त आरा और छपरा को जोड़ने वाले वीर कुंवर सिंह सेतु का निर्माण भी हुआ था। अगर कुछ अच्छा करना हैं तो वीर कुंवर सिंह के नाम पर राजनीति नही काम कीजिए। ये लोग बिहार विधान सभा चुनाव और बोचहा विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद से कभी सम्राट अशोक जयंती तो कभी कुंवर सिंह विजयोत्सव के नाम पर जातीय गोलबंदी का प्रयास कर रहे हैं।

आरजेडी ने भूमिहारों को दी तरजीह, तो बीजेपी राजपूत को तवज्जो

‘केवल सच’ पत्रिका के संपादक बृजेश मिश्रा बताते हैं कि,  “बिहार में नए राजनीतिक समीकरण भू+माय की बात चर्चा में है। यहां भू का मतलब भूमिहार, और माय का मतलब मुस्लिम+यादव है। विधान परिषद का चुनाव और बोचहां उपचुनाव इस बात को सच साबित कर दिया है। एमएलसी चुनाव में राजद ने 6 सीट पर जीत दर्ज की थी। जिसमें तीन भूमिहार थें। वहीं ‘भूमिहार ब्राह्मण सामाजिक फ्रंट’ का बोचाहां उपचुनाव में राजद को जिताने में महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसे में अगर बीजेपी के कोर वोटर भूमिहार राजद में मिल गए तो राजपूत जाति को 100 % बीजेपी को अपनी तरफ लाना पड़ेगा। तभी जातिगत राजनीति का संतुलन बीजेपी के लिए बेहतर बना रहेगा।”

कुंवर सिंह के परिवार को क़िले में नज़रबंद कर कैसा विजयोत्सव?

‘विजयोत्सव समारोह’ के दौरान ही कुंवर सिंह जी की प्रपौत्र वधू पुष्पा सिंह जी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होता है। जिस वीडियो में वे बेहद लाचारी भरे शब्दों में दोनों हाथ जोड़कर देशवासियों से गुहार लगा रहीं हैं कि कैसे उन्हें पूरे परिवार के साथ प्रशासन ने घेरेबंदी कर रखी है। वीडियो के माध्यम से पुष्पा सिंह बताती हैं कि, “मुझे माल्यार्पण करने से भी पुलिस ने रोक दिया। भोजपुर पुलिस ‘मामले की लीपापोती करने के लिए घर को सील करके मुझे नजरबंद कर दिया। ताकि अमित शाह को पता ना चल सकें कि वीर कुंवर सिंह की हत्या आरा के प्रशासन ने की है। उन्हें उनके परदादा कुंवर सिंह जी की मूर्ति पर फूल तक चढ़ाने की अनुमति नहीं दी गयी। हमारे दादा वीर कुंवर सिंह जाति विशेष नहीं बल्कि राष्ट्र के थे। उन्हें एक जाति तक सीमित करने की साज़िश है।”

(वीडियो के दौरान कुंवर सिंह जी की प्रपौत्र वधू पुष्पा सिंह, जिन्हें कार्यक्रम के दौरान नज़रबंद कर दिया गया था )

आरा के स्थानीय पत्रकार अमरेंद्र बताते हैं कि, “भोजपुर के जगदीशपुर थाना क्षेत्र के जगदीशपुर नगर वार्ड संख्या-18 किला गढ़ के रहने वाले वीर कुंवर सिंह की प्रपौत्र वधू पुष्पा सिंह के बेटे कुंवर रोहित,उर्फ बबलू सिंह 38 वर्ष के थे। रोहित सिंह का घर किला के पीछे गढ़पर मोहल्‍ले में है। 28 मार्च के दिन रेफरल अस्पताल के गेट के सामने उनकी लाश मिली थी। परिवार वालों के मुताबिक कुंवर सिंह किला मैदान के भवन में सीआईटी के जवान रहते हैं। 

रोहित और सीआईटी जवान के बीच मारपीट हुआ था। जिसके बाद जवानों द्वारा मारपीट कर उसे रेफरल अस्पताल के गेट के सामने की देर रात फेंक दिया गया था। एसआईटी गठन हो चुका है। लेकिन अभी तक पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की हैं।”

1857 के महानायक के सहारे बिहार में क्या हासिल करना चाहती है BJP?

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और वरिष्ठ पत्रकार साकेत दुबे बताते हैं कि,

ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने कुंवर सिंह के बारे में लिखा था कि गनीमत मानिए कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की उम्र लगभग 80 साल की थी। अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेज़ों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता। साथ ही कुंवर सिंह स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे नायक थे जिनके साथ अछूत कही जाने वाली जातियों, मुसलमान और गरीब तबका के लोगों का गहरा जुड़ाव था। इसलिए बिहार के शाहाबाद, मगध प्रमंडल, दानापुर और समूचा चंपारण और बिहार के शाहाबाद, मगध प्रमंडल, दानापुर और समूचा चंपारण पर वीर कुंवर सिंह का प्रभाव था।

“भोजपुर ज़िले के जगदीशपुर आरा लोकसभा सीट के तहत आता है। जो राजपूत समुदाय का गढ कहलाता है। जहां से अभी केंद्रीय मंत्री आरके सिंह सांसद है। इससे पहले जदयू की राजपूत नेता मीना सिंह और उनके पति अजित सिंह भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। कई बार वीर कुंवर सिंह को राजपूत शासक के तौर पर पेश करते हुए इसे एक जाति को खुश करने के प्रयास के तौर पर पेश किया जाता है। हालांकि भोजपुर में वीर कुंवर सिंह की पहचान एक धर्मनिरपेक्ष और सर्व समाज के नेता के तौर पर है।” आगे साकेत दुबे बताते है।

सम्राट अशोक को लेकर सक्रिय बीजेपी की नज़र कुर्मी-कोइरी वोट पर तो नहीं?

मैथिली लेखक और पत्रकार आत्मेश्वर झा बताते हैं कि, “नीतीश कुमार के बाद जदयू को संभालने के लिए कोई भी प्रभावशाली नेता नहीं उभर रहा है बिहार में। इसका फायदा बीजेपी जरूर उठाना चाहेगी। नहीं तो कुर्मी और कोइरी जाति के नाम पर कोई नया पार्टी बिहार में उभर जाएगा। तभी तो 8 अप्रैल के दिन पटना के बापू सभागार में सुशील कुमार मोदी ने कहा था कि अगले साल ये कार्यक्रम गांधी मैदान में होना चाहिए जिसमें कुशवाहा समाज के एक लाख से ज़्यादा लोगों को इकठ्ठा कीजिए। लव-कुश भगवान राम से अलग नहीं जा सकते। जहां राम होंगे वहीं लव-कुश रहेंगे। बिहार में कुर्मी-कोइरी जातियों के लिए बोलचाल में ‘लव-कुश’ शब्द का इस्तेमाल होता है। 1994 में नीतीश कुमार भी पटना के गांधी मैदान में लव-कुश सम्मेलन किया था। वैसे भी राजनीति में ऐतिहासिक शख़्सियतों के नाम को भुनाना कोई नई बात नहीं है।”

बीजेपी का पक्ष जानिए

अयोध्या मंदिर समिति के एकमात्र दलित चेहरा और बीजेपी के वरिष्ठ नेता कामेश्वर चौपाल डेमोक्रेटिक चरखा को बताते हैं कि, “झारखंड में बिरसा मुंडा हों या उत्तर प्रदेस में सुहेलदेव, हमलोग सिर्फ राष्ट्रनायकों का सम्मान करते है। वैसे भी राज्य सरकार की ओर से जगदीशपुर में विजयोत्सव का आयोजन हर वर्ष किया जाता रहा है,   लेकिन इस बार केंद्र सरकार के द्वारा ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ आयोजन कर उन्हें वह सम्मान दिया, जिसके वह हकदार है।”

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