सेक्स वर्कर्स: एक असंगठित क्षेत्र जिन्हें कोरोना से ज़्यादा भूखमरी ने मारा

लॉकडाउन के दौरान कोई पूछने वाला नहीं था. 3-4 दिन हमलोग भूखे रहते थे. हमलोग सेक्स वर्कर्स हैं, काम करते हैं तब हमें पैसे मिलते हैं लेकिन हमलोग को कोई इंसान भी नहीं समझता है. जब भी वार्ड पार्षद के पास राशन की मदद मांगने गये तो वो हमलोगों को हमेशा गाली देकर ही भगा देता था.

अंजू (बदला हुआ नाम) लॉकडाउन के दौरान अपने दर्दनाक वक्त को डेमोक्रेटिक चरखा के साथ साझा करते हुए भावुक हो जाती हैं. अंजू पिछले 20 सालों से पटना में सेक्स वर्क कर रही हैं. पटना के एक इलाके में अंजू और उसके साथ लगभग 25 महिलायें एक साथ रहती हैं और सेक्स वर्क करती हैं. लंबी बातचीत के दौरान अंजू ने ये एहसास दिला दिया कि हमारा समाज जितना भी प्रोग्रेसिव हो जाए लेकिन सेक्स वर्कर्स को कभी अपना हिस्सा नहीं समझ पायेगा.

(डेमोक्रेटिक चरखा से बात करती अंजू)

भारत में सेक्स वर्क पर पाबंदी नहीं है लेकिन संगठित देह व्यापार कानूनन जुर्म है. इसके बाद भी देश के कई बड़े शहरों में संगठित देह व्यापार होता है.

साल 1997 में शुरू हुआ एनएनएसडब्ल्यू, भारत में महिला, ट्रांसजेंडर, और पुरुष सेक्स वर्कर्स के अधिकारों की मांग करने वाले सेक्स वर्कर्स के नेतृत्व वाले संगठनों का एक राष्ट्रीय नेटवर्क है. नेशनल नेटवर्क ऑफ़ सेक्स वर्कर ने साल 2020 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक रिपोर्ट सौंपी थी. उस रिपोर्ट में ये अनुमान लगाया गया है कि देश में महिला सेक्स वर्कर्स की संख्या लगभग 1.2 मिलियन है. UNAIDS के एक आंकड़े के अनुसार इनमें से 6.8 लाख सेक्स वर्कर्स स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से सेवाएं प्राप्त कर रही हैं.

लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा कई राहत स्कीम शुरू की गयी थी. जिसमें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ़्त राशन की सुविधा मिलनी थी. साथ ही प्रधानमंत्री गरीब योजना के तहत 20 करोड़ महिलाओं को हर महीने 500-500 रूपए मिलने का भी प्रावधान था. लेकिन बिहार में किसी भी सेक्स वर्कर को इसका लाभ नहीं मिला.

रेणुका (बदला हुआ नाम) बिहार के मुज़फ्फ़रपुर के चुतुर्भुज स्थान पर पिछले 5 सालों से सेक्स वर्क कर रही हैं. रेणुका का 2 साल का एक बेटा है. सरकार से मिलनी वाली राहत के बारे में रेणुका बताती हैं

“हमलोग का कोई लाभ नहीं मिलता है. अगर हमलोग राशन या कोई भी सरकारी योजना लेने जाते हैं तो हमसे कागज़ मांगता है. चुतुर्भुज स्थान में लगभग 20 हज़ार लड़की है. किसी के पास वोटर आई-डी, आधार या राशन कार्ड नहीं है. अगर बनवाने जाते हैं और जैसे ही फॉर्म पर पता चुतुर्भुज स्थान लिखते हैं तो फिर अफ़सर लोग कागज़ ही छीन लेता है और गाली देकर भगाता है.”

ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स की अध्यक्ष कुसुम बताती हैं,

“जब राजधानी दिल्ली में भी सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली, तो आप देश के ग्रामीण इलाक़ों की स्थिति की कल्पना कर सकते हैं, जहां नीतियां और लाभ वैसे भी देर से पहुंचते हैं या कभी नहीं पहुंचते. सेक्स वर्कर्स को किसी भी तरह का लाभ नहीं मिलता है. हमारी ये काफ़ी दिनों से मांग है कि सेक्स वर्कर्स को भी मान्यता मिले साथ ही इसे ट्रेड यूनियन का हिस्सा बनाया जाए.”

एनएनएसडब्ल्यू के अनुसार, वोटर आईडी, आधार और राशन कार्ड या जाति प्रमाण-पत्र जैसे पहचान-पत्र हासिल करने में, सेक्स वर्कर्स को आम तौर पर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. कई अकेली महिलाएं हैं जिनके बच्चे हैं और जो कहीं भी रहने का सबूत नहीं दे पाती हैं. इसके अलावा, जाति प्रमाण-पत्र लेने के लिए ज़रूरी कागज़ भी दिखा पाना उनके संभव नहीं होता. उन्हें अक्सर राज्य सरकारों द्वारा दिए जाने वाले राशन और राहत पैकेज से वंचित कर दिया जाता है.

(सरकारी योजनाओं से दूर बिहार की सेक्स वर्कर्स)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, अपहरण, गरीबी और पहले से ही देह-व्यापार में शामिल परिवार में पैदा होना कुछ ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से महिलाएं इस पेशे में आती हैं. इससे यह भी पता चलता है कि पुरुषों द्वारा महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक तौर पर अधीन रखना भी ज़रूरी वजहों में से एक है.

लॉकडाउन के दौरान आई समस्याओं के कारण कई सेक्स वर्कर्स सुसाइड के लिए भी मजबूर हो गई. अंजू की एक साथी ने जनवरी 2022 में सुसाइड कर लिया. उनकी एक छोटी बेटी है जिसकी देख भाल अंजू करती हैं. अंजू बताती हैं

“खाने के लिए कुछ था ही नहीं, साथ में 2 साल से किराया भी नहीं दे पा रहे थे. एक दिन तंग आकर शीला ने आत्महत्या कर ली. अभी हमलोग मिलकर उसकी बच्ची को पाल रहे हैं.”

(बच्चों के भविष्य की चिंता सबसे अधिक है)

सेक्स वर्कर्स अपने बच्चों के भविष्य की काफ़ी चिंता करती हैं. रेणुका कहती हैं,

“हमको अपने बच्चे को इन सब काम से दूर रखना है. हमको अपने बेटा को पढ़ा-लिखाकर लायक इंसान बनाना है. लेकिन पता नहीं उसका स्कूल में दाख़िला भी कोई लेगा या नहीं. जो पास के स्कूल में इलाके का दूसरा बच्चा सब जाता है उससे टीचर सब भी गाली देकर बात करता है. बोलता है कि पढ़कर क्या करेगा बड़े होकर तो तुमको दलाल ही बनना है.”

देश की एक बड़ी आबादी जो सेक्स वर्क से जुड़ी हुई है उन्हें लेकर सरकार और बाकी के पॉलिसी मेकर इस तरह से मुंह फेरे हुए हैं जैसे ये हमारी देश की नागरिक ही नहीं हैं.

(इलस्ट्रेशन क्रेडिट- जहान्वी राज)

निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता ज़रूरी है

आपके लिए डेमोक्रेटिक चरखा आपके लिए ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स पब्लिश करता है जिससे आपको फ़र्क पड़ता है
हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.